संघ, समाज, संस्कृति, साहित्य

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मंगल प्रवचन–रतलाम–विद्यावाटिका–25 नवंबर–2018

संघ, समाज, संस्कृति, साहित्य

1400 वर्षों में एकमात्र ऐसा संघ है जो बालब्रह्मचारी संघ है*– मुनिश्री 108 प्रमाण सागर जी

कुछ ऐसा निर्माण करा जाओ कि आगे आने वाली पीढियाँ उसका जीर्णोद्धार कर सके*– मुनि श्री 108 प्रमाण सागर जी

आचार्य श्री जैसा अतिशयकारी पुण्य सिर्फ तीर्थंकर का ही है, हम अपने गुरु को तीर्थंकर कह ही सकते है*– मुनिश्री 108 विराट सागर जी

ऐसे गुरू भी अलौकिक और शिष्य भी

मुनिश्री 108 प्रमाण सागर जी ने अपने आशीर्वचन में कहा कि धन्य हैं आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज जिन्होंने दक्षिणा के रूप मे अपना पद, अपने शिष्य मुनि श्री विद्यासागर जी को देकर उन्हें आचार्य श्री बनाया। ऐसे गुरू भी अलौकिक और शिष्य भी। आजकल तो जुगाड़ लगाते हैं कि पद मिले लेकिन धन्य हैं ज्ञानसागरजी जिन्होंने अपना पद दिया। जब गुरुदेव श्री ज्ञानसागर जी से, मुनि श्री विद्यासागर जी ने पद लेने से मना किया तो, वे बोले कि तुम क्या हो तुम्हें पता नहीं। आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के मन में मुनि श्री विद्यासागर जी का विराट रूप 22 नवंबर 1972 में प्रकट हो गया था। अतः गुरु ने कहा कि गुरु माना है तो गुरुदक्षिणा भी दो। अपनी जिद को त्यागो और गुरु का आसन आचार्य पद ग्रहण करो। जिसके बाद हमें एक महान आचार्य श्री विद्यासागर जी मिले हैं जो अब शताब्दियों तक जैन धर्म को सींचते रहेंगे।

संघ– गुरुदेव की टकसाल में ढलने वाला हर सिक्का एकदम खरा है

आचार्य श्री विद्यासागर जी ने इतने विशाल संघ का निर्माण किया जो सिर्फ गुणात्मक है ना कि संख्यात्मक। 1400 वर्षों में एकमात्र ऐसा संघ है जो बालब्रह्मचारी संघ है। जब पूरे संसार में भोगविलास की मारामारी मची है, ऐसे में बालब्रह्मचारी संघ, आचार्य गुरुदेव का महाप्रतापी चमत्कार है। गुरुदेव ने पिछले 12 सालों मे कोई दीक्षा नहीं दी है। वे अपनी सोच के तहत काम करते हैं। गुरुदेव की टकसाल में ढलने वाला हर सिक्का एकदम खरा है।

एक समय था जब लोगों की श्रृद्धा मुनियों पर से उठ चली थी। लुप्त होती मुनि परम्परा को आगे बढ़ाने में आचार्य श्री का बड़ा योगदान है। आचार्य श्री का इतना बड़ा संघ साधारण नहीं असाधारण है।

समाज, संस्कृति और साहित्य

मुनिश्री 108 प्रमाण सागर जी के अनुसार साहित्य की रचना और प्राचीन साहित्य के संरक्षण में आचार्य श्री ने चार चाँद लगा दिए हैं। समाज और संस्कृति के लिये उत्कृष्ट कार्य किये। वे समाज के हित की ही बात सोचते हैं। आज के समय में समाज को जो प्रतिष्ठा मिली है लोगों की सोच और चिन्तन बदला है। ये आचार्य श्री की ही देन है | आचार्य श्री ने संस्कृति के लिए बड़े-बड़े काम किये हैं, मन्दिरों की प्रतिष्ठा की है। ये बड़ा उपक्रम है जिससे आगे आने वाली पीढ़ियों में संस्कृति का प्रवाह बना रहे। ऐसी सोच, ऐसे आचार्य अनेक शताब्दियों में भी नहीं होंगे जो अपनी चर्या में भी ऐसी विशुद्धि रखते हों। ऐसे गुरुदेव ने हमारी संस्कृति को युगान्तर तक सुरक्षित रख दिया है। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो के अवशेष हमारी प्राचीनता को बताते हैं। काल के प्रभाव से ये वर्तमान उपक्रम ध्वस्त भी हो गये तो वे भी दिगम्बर जैन धर्म की गौरव गाथा गाते रहेंगे। आचार्य श्री की सोच है कि संस्कृति के आगे कुछ ऐसा निर्माण करा जाओ कि आगे आने वाली पीढ़ियाँ उसका जीर्णोद्धार करा सकें।

ये दुर्लभ सन्त हैं. इतिहास को उठाकर देखें तो पता चलता है कि ज्ञानसागर जी ने आचार्य पद अपने लिये नहीं, विद्यासागर जी के लिये लिया था। मुनि श्री विद्यासागर जी ने मुनि श्री ज्ञानसागर जी से दीक्षा ली थी ना कि आचार्य ज्ञानसागर जी से। आचार्य श्री विद्यासागर जी इस युग के भगवान ही हैं। हम उनकी वन्दना करते हैं। आने वाले अनेक वर्षों तक हमारी सबकी आयु आचार्य श्री को लगे, ताकि हमें उनकी छाँव युगों-युगों तक मिलती रहे।

संकलन- सुधीर जी जैन, रतलाम