उत्तम ब्रह्मचर्य

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उत्तम ब्रह्मचर्य  

आज बात ‘ब्रह्मचर्य धर्म’ की हैं। ब्रह्मचर्य जो हमारी साधना का मूल हैं, सभी साधनाओं में ब्रह्मचर्य को सबसे प्रमुख स्थान दिया गया हैं। एक तरफ ब्रह्मचर्य हैं तो दूसरी तरफ काम। काम ब्रह्मचर्य का विरोधी हैं। आज मैं चार बातें आप सब से कहूंगा। काम कैसे उत्पन्न होता हैं, काम क्यों आता हैं और काम को नियंत्रित करके हम निष्काम कैसे हो, उसके संदर्भ में 4 बातें हैं।

  • चाम
  • काम
  • राम

  • धाम

सबसे पहली बात हैं- चाम। वस्तुतः हमारे मन में जो काम उत्पन्न होता हैं, किसके कारण उत्पन्न होता हैं। इस चाम के आकर्षण में। जिस मनुष्य की देह- दृष्टि होती हैं, वो कभी ब्रह्मचर्य को धारण नहीं कर सकता। ब्रह्मचर्य को धारण करने का मतलब स्त्री-पुरुषों का एक-दूसरे के संसर्ग से दूर रहना मात्र नहीं हैं अपितु शरीर की अशुचिता को समझकर काम से विरत होने का नाम ब्रह्मचर्य हैं।

जब तक तुम्हारी दृष्टि इस चमड़ी पर रहेगी, तब तक तुम अपने भीतर उस ब्रह्मचर्य की गरिमा को प्रतिष्ठित नहीं कर सकोगे, ब्रह्मचर्य के तेज को प्रकट नहीं कर सकोगे, उसे जागृत करना हैं तो अपनी दृष्टि देह से ऊपर उठाओ। हमारे शास्त्रों में कहा गया हैं कि यदि तुम्हें ब्रह्मचर्य का ठीक तरीके से आराधन करना हैं तो हर पल शरीर की अशुचिता का चिंतन करो। जिस शरीर के प्रति तुम्हारा आकर्षण है, वह शरीर में आकर्षण के लायक कुछ हैं ही नहीं। जब तक निज और पर के देह के प्रति तुम्हारा आकर्षण हैं तब तक तुम ब्रह्मचर्य को प्राप्त नहीं कर सकते। ब्रह्मचर्य को धारण करना हैं तो देह नहीं, देही को पहचानो। भीतर की आत्मा को पहचानो, जो शरीर में होकर के भी शरीरातीत हैं, उसे पहचानने की कोशिश करो। वह आत्म-तत्व हैं, जिसकी दृष्टि आत्मा पर केंद्रित हो जाती हैं, उसके हृदय में ब्रह्मचर्य का विलास प्रकट होता हैं और जिसकी दृष्टि में केवल  शरीर होता हैं वह भोग की वासना का शिकार बनता हैं। अपने अंदर दृष्टि जाग्रत कीजिये और देह-दृष्टि से ऊपर उठने की कोशिश कीजिए। ब्रह्मचारी कौन हैं? जो किसी स्त्री को त्याग दिया, वह ब्रह्मचारी, नहीं यह तो बड़ा उथला ब्रह्मचारी हैं।

सच्चा ब्रह्मचारी कौन हैं? जो शरीर को मल का बीज मानता हुआ देखता हुआ, उसे अत्यंत वीभत्स और अपवित्र वस्तुओं का भंडार देखता हुआ जो काम से विरत होता हैं, वही सच्चा ब्रह्मचारी होता हैं तो अपनी दृष्टि चर्म से ऊपर उठाओ, ये ऊपर का चर्म का आकर्षण हैं, थोड़ा इसके भीतर देखो, एक परत उखड जाये तो अंदर क्या हैं। हम लोग बोलते भी हैं कि

‘दीपे चाम चादर मडी हाड पिंजरा देह, भीतर या सम जगत में और नहीं घिन गेह।’

ऊपर से इस चमड़े की चादर को लपेट दिया गया और भीतर क्या उसे देखने की कोशिश करो। तुम किस देह में रमने की बात करते हो, आखिर उसमे रमने जैसा हैं क्या। जिस दिन तुम्हारे भीतर यह बात समझ में आ जाएगी, उस दिन तुम्हें फिर किसी के प्रति आकर्षण नहीं होगा।

