उत्तम आर्जव

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उत्तम आर्जव 

एक राजा के पास एक व्यापारी विशेष प्रकार का दर्पण लेकर के पहुंचा। दर्पण देखने में सामान्य था लेकिन उसका मूल्य बहुत था। राजा ने मूल्य जान कर के पूछा कि इस दर्पण की इतनी कीमत क्यों? इतना मूल्य क्यों? वह बोला, राजन! यह दर्पण सामान्य नहीं हैं। सामान्यतया दर्पण में व्यक्ति का एक ही प्रतिबिंब उभरता हैं पर इसमें तीन प्रतिबिंब उभरते हैं। कैसा? पहला वह, जैसा सामने वाला दिखता हैं। दूसरा प्रतिबिंब वह जैसा वो औरों को दिखाना चाहता हैं और तीसरा प्रतिबिंब जैसा वह भीतर से हैं। यह तीन प्रतिबिंब यह दर्पण दिखाता हैं, इसलिए इस की कीमत अलग हैं। मैं समझता हूँ, हर व्यक्ति के पास ऐसा एक दर्पण होना चाहिए, जैसे हम दिखते हैं, जैसे हम भीतर से हैं और जैसा हम औरों को दिखाना चाहते हैं। हम जो दिखते हैं, वह हमारे सामने हैं। जो हम दिखाना चाहते हैं, वह हमारे मन में हैं लेकिन हम भीतर से जो हैं, उस पर हमारा ध्यान नहीं हैं। संत कहते हैं- ‘अपने जीवन में सहजता को अभिव्यक्त करना चाहते हो और जीवन का रस लेना चाहते हो तो अपने जीवन को भीतर से पहचानने की कोशिश करो‘। भीतर कुछ हो और बाहर कुछ रहो तो जीवन का मजा नहीं हैं। जीवन का असल मजा केवल वही उठा पाते हैं, जो भीतर और बाहर एक होते हैं और भीतर- बाहर एक होने की इसी परिणति का नाम ‘आर्जव धर्म हैं।

हम लोगों ने आर्जव धर्म की व्याख्या कई तरीके से सुनी हैं। हर वर्ष सुनते हैं और हमेशा कहा जाता हैं कि माया छोड़ो, माया छोड़ो, माया छोड़ो पर माया आज तक तो छूट नहीं पाई। कई लोग तो माया छोड़ने की बात में भी मायाचारी दिखा देते हैं। सरलता की बात को सरलता से कहा तो जाता हैं पर जीना सरल नहीं होता, जीना बड़ा कठिन होता हैं। पर आज में वो बातें आपसे बिल्कुल नहीं करूंगा, आप अपनी भूमिका में आर्जव धर्म को कैसे अपना सके, उसके लिए चार बातें आपसे करूंगा।

  • दिखावट
  • बनावट
  • सजावट और
  • रुकावट

आप पड़ताल कीजिए। आप पाएंगे कि जीवन की रुकावट के यही तीन कारण हैं, नंबर 1 दिखावट, नंबर 2 बनावट और नंबर 3 सजावट। थोड़ा देखो, अपने जीवन में। हमारे जीवन में दिखावट का रूप हैं या नहीं, कभी आप ने पड़ताल किया, दिखावट का मतलब क्या होता हैं? दिखावट का मतलब प्रदर्शन, प्रदर्शन किसका? हम हैं कुछ और दिखाना कुछ चाहे, इसका नाम दिखावट हैं। जो एक प्रकार का छल हैं, औरों के साथ नहीं खुद के साथ। तुम अपने जीवन की पड़ताल करके देखो कि तुम्हारे जीवन में कहीं दिखावट का पुट तो नहीं हैं। महाराज! पुट की बात करते हो, ठूस-ठूस कर भरा हैं। पूरा जीवन ही दिखावट में जाता हैं, कई तरह का दिखावा हैं।

आपने कभी सोचा, आप क्या चाहते हैं? हर व्यक्ति से पूछो तो आज हर आदमी अच्छा दिखना चाहता हैं, मैं अच्छा दिखूं ये हर कोई चाहते हैं पर अच्छा देखूं यह बहुत कम लोग चाहते हैं। अच्छा दिखूं, यह आप रोज चाहती हैं, रोज सुबह उठने के बाद नहाते हो तो दर्पण में पहले जाते हो कि नहीं, अपना प्रतिबिंब देखते हो कि नहीं, देखते हो। किस लिए? मेरी लुक अच्छी हैं या नहीं, मैं अच्छा दिख रहा हूँ या नहीं। अच्छा देखने की इच्छा मन में होती हैं और जहाँ कुछ थोड़ा खराब होता हैं, हम उसको सुधारते हैं। बाल ठीक से सजा लेते हैं और चेहरे को ठीक कर लेते हैं, कपड़े की स्टाइल थोड़ी ठीक कर लेते हैं। हाँ! हम ठीक दिख रहे हैं और जब ठीक दिखते हैं तो दर्पण के सामने अपने आप को देख कर एक हल्की सी स्माइल देते हैं। कितनी अच्छी स्माइल होती हैं? ये दिखावट हैं ना। मैं अच्छा देखूं, इसकी शुरुआत तुम सुबह से करते हो लेकिन कभी मन में यह विचार किया कि मैं अच्छा देखूं। अच्छा दिखने में उतना मजा नहीं, जितना अच्छा देखने में हैं। अपनी आंखों को ऐसे तैयार करो कि वह हर जगह केवल और केवल अच्छा देख सके, अच्छाई देख सके लेकिन अभी तो अच्छा दिखने में हम अपनी ताकत लगाते हैं और बुरा देखने में हम अपनी होशियारी समझते हैं, यही हमारे जीवन की दुर्बलता हैं, विडंबना हैं। जिसे हमें दूर करना चाहिए, दर्पण में जाओ, मुझे तुम से कोई आपत्ति नहीं पर दर्पण में देखो तो केवल यह मत देखो कि मैं अच्छा दिख रहा हूँ या नहीं। दर्पण में जाकर जब आप अपने अच्छे रूप को देख कर अपने चेहरे पर स्माइल लाते हो तो उस पल अपने मन में यही भाव रखो, जैसे मैं अपनी अच्छाई को देख रहा हूँ, सब की अच्छाइयों को देखूँ और मेरे चेहरे पर हर किसी के प्रति स्माइल हो। अच्छा देखें, अच्छा दिखूँ, यह कोशिश तुम्हारी हर पल होती हैं। अच्छा देखूँ, यह भाव यदा-कदा ही होता हैं। कोई व्यक्ति कितना भी अच्छा दिखे, अगर अच्छा देखने की कला उसके पास हैं तो ही वह इंसान अच्छा कहलाने का अधिकारी हैं लेकिन अच्छा दिखूँ सोचते हैं, अच्छा देखूँ यह नहीं सोचते, अच्छा कहलाऊं सब सोचते हैं कि लोग मुझे अच्छा कहे, चाहे काम मैं कितना खोटा क्यों न करूं। आपको कोई बुरा कह दे तो बुरा लगता हैं कि नहीं लगता। क्यों लगता हैं बुरा? अगर कोई आदमी कड़वा बोलता हो, तीखा बोलता हो और उससे कोई बोले कि भैया आप बहुत तीखे हो तो वो क्या करेगा, गुस्सा आएगा, वह अपना तीखापन दिखा देगा और क्या करेगा पर क्यों, वह अपना तीखापन क्यों दिखा रहा हैं? वो इस बात को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा हैं कि मैं तीखा हूँ।

