ऋषभदेव और शिव कौन थे

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(1) ऋषभदेव और शिव कौन थे :

*ऋषभदेव:- जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे जिनके माता पिता जैन धर्म के अंतिम कुलकर राजा नाभिराय थे | भगवान ऋषभदेव का विवाह यशावती देवी और सुनंदा से हुआ| ऋषभदेव के 100 पुत्र और 2 पुत्रियाँ थी | उनमे भरत चक्रवर्ती सबसे बड़े थे एवं प्रथम चक्रवर्ती सम्राट हुए| जिनके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा| इंद्र ने ऋषभदेव के अन्दर वैराग्य को जाग्रत करने के लिए एक अप्सरा नीलांजना को भेजा था | नीलांजना उनकी पसंदीदा नर्तकी में से एक थी| ऋषभदेव के सामने नृत्य करते समय नीलांजना की मृत्यु हो गई, यह देखकर ऋषभदेव ने वैराग्य धारण कर लिया, तभी उन्होंने घर छोड़ दिया और ऋषभ देव को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई थी |
*शिव:- शिव हिन्दू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में से एक हैं | इन्हें देवों के देव महादेव भी कहते हैं| इन्हें भोलेनाथ, शंकर आदि कई नामों से जाना जाता है | इनकी अर्धांगिनी का नाम पार्वती है इनके पुत्र कार्तिकेय और गणेश है और पुत्री अशोक सुन्दरी है। शिव अधिकतर चित्रों में योगी के रूप में देखे जाते है और उनकी पूजा शिवलिंग तथा मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है| शिव के मस्तक पर एक और चन्द्र है तो दूसरी और महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है | शिव को अन्य देवों से भिन्न माना गया है; सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव है | ऐसे महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है शिवरात्री |

(2) ऋषभदेव और शिव की एकरूपता को कैसे समझे?

एकरूपता में यह देखा गया है कि ऋषभदेव और शिव जटाजूट के धारी थे | इसमें शिव का अर्थ कल्याण और मोक्ष बताया गया है। यहाँ एक शब्द का जैन साहित्य के विशेषज्ञ डॉ कांता प्रसाद जैन के अनुसार यह खोज हुई कि शिवलिंग का वो अर्थ नहीं है। उन्होंने एक नया अर्थ दिया, जो वर्तमान मैं प्रचलित शिवलिंग का अर्थ है उससे हटकर | शिव और लिंग को जोड़कर बोला शिवलिंग| लिंग का अर्थ चिन्ह या स्थान जैसे कलिंग, दार्जलिंग | वैसे ही शिव यानी मोक्ष का जो लिंग यानी स्थान है वो शिवलिंग है और जैन पुराणों के अनुसार भरत चक्रवर्ती ने भगवान ऋषभदेव के निर्वाण स्थल पर घंटाकार मंदिर बनाया था फिर हो सकता है उसी के प्रतीक स्वरुप शिव का घंटाकार लिंग बना दिया हो और उसे बाद में योनी से जोड़ दिया गया हो। यही कुछ चीजें हैं जो एक दुसरे के प्रति साम्य प्रकट करती है। इसलिए कहा हैं कि प्राचीनकाल में ऋषभदेव और शिव में एकरूपता हो तो कोई आश्चर्य नहीं !!