माँ

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माँ का किरदार-

वैसे तो एक महिला अपने पूरे जीवन काल में कईं किरदार निभाती है, परन्तु एक औरत के रूप में माँ का किरदार बहुत ही बड़ा और ख़ास है। ‘माँ’ भले ही एक अक्षर का शब्द हो पर इसका मतलब उतना ही गहरा है। माँ हमारी जन्मदाता है जो पता नहीं कितने ही कष्टों के बाद हमें जन्म देती है। माँ ही एक बच्चे की सबसे पहली गुरु होती है। माँ तो भगवान् का वो दूसरा रूप है जो कि त्याग, समर्पण, धीरज, प्यार, निस्वार्थ जैसे भावों से निहित है।

कष्ट ना होने पर कष्ट महसूस करने वाली है माँ-

इसका उदाहरण है भगवान महावीर की माता त्रिशला, जिनके गर्भ में भगवान महावीर ने माता को कष्ट ना देने के लिए जैसे ही हलचल बंद की, उसी क्षण वे तड़प उठी और कोहराम मच गया। तब ही भगवान महावीर ने अपने अवधि ज्ञान से जान लिया कि उन्होंने तो माता को तकलीफ ना हो इसलिए हलचल बंद की परन्तु धन्य है वो माँ जिसे कष्ट ना होने पर कष्ट हो रहा है। महान है वो माँ जो अपने बच्चे के लिए कष्ट को सहने के लिए ख़ुशी ख़ुशी तैयार है।

माँ के प्रति क्या सोचें?

माँ के बारे में थोड़ा देखना, सोचना और समझना चाहिए क्योंकि आज हम जो कुछ भी हैं उसमे हमारी माँ की बहुत बड़ी भूमिका है। माँ नौ माह तक हमें अपने गर्भ में रखती है, गर्भ के समय कितने ही कष्टों को सहती भी है और तो और हमारे कारण अपने सुख- दुःख का भी त्याग कर देती है। माँ बस एक ही ख़याल, एक ही धुन और एक ही लगन कि मेरे बच्चे को कोई तकलीफ ना हो; भले ही उसे कितने की कष्टों का सामना क्यों ना करना पड़े।

Edited by Akanksha Jain, Ghaziabad