बुरा होने के बाद भी इंसान अच्छा दिखना चाहता हैं, अच्छा कहलाना चाहता हैं, यही तो माया हैं। अच्छा दिखूँ, अच्छा कहलाऊं, यह तुम हर पल सोचते हो। संत कहते हैं- ‘जीवन का रूपांतरण चाहते हो तो अच्छा देखूं, यह भाव जगाओ और आगे बढ़ना हैं तो एक कदम आगे बढ़ो।’ अच्छा बनूँ यह पुरुषार्थ करूं। अपने मन को टटोल कर देखो, तुम्हारा प्रयास कैसा हैं? अच्छा दिखने का, अच्छा कहलाने का, अच्छा देखने का या अच्छा बनने का। तुम पाओगे, हम प्रारंभिक दो बातों को बहुत प्रमुखता देते हैं, बाद की दो बातें बहुत  कम होती हैं पर असल तो यही हैं, अगर अच्छा देखने लगोगे ना तो अच्छा बनने की शुरुआत हो जाएगी और जो अच्छा बनेगा, उसको सब अच्छा कहेंगे और जो अच्छा कहेंगे, जिसको लोग अच्छा कहेंगे, उसको सब अच्छा मानेंगे तो सब अच्छा दिखने ही लगेगा लेकिन लोग हैं पत्तों को सींच कर पेड़ हरा करने का प्रयास करते हैं, जड़ की तो पहचान ही नहीं हैं। जड़ को समझिये, मन में एक संकल्प लीजिए कि अभी तक मैंने अच्छा दिखने की कोशिश की, अच्छा कहलाने की कोशिश की, अब मैं अच्छा बनने का प्रयास करूंगा और अच्छा बनने के लिए अच्छा देखना शुरू करूंगा। अच्छा देखूंगा, अच्छे को अपनाउंगा, अच्छा बन जाऊंगा।

अब देखिये, दिखावट कहाँ-कहाँ हैं हमारी। सबसे पहले धर्म के क्षेत्र में हैं, धर्म करते हैं, यहां सब धर्मात्मा हैं। मैं आपको कहूँ, कितने धर्मात्मा लोग हो, छाती फूलती हैं कि नहीं। किसी भी व्यक्ति को धर्मात्मा कह दो तो अच्छा ही लगता हैं। महाराज! अच्छा और फिर आप कहो तो इससे अच्छा क्या हैं। मैं तुमसे कहता हूँ, धर्मात्मा कहलाने से तुम्हें जितनी खुशी होती हैं, थोड़ी कल्पना करो, धर्मात्मा बनने वालों की खुशी क्या होगी। धर्मात्मा दिखते तो सब हैं, यहां जितने हैं, मुझे तो सब धर्मात्मा दिख रहे हैं क्योंकि मुझे पाप दिखता ही नहीं हैं। सब धर्मी हैं और आप अपने आप को धर्मी कहलाकर गर्वान्वित भी महसूस करते हैं लेकिन अपनी पड़ताल करके देखिए मैं सच्चे अर्थों में धर्मी हूँ या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि लोगो की दृष्टि में मैं धर्मात्मा दिख रहा हूँ, लोग मुझे धर्मात्मा कह कर के संबोध रहे हैं, पुकार रहे हैं पर मेरे भीतर तो धर्म का कोई आधार ही नहीं बचा। कही ऐसा तो नहीं, बहुत सारे लोग हैं जो धर्मात्मा दिखते हैं धर्मात्मा होते नहीं हैं और मैं आप सबसे एक बात कहूँगा, बहुत जल्दी किसी व्यक्ति पर भरोसा मत करना क्योंकि धर्म के क्षेत्र में भी इसका दुरुपयोग ज्यादा होता हैं और मैं तो अक्सर कहता हूँ, बुराइयाँ सदैव अच्छाइयों की ओट में पलती हैं, अच्छाइयों की ओट में ही बुराइयाँ पलती हैं। बहुत सारे लोगों के साथ ऐसा होता हैं, जो दिखते कुछ हैं होते कुछ हैं। धर्मी दिखते हैं पर धर्मी नहीं होते।