आजकल वर्तमान युग एडवांस टेक्नोलॉजी का हैं, कुछ दिन पहले एक युवक ने मुझे बहुत अच्छा क्लिप लाकर के दिखाया। एनीमेशन से दो नर कंकालों को नृत्य करते हुए दिखाया था, बहुत अच्छे स्टेप्स थे, बहुत अच्छे तरीके से उसके साथ जो म्यूजिक कंपोजिशन था, वह भी बहुत जोरदार था और वह नृत्य कर रहे थे। मैंने उसे देखा और मेरे मुख से एक ही टिप्पणी लगी कि अंततः मनुष्य के शरीर की परिणति तो यही हैं, यह भीतर हड्डी का ढांचा हैं, बाहर की यह खोल हैं, इसे निकाल दो तो कुछ नहीं होगा। दो हड्डी के ढांचे आपस में संघर्षण भी करें तो क्या मिलने वाला हैं, जिस दिन तुम्हारे हृदय में यह समझ विकसित हो जाएगी, तुम्हारे मन का काम हमेशा-हमेशा को दूर हो जाएगा। इस चर्म से अपने आप को मुक्त कर और अशुचि भावना का नियमित चिंतन, बार-बार चिंतन, जो जितनी अधिक अशुचि भावना का चिंतन करते हैं, वे अपने शील, संयम, सदाचार को उतनी ही तत्परता से अपना पाते हैं, धार पाते हैं और जीवन को सुधार पाते हैं। यह मूल तत्व हैं, अपने जीवन में उस चर्म दृष्टि को हटाना।

हमें तुलसीदास जी के जीवन का वो प्रसंग हमेशा याद रखना चाहिए जब तुलसीदास जी अपने विवाह के उपरांत अपनी धर्मपत्नी के विछोह को नहीं सह पाए और बिना सूचना के रात-अंधेरे उससे मिलने की तत्परता में चल दिए। कहते हैं कि जब निकले तो नदी में प्रचुर पानी था, प्रवाह था और नदी उफान पर थी लेकिन मन में था कि मुझे प्रिया से मिलना हैं, प्रिया से मिलना हैं, प्रिया से मिलना हैं, कोई सहारा नहीं मिला, बिजली चमकी और कुछ तैरता हुआ तख्ता सा दिखाई पड़ा, उसके सहारे ही तैरकर नदी के इस पार से उस पार पहुंच गए। एकदम तेज वेग के साथ बहती हुई नदी को उन्होंने पार कर लिया और पार करते ही जैसे ही बिजली चमकी तो देखा जिसे मैं तख्ता समझा था, वह तो मुर्दा था। एक शव के सहारे नदी पार कर गए, निकले और पहुंच गए अपनी ससुराल लेकिन आधी रात में बिना सूचना के पत्नी के यहां कैसे पहुंचे, यह बड़ा उनको पशोपेश लग रहा था और सोचा चलो surprise देना चाहिए। देखा कहां से जाया जाए? घर में दीप जल रहा था लगा कि उसे कहीं संप्रेषण हो गया, वह मेरी प्रतीक्षा कर रही हैं, खिड़की खुली हैं, इसी मार्ग से चला जाए, कैसे चले, यह रस्सी लटक रही हैं और लटकती हुई रस्सी के सहारे चढ़ गए, ऊपर चढ़े और जैसे ही अपनी धर्मपत्नी के पास पहुंचे और देखे, ये क्या, तुम यहां अचानक कैसे? तुलसीदास जी बोले, बस ऐसे ही तुम्हारी  याद में। ऊपर कैसे आये, तुमने ही तो रस्सी लटका रखी थी। जब बिजली के प्रकाश में तुलसीदास जी ने देखा तो वहां रस्सी नहीं सांप लटक रहा था। रत्नावती एकदम अंदर से उद्वेलित हो उठी, धिक्कार हैं तुम्हें, जो मेरे पीछे अपनी जान हथेली पर रख कर के यहां आया। नदी कैसे पार किया, वो पूरी कहानी भी सुना दी, तब उन्होंने थोड़ा सा संबोधन दिया था और कहा था।