मेरे संपर्क में एक व्यक्ति हैं, उन ने अपनी बेटी का विवाह किया एक लड़के से और विवाह करने के बाद महीना भर बाद बेटी वापस आ गई, वापस आ गई। हमने पूछा, भैया, क्या बात हो गई? वो आया, बोला, महाराज! बहुत दु:खी हूँ। बोला मेरी बेटी आ गई वापस, उसको ससुराल में कुछ समझ में नहीं आया। हमारे संस्कारों के विरुद्ध, बेटी के संस्कारों के विरुद्ध। उस घर का तो रवैया अलग हैं, लगता ही नहीं कि ये जैनी का घर हैं। हम बोले, तुम्हे पहले सोच, देख कर के देना था। बोला, महाराज! मैंने सोचा समाज का मुखिया हैं, साधु-संतो के आगे पीछे रहता हैं, सब बड़े धार्मिक आयोजनों में सम्मिलित होता हैं और मैंने सोचा, अच्छा धर्मात्मा हैं, हमारी बेटी अच्छी रहेगी लेकिन महाराज! क्या बताऊं? बेटी गई, घर का हाल सुनाया तो रोंगटे खड़े हो गए। बाप-बेटा दोनों मिलकर शराब पीते हैं, घर में शुद्धि-अशुद्धि का तो कोई विचार ही नहीं और वह कहते हैं हम लोग मॉडर्न  जैन हैं। वो बोले, मेरी बेटी, इसको बर्दाश्त नहीं कर पाई। मैंने उन लोगों से कहा भी तो उनका कहना हैं, इसके साथ एडजस्ट कर सको तो ठीक नहीं तो अपना रास्ता नापो। बहुत सारे ऐसे लोग होंगे, दिखते अच्छे हैं, होते अच्छे नहीं हैं। मैं आप सब से कहता हूँ, धर्म करना धर्म का दिखावा मत करना, जितना तुम ऊपर से धर्मी दिखते हो, भीतर से उतने ही धर्मी बनने का प्रयास करना, तो मजा हैं।

भीतर से धर्मी बनो, मैं धर्मी दिखूँ नहीं, चलेगा। मैं धर्मी कहलाऊं नहीं, चलेगा लेकिन मैं धर्मी बन जाऊं तो मुझसे बड़ा इस संसार में और कोई नहीं होगा। तुम कहां हो? लोग तुम्हे सम्मान देते हैं, लोग तुम्हारी प्रशंसा करते हैं, लोग तुम्हें प्रतिष्ठा पूर्ण दृष्टि से देखते हैं और तुम दलदल में फंसे हो तो  ये गलत हैं। कोई पापी व्यक्ति पाप करे तो चलता हैं पर धर्मी का लबादा ओढ़कर के कोई व्यक्ति पाप करें तो वो अक्षम्य होता हैं। मैं आपसे कहता हूँ, धर्म का दिखावा कभी मत करना, धर्म- क्षेत्र में कभी दिखावा मत करना। लोग दिखावा करते हैं, देखिये एक ऐसा दिखावा, एक जगह बोली हुई, बोली हो रही हैं, अच्छा बड़ा आयोजन था और बोली आयोजकों की अपेक्षा से ज्यादा हो गई, बढ़-चढ़कर के बोली हुई और जब बोली आयोजकों की अपेक्षा से बढ़ी हुई तो लोगों ने बधाई दी, भाई, तुमने इतनी बड़ी बोली ले ली, बहुत उदारता आ गई। वो बोली लेने वाला आदमी बोला- उदारता छोड़ो, हमने तो इतनी बड़ी बोली दूसरी वजह से ली हैं, हमारी बेटियां बड़ी हो गई, अब उनका संबंध ढूँढना हैं। मैंने 5,00,000 की बोली ली, लोग सोचेंगे पाँच करोड़ का आदमी तो होगा ही, अब हमारे घर संबंध आ जाएंगे। कैलकुलेशन।

कैलकुलेशन, एक व्यक्ति मुझसे जुड़ा और उसका बहुत जुड़ाव दिखा। किसी ने बोला, भैया, तुम आजकल महाराज से इतने कैसे जुड़ गए तो उसने बोला भैया, अब हमारे घर में बच्चे अच्छे बड़े हो गए, थोड़ा महाराज से नहीं जुड़ेंगे तो आगे की व्यवस्था कैसे बनेगी। ऐसे लोग हैं, ये बात मेरे पास तक आई। जिस व्यक्ति ने कहा, महाराज! वो आदमी ऐसा बोल रहा था लेकिन मैं तो पॉजिटिव सोचता हूँ कि शायद उसी से मुझसे जुड़ने के कारण उसका कल बदल जाए और जीवन उसका सुधर जाए, हमें तो सकारात्मक सोचना चाहिए। मैं ऐसे व्यक्ति की भी उपेक्षा नहीं करता लेकिन मैं तुमसे कहता हूँ, तुम कर क्या रहे हो यह तो सोचो, तुम्हारा उद्देश्य क्या हैं, ध्येय क्या हैं, यह तो सोचो। धर्म करते हुए धर्म का दिखावा मत करो, तय करो, मैं जितना धर्म करूंगा, विशुद्ध मन से करूंगा पर इसका एक दूसरा रूप भी दिखता हैं, कुछ लोग जो धर्म बिल्कुल नहीं करते और सीधे कहते हैं भैया हम तो दिखावा नहीं करते मतलब वो यह दिखाना चाहते कि बाकी सब दिखावा कर रहे हैं। यह भी गड़बड़ हैं। कुछ लोग एक अलग लहजे में बोलते हैं कि मैं दिखावा नहीं करता। भैया, दिखावा नहीं करता, पर कर तो वो यह साबित करना चाहता हैं कि बाकी सब तो दिखावा कर रहे हैं, तू सही देखने की कला विकसित नहीं कर सका। हमेशा एक बात ध्यान रखना, स्वयं कोई भी कार्य करो तो अच्छा करो और दूसरा कोई कार्य करें तो उसमें अच्छा देखो। दूसरे की बुराई मत देखना, दूसरे की कमजोरी मत देखना, दूसरे की दुर्बलता मत देखना, दूसरे के दोष मत देखना, दूसरे के दुर्गुण मत देखना, देखना तो उसकी अच्छाई देखना और उससे कुछ सीख लेना और अपने जीवन को आगे बढ़ाना तो धर्म का दिखावा बहुत लोग करते हैं, मुझे नहीं करना।

मैं अपने जीवन को विशुद्ध बनाने के लिए धर्म कर रहा हूँ, यहाँ दिखावे का काम नहीं, यहां एकदम सहज-सरल, जो मैं करूं बढ़-चढ़कर के करूं, उत्साह के साथ करूं, पीछे नहीं रहूँ। उसमे कोई लज्जा और संकोच का अनुभव ना करूं, गौरव का अनुभव करूं लेकिन यह अंतर दर्शन के लिए हो, प्रदर्शन के लिए नहीं। दिखावट सरलता को बाधित करती हैं, वह माया हैं तो आज आप संकल्प लेंगे कि मैं धर्म क्षेत्र में किसी प्रकार का दिखावा नहीं करूंगा। कई-कई बार ऐसा होता हैं कि आपके मन में दिखावट की भावना नहीं होती लेकिन वह औरों के लिए बाधा बन जाती हैं। एक उदाहरण देता हूँ, मैं एक स्थान पर था, क्योंकि मैं चीजों को बहुत गंभीरता से समझता हूँ और छोटी-छोटी टूटियां कितनी बड़ी समस्या का कारण बन सकती हैं। शायद आप इस घटना से एक lesson लेंगे, मैं एक स्थान पर था।