अस्थि चर्म मय देह सम जेसी तेरी प्रीत, की होती रघुनाथ से तो काहे होती भववीर।

मेरे हाड-मांस के प्रति तुम्हारे मन में जितना प्रेम हैं, उतना प्रेम तुमने यदि राम से किया होता तो तुम संसार में भटके नहीं होते, धिक्कार हैं तुम्हें जो इस हाड-मांस  के शरीर से रमने की इच्छा रख कर अपनी जान को दांव पर लगा कर यहाँ आ गये। अपने भीतर के राम को पहचानो, काम को छोड़ो। कहते हैं की ये एक वाक्य तुलसीदास जी के हृदय परिवर्तन का आधार बन गया फिर तुलसी तुलसी नहीं रहे, गोस्वामी तुलसीदास बन गए, यह परिवर्तन हैं।

बंधुओ! हम चाम को पहचाने, ये ऊपर का चाम हैं, इसके भीतर कुछ भी नहीं हैं, यह रमने योग्य नहीं हैं, यह विरमने योग्य हैं। तुम्हें मनुष्य जीवन मिला हैं तो इसे भोग- भोग कर बर्बाद मत करो, इस मनुष्य जीवन को सार्थक करना हैं तो त्याग-तपस्या का रास्ता अंगीकार करके आगे बढ़ो। ये शरीर हैं, ऐसे देखा जाए तो ऊपर से देखने में रमणीय लगता हैं, भीतर नि:सार हैं लेकिन गहराई से देखो तो इस शरीर का सही उपयोग करो तो तुम भवसागर से पार भी उतर सकते हो। इस मनुष्य शरीर को कड़वी तुम्बी की तरह कहा गया हैं, कड़वी तुम्बी को अगर खा लो तो फूड पॉइज़न हो जायेगा, जान मुश्किल में आ जाएगी लेकिन उसी तुम्बी का सहारा लो तो बड़े-बड़े नदी-नालो को भी तैर कर पार कर सकते हैं क्योंकि तुम्बी डूबती नहीं। इसी तरह यह मनुष्य जीवन हैं, इसका उपयोग करोगे तो तर जाओगे और उपभोग करोगे तो मर जाओगे। जीवन का उपयोग करो, उपभोग नहीं। मनुष्य जीवन मिला हैं, इस मनुष्य जीवन को पा कर के तुम जितनी अधिक से अधिक साधना-आराधना कर सको, कर लो। अपने जीवन को आगे बढ़ाओ, इनमे कुछ भी साथ नहीं हैं, यह ब्रह्मचर्य का आधार हैं।

चाम को चाम समझो, चाम का आकर्षण छोड़ो लेकिन मनुष्य की बहुत बड़ी दुर्बलता हैं, जो इससे मुक्त नहीं हो पाता। हमारे यहां कहा, ठीक हैं, काम तुम्हारी दुर्बलता हैं, ब्रह्मचर्य की बहुत अलग तरह की व्याख्या जैन परंपरा में की गई हैं और कहा गया कि तुम पूरी तरह अपने काम को नियंत्रित करके निष्काम होने की साधना में लग जाओ, बहुत अच्छी बात हैं पर यदि ऐसा नहीं कर सकते तो तुम अपने काम को एक निश्चित दिशा में नियोजित करो, काम को किसी एक पर केंद्रित कर लो, उस पर उसे नियंत्रण विहीन न होने दो, उस पर एक अंकुश रखो। काम मनुष्य के जीवन की एक बड़ी कमजोरी हैं, हर कोई इस कमजोरी को जीत नहीं पाता। तुम्हारे पास यदि ब्रह्मचर्य की साधना की ताकत नहीं हैं तो कोई बात नहीं, विवाह के बंधन में बंधो और अपने काम को नियंत्रित करके आगे चलो और गृहस्थों के लिए कहा गया हैं कि स्वधार-संतोष व्रत का पालन करो। यही तुम्हारे काम का संयम हैं क्योंकि काम काम में नहीं, संयम में हैं। काम के लिए काम नहीं, राम के लिए काम, निष्काम होने के लिए काम। तुम गृहस्थ हो, अपने मन की दुर्बलता और संतति के विकास के लिए तुम्हें काम का आश्रय लेना हैं तो लो पर विवाह के बंधन में बंध कर, तुम्हारे अंदर पवित्रता होनी चाहिए और स्त्री-पुरुष, विवाह के बंधन में बंध कर पति-पत्नी के मधुर संबंध से जुड़े और उसके उपरांत स्त्री-पुरुष का  पति-पत्नी के अतिरिक्त संसार के हर स्त्री के प्रति मां, बहन और बेटी जैसी पवित्र दृष्टि हो। हर पुरुष के प्रति पिता, पुत्र, भाई जैसा पवित्र दृष्टिकोण हो, यह ब्रह्मचर्य हैं, इसका अनुपालन होना चाहिए, इसी का नाम स्वधार-संतोष व्रत हैं।

आज की सारी व्यवस्था समाप्त होती जा रही हैं, आज की स्थिति कुछ और हैं, बांह में हैं और कोई और चाह में हैं और कोई की बातें आज चरितार्थ हो रही हैं, आज यह बातें आम होती जा रही हैं। कहां हमारे यहां उद्वत ब्रह्मचर्य की बात की गई और आज लोग विवाह पूर्व और विवाहेत्तर संबंधों में लीन होते जा रहे हैं। हमारे संबंधो की पवित्रता खंडित होते जा रही हैं, पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण ने उनमुक्त यौनाचार को ओर अधिक बढ़ावा दे दिया हैं। जब से live in जैसे कंसेप्ट को कानूनी मान्यता पड़ गई, तब से तो मनुष्य की उत्श्रृंखलता और बढ़ते जा रही हैं। हमें चाहिए कि हम इस पर नियंत्रण लाये और अपने आप को बचाएं क्योंकि इसका कभी अंत तो होने वाला नहीं हैं। कामना से कामना को कभी अंत नहीं किया जा सकता तो चाम को समझो और काम को नियंत्रित करने की कोशिश करो क्योंकि काम दुर्गति का कारण हैं, तुम्हारा पतन कराएगा। बच्चों विवाह के बंधन में बंधने के बाद पवित्रता के साथ जीवन जियो और यह मान करके चलो मुझे काम से निष्काम होना हैं। काम मेरा लक्ष्य नहीं, काम मेरा साध्य नहीं, बल्कि काम तो तृष्णा का अभिवर्धक हैं। चाम के मूल्य को समझने वाले काम से विरत होते हैं, चाम के अर्थ को समझने वाले लोग काम से दूर हो जाते हैं, उन्हें उनकी तरफ कोई आकर्षण नहीं होता।

आज के समय में लोगों के हृदय में देह आकर्षण हैं और देह आकर्षण को ही लोग प्रेम का नाम देने लगते हैं। बंधुओं! सच्चे अर्थों में वह प्रेम नहीं, वह तो केवल शारीरिक आकर्षण हैं, जो थोड़े दिन तक टिकता हैं, बाद में सब छूट जाता हैं। वस्तुतः प्रेम हमारे भीतर का आत्मिक स्तर का प्रेम होना चाहिए, वह प्रेम अगर एक बार उद्घाटित हो गया तो जीवन की दिशा-दशा सब परिवर्तित हो जाएगी। गृहस्थों को कहा गया कि तुम संयम में रहो, अपने स्वधार-संतोष व्रत का पालन करो, एक-दूसरे के अतिरिक्त सारे संसार में अपने भीतर पवित्रता ले आओ, तुम्हारा जीवन आगे बढ़ जाएगा क्योंकि काम का कभी अंत नहीं होता। हमारे अंदर दो प्रकार के काम हैं, एक मदन काम और दूसरा इच्छा काम। मदन काम, जो वासना की और हमें धकेलता हैं, वह काम कभी तृप्त नहीं होता। मनुष्य कितना भी करें, तृप्त नहीं होता। जैसे कोई व्यक्ति खाज खुजा-खुजा कर अपने शरीर को तृप्त करना चाहे तो क्या होगा। बोलो, खाज खुजाने से आज तक किसी को स्थाई रूप से आराम मिला। महाराज! जितनी देर खाज खुजाते हैं, उतनी देर आराम मिलता हैं, उसके बाद क्या होता हैं, पहले से ज्यादा जलन होती हैं। संत कहते हैं- ‘यही तुम्हारे मदन काम का हाल हैं, खाज-खुजली जैसी स्थिति हैं’। पहली कोशिश करो कि शरीर में खाज ही ना हो और खाज आ जाये तो उसे खुजाने की जगह कोई मरहम लगाओ ताकि वो खाज जड़ से खत्म हो जाए। बस मैं तुमसे यही कहता हूं, मन में विकारो की खाज ही ना आये और यदि खाज आये तो उसे खुजाने की जगह तत्वज्ञान की मरहम लगा लो, वैराग्य की मरहम लगा लो, हमेशा-हमेशा वो खाज मिट जाएगी।