एक परिवार में चौका लगा, धनी परिवार था, पहली बार चौका लगा और मेरा एक ऐसे परिवार में आहार हो गया, जो साधारण परिवार था और पूरे 4 महीने चौका लग रहा था। आहार वहाँ हुआ, वो धनी परिवार के लोग थाल भर-भर के ले आए, 50 प्रकार के आइटम बनाये और जिस चौके में मैं गया था, वह वही बनाई जो वह खाती और वो जो हम को खाना था, जो हमको लेना हैं। दो सब्जी, दाल, रोटी थी, मैंने उनकी थाली में से कुछ भी अलग नहीं किया, जो मेरे लेने योग्य था, सब वहाँ था और वही था जो मुझे लेना था। मैं आहार कर रहा था, इस बीच उस धनी परिवार की महिलाएं जो थाल भर-भर कर ले कर के आई, अपनी चीजें दिखाइ और मैंने उस गृहिणी  के चेहरे के भाव को पड़ा। उसके मन में बड़ी हीनता सी अनुभव में आ रही थी कि हाय मेरा कैसा दुर्भाग्य, आज महाराज मेरे चौके में आए और मैं उनके लिए कुछ नहीं बना पाई। उसके मन में यह हीनता का भाव आ रहा हैं, मैंने उसके मनोभाव को ताड दिया। मैंने सबसे आहार लिया पर किसी का एक दाना नहीं लिया और आहार के बाद मैंने उस परिवार के लोगों को समझाया कि तुम तो तीन-चार दिन के लिए ये पुरुषार्थ कर रहे हो, वो 4 महीना से कर रही हैं। तुम सक्षम हो, बहुत कुछ लगा सकते हो, लगाओ अपनी भावना से, जो तुम्हें करना हैं करो पर तुम्हारे चौके में साधु आए तो करो, दूसरे के चौके में इतना ले जाकर मत दिखाओ कि मैंने यह बनाया, मैंने यह बनाया हैं। हो सकता हैं, तुम दिखावे के लिए नहीं कर रहे हो, मैं नहीं कहता कि दिखावे के लिए कर रहे हो पर और तुम्हारा यह व्यवहार सामने वाले को आहत कर सकता हैं और दूसरा संदेश तुम थाल भर- भर के लेकर जाओगे. रास्ते में सड़क चलते देखेंगे कि यह साधु कितना खाता हैं। समझ रहे बात को, यह दिखावट हैं, उसका साइड-इफेक्ट हैं। समझने की बात, उस परिवार की महिलाओं को मेरी बात जंची, बोली, महाराज! इतनी गंभीरता से तो हमने कभी सोचा ही नहीं। मैं आपको यह उदाहरण केवल इसलिए सुनाया हूँ ताकि आप भी इस बात पर ध्यान रखें, दिखावट नहीं होनी चाहिए, सहजता होनी चाहिए, जिससे कोई असहज ना हो।

दूसरा, धन का दिखावा, पैसा होता हैं तो फिर लोगों के मन में एक लग जगती हैं, पैसे के प्रदर्शन की, बड़ी गर्मी होती हैं। संत कहते हैं- पैसा कमाया हैं, उसका उपयोग करो, उपभोग करो, प्रदर्शन मत करो‘। पैसा मत दिखाओ, आज हैं, कल रहे ना रहे, कोई भरोसा नहीं। पैसा दिखाने की चीज नहीं हैं, पैसा तो अच्छे काम में लगाने की चीज हैं। अनुकूल संयोगों से तुमने सब पाया हैं तो उसका प्रदर्शन करने की जगह सदूपयोग करो। उस पैसे को वहां लगाओ, जहां उसकी जरूरत हैं, लोगों की दुआएं पाओगे और पैसे का प्रदर्शन करके तो तुम ईर्ष्या और बद्दुआ के शिकार बनोगे। मैं आपसे पूछता हूँ, जो आदमी फालतू पैसा खर्च करता हैं और दिखावा करता हैं, आप उसके यहां के होने वाले शादी-विवाह के कार्य हो या अन्य कोई कार्य हो जहाँ वो प्रदर्शन करता हैं, उस प्रदर्शन को देखने के उपरांत आप की क्या प्रतिक्रिया होती हैं, क्या कमेंट होता हैं, बहुत दिखा रहा हैं, नंबर 2 का पैसा हो गया, बहुत बढ़ गया, सब दिखावा हैं, ज्यादा दिखावा हैं, जितना हैं उससे ज्यादा दिखावा और कोई आदमी अगर उसी पैसे का अच्छा उपयोग करता हैं तो क्या होता हैं, कितने अच्छे भाव हैं, कितने पवित्र भाव हैं, कितना उदार व्यक्ति हैं।

आप किस श्रेणी में अपना स्थान बनाते हो? तुम्हारा स्थान किस जगह हैं प्रदर्शन करने वालों में या सदुपयोग करने वालों में। होने पर दिखाने वाले लोग तो फिर भी हैं, इसलिए दिखा रहा हैं। अब तो और ट्रेंड हैं, हैं नहीं फिर भी दिखा रहे हैं, कर्जा लेकर घी पीते हैं। अरे भैया, अब तो prestige की बात हैं, दिखाना ही पड़ेगा। अभी एक भाई मिले, एक हमारे यहां समाज हैं, नाम नहीं लेता, उस समाज में लड़के की शादी में उल्टी रकम देनी पड़ती हैं। उनकी लड़कियां मिलती नहीं तो लड़के की शादी में उल्टी रकम देनी पड़ती हैं। एक भाई आया और बोला महाराज! बहुत कर्जे में दब गया हूँ। मैंने पुछा, क्या बात हो गई? वो बोला, महाराज जी! दो बेटों की शादी की और डेढ़ करोड़ का कर्जा हो गया। मैंने कहा-  दो बेटों की शादी की, उसमे डेढ़ करोड़ का कर्जा हो गया। कर्जा कर के शादी क्यों की, इतना खर्चा क्यों किया। वो बोला, महाराज! समाज में थोड़ा दिखाना तो पड़ता हैं। हम बोले, भोगो। जिसके यहाँ की बेटी लेकर आया, जब रकम आई थी तो खुश हो रहा था, अब कर्जा देखकर वह भी छाती पीट रहा हैं, कहां बेटी दे दी। यह जो दिखावट हैं, शादी-ब्याह आदि में लोग अनाप-शनाप पैसा खर्च करते हैं, कर्जा ले लेकर करते हैं। बाद में वह इतना बड़ा बोझ बन जाता हैं कि जीवन भर नहीं उभर पाते, ऐसा दिखावा मत करो। धन का दिखावा, धर्म का दिखावा, धाक का दिखावा, धाक, प्रतिष्ठा, रुतबा, प्रभाव और कई लोग अपनी धाक दिखाते हैं, डींगे हाकते हैं तो कभी-कभी उनकी पोल खुलती हैं, बड़ी हालत विचित्र बन जाती हैं।