कोशिश करो, अगर तुम पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकते तो स्वधार-संतोष व्रत का पालन करो। विवाह पूर्व और विवाहेत्तर संबंधों से बचो, इनका संकल्प रूप से परित्याग करो तब तुम काम से निष्काम होओगे और दूसरा इच्छा काम, हमारी मन की इच्छायें हैं, वह तो अनंत हैं, एक को पूरी करते हैं और दूसरी खड़ी हो जाती हैं, दूसरी को पूरी करते हैं, तीसरी खड़ी हो जाती हैं। हम जितनी ज्यादा इच्छाओं को पूर्ण करने की कोशिश करते हैं, हमारे अंतरंग की इच्छायें उतनी ही बढ़ती-बढ़ती जाती हैं, उसे कोई पूर्ण नहीं कर पाता, उसे कोई तृप्त नहीं कर पता तो अपनी इच्छाओं को शांत करें, अपनी इच्छाओं का शमन करने का हमारा प्रयास होना चाहिए, इच्छाओं की पूर्ति से इच्छाओं की तृप्ति नहीं होती, इच्छाओं के नियंत्रण से इच्छाओं की तृप्ति होती हैं, काम की पूर्ति से काम तृप्त नहीं होता पर काम के नियंत्रण से और काम के संयम से ही काम तृप्त होता हैं। इस रहस्य को जो जानते हैं, वह बृह्मचर्य के रास्ते पर आगे बढ़ने में सफल होते हैं।

मुझे तुम लोगो से बृह्मचर्य की बात करनी हैं, जो गृहस्थी में फंसे हैं, यहाँ भी तुम्हारे भीतर बृह्मचर्य आना चाहिए, तुम्हारी दृष्टि में पवित्रता आनी चाहिए। आज सबसे बड़ी विडंबना यह हैं कि लोगों की दृष्टि की पवित्रता खंडित हो गई, पवित्रता समाप्त हो गई और वर्तमान की स्थिति तो इतनी बुरी हो गई, इतनी बुरी हो गई कि सगे भाई-बहन के संबंधों की पवित्रता भी अब कलंकित हो गई। मेरे पास ऐसे कई प्रसंग आए हैं, जिनमें भाई और बहन, एक मां के जाए भाई-बहनों के साथ पवित्रता नहीं हैं, चचेरे भाई-बहनों में तो संबंध भी हो गये, शादी भी हो गई। कहां जा रहे हैं आप? उन्मुक्त यौनाचार को खुला बढ़ावा देने का यह परिणाम हैं, इसके पीछे सहजीवन की वृति और शिक्षा की प्रवृति बन गई, वह भी एक बड़ा कारण हैं। आज स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के साथ रहते हैं, बचपन से ही पढ़ते-लिखते शुरू होते हैं और यौवन अवस्थाये आते ही मर्यादायें  टूट जाती हैं, दृष्टि की पवित्रता नहीं रह पाती, अपने आप पर संयम नहीं रह पाता, सब का पतन हो जाता हैं, मामला गड़बड़ हो जाता हैं।

मैं जब आज युवक-युवतियों से बात करता हूं, जो आज उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ते हैं तो वह बात मुझे बोलते हैं, मुझे बड़ी वेदना भी होती हैं और लगता हैं कि क्या हो रहा हैं। आज ज्यादातर युवक-युवतियों में घोर स्खलन हैं, मौज-मस्ती के नाम पर वह सब कुछ हो रहा हैं जो कतई स्वीकार नहीं होना चाहिए। हमें इनकी जड़ में जाना हैं, ये काम हमें कहां ले जाएगा, वह हमारे जीवन का पतन करेगा। हमें आगे बढ़ने की जरूरत हैं, तुम गृहस्थों के लिए काम नहीं काम पुरुषार्थ की बात की गई।