माउंट आबू में सनसेट पॉइंट पर पिता अपने 4 वर्ष के बेटे के साथ सनसेट को देख रहा था, सूरज डूबने वाला था। अहम क्या नहीं करता? सूरज डूबने वाला था, 4 साल का बेटा वहां था  और बाप ने बेटे से कहा, बेटा देख मेरा ऑर्डर sun भी मानता हैं, देख क्या होता हैं? उसने कहा, गो डाउन, सूरज डूब गया। बाप ने छाती फुला कर बोला, देख लिया मेरा प्रभाव। बेटे ने कहा, पापा, try once again। अब क्या करें? सिटी-पिट्टी गुम। कोई उपाय नहीं? अब बाप क्या करें? कई लोग ऐसे होते हैं जो अपनी धाक जमाने की कोशिश करते हैं, अपना धाक  दिखाने का प्रयास करते हैं और बाद में धक्का खाकर के आते हैं। ऐसी धाक दिखाने की कोशिश मत करो, जिसके कारण तुम्हें धक्का खाना पड़े तो धर्म का दिखावा मत करो, धन का दिखावा मत करो, धाक का दिखावा मत करो और अपने संपर्कों का ज्यादा दिखावा मत करो। सीमित रखो, जीवन आगे बढ़ेगा। तो यह दिखावट की बात हैं, अपने आप को बचाइए।

दूसरे क्रम में हैं बनावट, क्या हैं बनावट? बनावट मतलब कृत्रिमता जो नैसर्गिकता से रहित हैं।आजकल के लोगों के जीवन में बनावटीपन बहुत हैं, पूरे जीवन में कृत्रिमता दिखती हैं, सब आर्टिफिशियल जैसा लगता हैं तो यह बनावटीपन ख़त्म होना चाहिए। अब आप क्या करते हैं? बनावट कहां-कहां करते हैं, कई लोग बनावटी बातें करते हैं। सबसे पहले क्या, बनावटी बातें,  बनावटी बातें मुंह से मीठा-मीठा बोलेंगे और अंदर कहते हैं ऐसे लोग मीठी छुरी होते हैं। बात बना कर के बोल रहे हैं कि जैसे आप से ज्यादा इतना बड़ा हितेषी तो आपका कोई हैं ही नहीं लेकिन यह बनावटी बातें कितने दिन तक चलती हैं। कई लोगों का नेचर होता हैं, जो बातें बनाने में माहिर होते हैं और बातें इतना बनाते हैं लेकिन कभी जब उसकी पोल खुलती हैं तो वह कहीं के नहीं रह पाते। ज्यादा बनावटी बातें अपने जीवन में नहीं होनी चाहिए। बातों में सहजता हो, सरलता हो, सत्यता हो और शुद्धता हो। हमारी जो भी बात हो, बनावटपना नहीं हो, सहजता, सरलता, सत्यता और शुद्धता हो। अगर हम बनाकर बात कर रहे हैं तो बात अलग होती हैं। अपनों के बीच जब आप बात करते हैं तो बड़े सहजता से बात करते हैं लेकिन कोई गैर आता हैं तो आपके बातचीत का तौर-तरीका बदल जाता हैं तो वह बदलाव जीवन में नहीं आना चाहिए। हमें अपने जीवन में दिखना चाहिए कि नहीं मेरे जीवन में, मेरे वचनों में कोई बनावटीपन तो नहीं आ रहा हैं, यदि आ रहा हैं तो मुझे सुधार लेना हैं। ज्यादा बातें बनाने से काम नहीं होता, कई बार आप लोग बोलते हो ना, ज्यादा बातें मत बनाओ, सीधी-सीधी बात करो तो आप देखिए जब आप बातें बनाते हो तो उसमें सत्य का पुट होता हैं या झूठ का। वहां सरलता हैं या कपट, उसमें सुख हैं या दु:ख। तात्कालिक सुख और उसके बाद दु:ख हैं, उस समय थोड़ी देर के लिए सुख मिलता हैं और उस अल्पकालिक सुख  के पीछे लोग सारे जीवन भर के लिए दुःख आमंत्रित कर लेते हैं।

आजकल लोग बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, औकात छोटी, बातें बड़ी, कई बार बड़ी हालत खराब हो जाती हैं, अपने आप को कुछ और दिखाने के लिए बोलना पड़ता हैं। अरे मेरे पास तो यह हैं, वह हैं, यह हैं, वह हैं तो बड़ी मुश्किल होती हैं। बनावटी बातों से अपने आप को बचाइए।  मैं जो हूँ, सही कहूँगा, सत्य कहूँगा, बना कर नहीं कहूँगा लेकिन आजकल लोग होते हैं सीधे-सीधे बोल देते हैं कि भैया अब क्या करें।

एक बार ऐसा हुआ कि एक आदमी के घर में छप्पर जो था, वह फूटा हुआ था। उसको छत पर जाना था, बारिश हो रही थी, उसको नसरनी की जरूरत थी। पड़ोसी के पास गया, भैया, थोड़ी देर के लिए तुम अपनी नसरनी दे दो तो बड़ी कृपा होगी पर पड़ोसी बड़ा अलग तरह का था, वो उसे नसरनी देना नहीं चाहता था तो उसने कह दिया- भैया, क्या बताऊं, नसरनी संदूक में रखी हैं, चाबी मेरा बेटा ले गया। मैं कहाँ से दूं? नसरनी संदूक में रखी हैं, चाबी मेरा बेटा ले गया तो उसने कहा भैया, इतनी बड़ी नसरनी तुम्हारे संदूक में कैसे आएगी तो उसने कहा, आप क्या चाहते हो, मैं सीधे-सीधे ना कर दूँ। बुंदेलखंड में एक कहावत हैं-

‘कुछ लोग सूखा स्वागत करते हैं।’

सीधे-सीधे ना न करके, बातें बना कर के अपनी बातें कर देते हैं। इसको बोलते हैं, सुखा स्वागत। एक व्यक्ति के घर कोई मेहमान आया, अब मेहमान आया तो उसको खिलाना-पिलाना उसके प्रति आत्मीयता प्रदर्शित की, बोला, आइये, बैठिए, स्वागत हैं आपका। आज आप आए हो, आपको देखकर तो मेरा मन बड़ा रोमांचित हैं, वह अभिभूत हैं, क्या कहूँ मैं  आपका? अभी हमने चुटकी भर ज्वार जो हैं, सींचने के लिए रख दिया हैं, अभी तैयार करेंगे। हम तो पलक-पाँवड़े बिछाए हैं। क्या कहे, कैसा स्वागत करते हैं। अगर हमारे यहां गुड होता, कहावत हैं-

गुड़ होते तो गुलगुले बनवते, ल्यावते कनक उधार, अकेले तेल ही नहीं हैं।

हमारे पास गुड़ होता तो हम गुलगुला बना लेते, कनक किसी से उधार मांग कर ले आते, अकेले तेल ही नहीं हैं। यह क्या हैं? बनावटीपन हैं। एक आ गया इसी के घर में तो उसने कहा, आओ मित्र, बैठो मित्र, घर तुमहाओ हैं और चूर्ण हो तुम्हारे पास तो चूल्हो हमावर हैं। बात समझ गए, यह बनावट हैं, बाते बनाना। बातों में सहजता लाइये, सरलता लाइये, सत्यता अपनाइये, शुद्धता लाइये।

फिर बनावटी काम, बनावटी बात के बाद क्या, बनावटी काम। बनावटी काम मत कीजिए, जो काम कीजिये एकदम सहस तरीके से कीजिए। अगर हम बनावटी काम करेंगे तो जीवन बिगड़ जाएगा। सहज कोई बनावटी बात नहीं बनाना, बनावटी काम नहीं करना तो देखिए जीवन में कितना आनंद आता हैं। बहुत सारे लोग, बहुत सारे बनावटी काम करते हैं, जिसमें कृत्रिमता होती हैं, दिखता नहीं और हमारे जीवन की सारी सहजता खत्म हो जाती हैं। ऊपर से हम अपने आप को टिपटॉप रखने की कोशिश करते हैं, भीतर से सब कुछ खंडित हो जाता हैं। इस बनावटीपन के कारण आज लोगों के संबंध बिगड़ रहे हैं, संबंध बिगड़ रहे हैं।

देखिये, संबंधों में क्या स्थिति हैं, एक महिला अपनी सहेली को कीमती गहनों और आभूषणों से लदी देख कर के पूछा, क्या बात हैं, आज तो तुम बहुत कीमती आभूषण और गहने पहनी हो। क्या तुम्हारे पति का बिजनेस बदल गया, पति की इनकम बढ़ गई, पति का बिजनेस बदल गया। उसने कहा, नहीं मैंने अपना पति बदल दिया। बनावटी यह बनावटपन हमारे लिए बहुत सोचनीय जैसी हैं। बहुरूपिया तो रूप बदलता हैं वो तो  एकरूप दो-तीन दिन तक रख लेता हैं, हफ्ता-हफ्ता भर रखता हैं लेकिन आदमी कितना बड़ा बहुरूपिया हैं, शायद आप इस पर कभी सोचे नहीं होंगे। सुबह उठते हैं तब कुछ, भगवान के समक्ष होते हैं तब कुछ, गुरु के सामने होते हैं तब कुछ, पत्नी के सामने होते हैं तब कुछ, परिवार के सामने होते हैं तब कुछ, बच्चों के सामने होते हैं तब कुछ, ग्राहक के सामने होते हो तब कुछ और मित्रों के सामने होते हैं तब कुछ। कितने रूप बदलते हो, बहुरूपियापन छोड़िये, बनावटीरूप मत रखिए, एक दिन रंगा सियार बनोगे, असलियत प्रकट होगी, कहीं के नहीं रहोगे, कब पोल खुल जाए और मामला गड़बड़ हो जाए तो हमें ऐसा कोई कार्य नहीं करना जिसमे ये बनावटीपन हो, बनावटी बातों से बचिये, बनावटी काम से बचें और बनावटी रूप प्रदर्शित करना बंद कर दीजिए।

नंबर 3 सजावट, दिखावट, बनावट, सजावट। सजावट के प्रति तो सब कुछ सजा होना चाहिए। मैं भी आपसे कहता हूँ, सजाओ, खूब सजाओ, खूब सजो, खूब सज-धज कर। महाराज! अच्छा बता दिया, अब तो कल से पूरे आर्नामेंट पहनकर आएंगे पर आपने तो एक झमेला खड़ा कर दिया ड्रेस white बना दी, अब सजे तो कैसे सजे। मौका मिले तो शायद छोड़ो नहीं। बंधुओ! सजावट करना हैं तो तन का नहीं, मन का करो सजाना हैं तो तन को नहीं मन को सजाओ। तन को तो तुम कितना भी सजाओ, एक दिन इसे तो चिता की राख में बदलना ही हैं। मन को सजाने की कोशिश कीजिये।

‘तन का खूब श्रृंगार किया हैं, मन श्रृंगारों तो मैं जानु’।

यह गीत आप लोग रोज गाते हैं, तन की जगह मन का शृंगार। बाहरी सज्जा पर तुम्हारा कितना ध्यान हैं। अपने भीतर की सज्जा पर तुमने कभी सोचा, बाहर से खूब सजे-धजे हो और भीतर? कहते हैं- मन मलीन तन सुंदर ऐसे, विष से भरा कनक घट जैसे।

सोने के घड़े में अगर जहर भरा हो उस घड़े की क्या शोभा। भाइयों, ऊपर से तो इतने सुंदर हो, भीतर क्या हैं ये तो देखो। सुधार भीतर चाहिए, सजावट भीतर चाहिए, श्रृंगार भीतर चाहिए और एक बात बोलू, भीतर सजावट की भी जरूरत नहीं हैं, श्रृंगार की भी जरूरत नहीं हैं। जो आलतू-फालतू झाड़, फानूस तुमने लगा रखे हैं, उनको हटा दो। अपने आप उसकी स्वभाविक सुंदरता प्रकट हो जाएगी। जो विकृतियों का अंबार लगा रखा हैं, जिसने तुम्हें भीतर से गंदा बना दिया हैं, उसको साफ कर लो, तुम्हारा जीवन धन्य होगा, जीवन सुधर जाएगा, जीवन का उद्धार हो जाएगा। फिर कुछ कहने की जरूरत नहीं होगी, कुछ करने की जरूरत नहीं होगी, उसे पहचानिए तो अब सजावट, महाराज! थोड़ा बहुत तो ठीक हैं। ध्यान रखो, आप एक अच्छा मकान बनाते हो, इंटीरियर से संपर्क करके, इंटीरियर वालों से कांटेक्ट करते हो, वह आपके घर की सज्जा में करोड़ों रुपया खर्च कर देता हैं, बढ़िया इंटीरियर, बढ़िया फर्नीचर, सब कुछ आप रख सकते हो लेकिन इन सब के साथ बढ़िया ढंग से रहने की बात कभी सोचते हो। वस्तुतः देखा जाए तो जिसे तुम इंटीरियर मानते हो, वह एक्सटीरियर हैं। एक्चुअल में करना हैं, इंटीरियर को ठीक करो। तुम लोगों की दशा कैसी हैं, बताओ? तुम सब की फोटो बहुत सुपर हैं, एचडी quality हैं, फुल एचडी, फोटो बहुत बढ़िया हैं, एकदम एचडी हैं लेकिन सबकी एक्स-रे खराब हैं। समझ में आ रही हैं बात, फोटो अच्छी और एक्स-रे खराब तो क्या होगा? सबकी एक्स-रे खराब, भैया इस फोटो के बारे में ज्यादा मत सोचो, तुम कितनी फोटो उतारो एक दिन यह फोटो उतर जाएगी फिर उतारने की कोई बात नहीं। एक्स-रे ठीक करिये, एक्स-रे की रिपोर्ट देखिए और भीतर सुधार करने का संकल्प लीजिए तो जीवन का मजा हैं।

दिखावट, बनावट और सजावट जीवन की हैं रुकावट। इसलिए आवश्यकता हैं बदलावट, बदलाहट की। क्या करना हैं? इस रुकावट को मिटाना हैं, तो बदलाहट लाओ, अपने आप को बदल डालिए। संकल्पित हो जाइये बदलने के लिए, प्रतिज्ञाबद्ध होइये। इस बार के इस पर्यूषण में मैं अपने आप को बदल कर के ही रहूँगा। ठान लीजिये, अब मुझे परिवर्तित होना हैं, अभी तक तो मैं प्रभावित था, बहुत यहां प्रशंसक हैं। मैंने पहले दिन धर्म देशना में कहा था, वीर शासन जयंती के दिन fan मत बनिए, follower बनिए। आप मुझसे प्रभावित हो, मुझे प्रसन्नता नहीं। प्रभावित व्यक्ति प्रशंसक बनेगा, प्रशंसक बनना बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं परिवर्तित बनिये। अपने आप को परिवर्तित करने का संकल्प लीजिए और जो परिवर्तित हो जाता हैं, वह प्रशंसक नहीं, अनुयायी बन जाता हैं, जीवन को आगे बढ़ा देता हैं।

एक संकल्प लीजिए कि अब मैं अपने भीतर बदलाहट लाऊंगा, बदलाव लाऊंगा, स्वयं को बदलूंगा, अपनी चाल को बदल लूंगा, अपने ढाल को बदलूंगा, अपने भाव को बदलूंगा, अपने बर्ताव को बदलूंगा, अपने चिंतन को बदलूंगा, अपनी चर्या को बदलूंगा, अपनी भाषा को बदलूंगा, अपने व्यवहार को बदलूंगा। यदि इतना संकल्प तुम्हारे मन में जागृत हो गया और तदानुरूप पुरुषार्थ तुमने प्रारंभ कर दिया तो एक दिन वह दिन आएगा, जिस दिन तुम खुद अपने बारे में सोच कर खुद पर आश्चर्य करोगे और गौरवान्वित होओगे।

खुद पर आश्चर्य, मैं कहां था, कहां पहुंच गया, संभावनाएं असीम हैं, तुम सब-कुछ कर सकते हो। जब अंजन निरंजन हो सकता हैं, जब चारुदत्त दारूदत्त बन कर के भी अपना उद्धार कर सकता हैं तो तुम क्यों नहीं। अभी तो उतने पतित तो नहीं हो, संभलने की जरूरत हैं, सोचने की जरूरत हैं, संकल्पित होकर आगे बढ़ने की जरूरत हैं। उठो, जागो और बढ़ चलो, अपने आप को बदलो। यह बदलाव जिस पर हो गया, वह तुम्हारे जीवन को चमत्कृत कर देगा,  आनंद से भर डालेगा तो यह बदलाव का संकल्प आप सबके मन-मस्तिष्क में आना चाहिए। अब मुझे अच्छा बनना हैं, एक ही संकल्प मुझे अच्छा बनना हैं, बनना हैं और कुछ नहीं, मैं अच्छा बन के रहूँगा, मैं अच्छा बन के रहूँगा। यह मनोभाव जगाइये। ऐसी कोई दुर्बलता नहीं जो आप पर हावी होगी, ऐसी कोई बुराई नहीं जिसको तुम दूर ना कर पाओ। संकल्प चाहिये, ठान लीजिए और अगली बार जब शिविर में आओ तो इस सभा में कहिये कि मेरा तो पूरा जीवन ही बदल गया। अभी 2 दिन पहले वह बहन जी आई थी, बेंगलुरु से, बोली, महाराज! आपने तो मेरा जीवन बदल डाला वाकई में जब लोग मेरे पास आकर मेरी प्रशंसा करते हैं, तब मुझे रंच मात्र प्रसन्नता नहीं होती लेकिन जब लोग आकर मुझसे कहते हैं, महाराज! मेरा जीवन बदल गया तो मेरे हृदय में अपार खुशी होती हैं, खुशी होती हैं। यह बदलाव एक के भीतर नहीं हैं, अनेक के भीतर हैं पर एक ने आकर कहा और जब कोई युवा आकर के कहता हैं तो मुझे और अच्छा लगता हैं।

लोग युवाओं को दोषी ठहराते हैं, उन पर दोषारोपण करते हैं कि युवा धर्म से विमुख हैं पर मेरा मानना हैं, यह आरोप बिल्कुल गलत हैं। युवा धर्म से कतई विमुख नहीं हैं, युवा को केवल धर्म ठीक तरीके से समझाने की आवश्यकता हैं। वह अगर समझ जाए तो उसके भीतर जो बदलाव होता हैं, वह अप्रतिम होता हैं, हमें वो जगाना हैं। ऐसे कितने लोग यहां इस सभा में बैठे हुए हैं, जो बदले हुए हैं लेकिन बंधुओं! इस बदलाव से संतुष्ट मत होना। हमें तब तक अपने इस बदलाव की प्रक्रिया को जारी रखना हैं, जब तक मैं अपनी स्वाभाविकता को हासिल ना कर लूँ, जब तक मेरी स्वाभाविकता प्रकट ना हो जाए, तब तक मुझे बदलाव जारी रखना हैं, जारी रखना हैं, जारी रखना हैं और जिस दिन जीवन में पूर्ण बदलाव होगा, हमारी आत्मा, परमात्मा बन जाएगी, वह हमारा चरम मुकाम होगा।

आखिरी बदलाव हैं, आत्मा का परमात्मा के रूप में परिवर्तित हो जाना लेकिन उस लंबी यात्रा की शुरुआत हमें पहले कदम से करनी हैं, एक-एक कदम से हम हजार मील चल सकते हैं। हजार मील की बातें करने वाला एक कदम भी नहीं चल पाता। कुछ लोग हैं, सोचते हैं कि मैं बदलूंगा, बदलूंगा, बदलूंगा लेकिन कब? अभी विचार करूंगा। देखिये, आप लोगों में से कुछ लोग कैसे होते हैं।

दो मित्र आपस में मिले, एक दूसरे की दिनचर्या की बात हुई और पहले मित्र ने कहा कि भाई, मैं सुबह 6:00 बजे उठता हूँ। नित्य क्रियाओं से निवृत होता हूँ, थोड़ा योग-प्राणायाम करता हूँ और उसके बाद भगवान का दर्शन-वंदन करता हूँ फिर उसके बाद अखबार पढ़ता हूँ, थोड़ा न्यूज सुनता हूँ, नाश्ता करता हूँ, ऑफिस की फाइलें पलटता हूँ और ठीक 9:30 बजे अपने घर से ऑफिस के लिए निकल जाता हूँ, शाम को 7:00 बजे ऑफिस से लौटता हूँ, थोड़ा फ्रेश होता हूँ और खाना-पीना करने के उपरांत थोड़ा न्यूज़ देखता हूँ, टीवी में कोई चैनल देखता हूँ, थोड़ी देर बच्चों से बात करता हूँ और 10:00 बजे सो जाता हूँ। तो दूसरे व्यक्ति ने कहा, तुम 6:00 बजे उठते हो, 6:00 बजे कोई उठने का समय होता हैं क्या, बड़े आलसी हो। पहला बोलता हैं, तुम्हारी दिनचर्या क्या हैं? भाई, देखो मैं तो सुबह 4:00 बजे ब्रह्म मुहूर्त में उठता हूँ, ब्रह्म मुहूर्त साधु-संतों के उठने का समय हैं। 4:00 बजे उठता हूँ और उठ करके अपने शरीर को तरोताजा करता हूँ, थोड़ा योग- प्राणायाम करता हूँ और उसके बाद 1 घंटे प्रभु का ध्यान और स्तवन करता हूँ और 1 घंटे ध्यान करने के बाद स्नान आदि करके मैं मंदिर जाता हूँ, वहां भगवान की पूजा करता हूँ। उसके उपरांत आता हूँ तो कुछ न्यूज़ वगैरह देखता हूँ, अखबार पढ़ता हूँ और फिर नाश्ता करता हूँ, बच्चों को स्कूल तक छोड़ने जाता हूँ, लौटता हूँ और उसके बाद अपने ऑफिस के काम को देखता हूँ। फिर मैं 9:00 बजे ऑफिस के लिए निकलता हूँ, ठीक शाम को 5:00 बजे लौट आता हूँ, आते ही खाना खाता हूँ, रात में मैं नहीं खाता उसके बाद बच्चों के साथ थोड़ी देर खेलता हूँ, बच्चों को थोड़ा पढ़ाता भी हूँ और आजकल में धार्मिक चैनल भी देखने लगा हूँ और इस तरह 10:00 बज जाते हैं। 10:00 बजे सो जाता हूँ, फालतू के कोई काम नहीं करता, सामने वाला उसके वचनों से बड़ा प्रभावित हुआ। बोला, अच्छा आपकी दिनचर्या तो बहुत अच्छी हैं, ऐसा आप कब से कर रहे हैं? उसने कहा, कल से ही शुरू करने का इरादा हैं।

मैं बदलूंगा, कल से बदलूंगा, कब से बदलूंगा, कल से बदलूंगा तो तुम कभी नहीं बदल पाओगे। जो अभी बदलते हैं, वह बदल जाते हैं और जो कभी की बात करते हैं, वो कहीं के नहीं रहते हैं। अपने भीतर बदलाव घटित करने का संकल्प जगाइये, मुझे बदलना हैं, बदलना हैं, बस मुझे कुछ बनना हैं, अच्छा बनना हैं, अच्छा करना हैं, बस ये बाते देखे तो दिखावट, बनावट, सजावट को मिटाने के लिए अपना लीजिए बदलावहट, ले आइये बदलावहट। यह बदलावहट आयेगी तो रुकावट अपने आप मिट जाएगी। बस आज की इन चार बातों का ध्यान में रखें और अपने जीवन को कृतार्थ करें। बोलिए परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की जय!

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