काम और काम पुरुषार्थ में क्या अंतर हैं? उच्श्रंखल यौनाचार की प्रवृत्ति को काम कहेंगे और उसे धर्म संबंध मर्यादा के साथ जीने को हम काम पुरुषार्थ कहेंगे। जब व्यक्ति विवाह के बंधन में बंध कर अपने जीवन को संयम के साथ आगे बढ़ाता हैं तो उसका काम काम नहीं, काम पुरुषार्थ बन जाता हैं क्योंकि उसका उद्देश्य आगे संतति का विकास और काम से निष्काम होने की दिशा में चलता हैं, एक को छोड़कर बाकी सब संबंध उसके पवित्र बन जाते हैं, इसलिए वो काम पुरुषार्थ हो जाता हैं लेकिन जिसके जीवन में ये चीजें नहीं हैं वह कामांध बनता हैं और कामांध व्यक्ति निश्चित तौर पर अपना पतन करता हैं। हम काम पुरुषार्थ को अपने जीवन का आदर्श बनाएं, ये ब्रह्मचर्य हमें ये ही सिखाता हैं कि हमारे अंदर काम हैं और हम काम से पूरी तरह निष्काम नहीं हो पा रहे हैं तो कोई बात नहीं कामांध बनने से बचे और अपनी मर्यादाओं को कतई  खंडित ना होने दें। उसे पूरी तरह सुरक्षित रख कर के चले ताकि हम अपने जीवन को पवित्र बना सके और जीवन के सार तत्व को हृदय में उद्घाटित कर सके, यह प्रयास हमारा होना चाहिए लेकिन आजकल प्रायः लोगो में ऐसा कम देखने को मिलता हैं तो लगता हैं हम क्या बताएं, कहां जा रही हैं हमारी समाज, क्या हो गई हमारी दिशा, दिशाहीन व्यक्ति को हमें मोड़ना होगा, अपने जीवन में हमेशा अच्छी भावना भानी होगी। व्यक्ति जब इन सब चीजों पर गंभीरता से विचार करेगा तभी इस तरह के परिणाम पा सकेंगे।

आज हम देखते हैं कि आये दिन कितने प्रकार की घटनाएं घटती हैं, लोग कहते हैं हमारी बेटियां सुरक्षित नहीं हैं, किसी के साथ किसी भी तरह का हादसा होता हैं। आखिर इसका जिम्मेदार कौन हैं, इसके जिम्मेदार आप हो, आप की मानसिकता हैं। उस मानसिकता को बदलना होगा, जब तक व्यक्ति के हृदय में अध्यात्म प्रतिष्ठापित नहीं होगा, कुछ भी बदलाव नहीं होगा तो कामजयी बनना हैं।

पहले काम पुरुषार्थी बनो, मर्यादा के साथ अपने जीवन को आगे बढ़ाने का संकल्प लो। ये दृढ संकल्प लो कि मैं कोई भी विवाहपूर्व और विवाहेत्तर संबंध का परित्याग करता हूं और यदि जीवन में कभी हुआ हो तो योग्य गुरु के सानिध्य में जाकर उसका पश्चाताप करूंगा, अपने जीवन को बदलूंगा और अपने इस जीवन को कलंकित होने से बचाऊंगा, ये संकल्प होना चाहिए तब आप अपने जीवन का कोई लाभ उठा सकेंगे  अन्यथा व्यर्थ हैं, कुछ नहीं मिलने वाला। सारी जिंदगी आदमी दौड़ता रहता हैं, कभी-कभी किसी चक्कर में फंसता हैं तो पूरा कैरियर चौपट हो जाता हैं, अच्छे-अच्छे उम्र दराज लोगों की हालत खराब होती हैं, अपने आप पर संयम रखो। तुम सब यहाँ जितने बैठे हो, ज्यादातर लोग विवाहित हैं, अपने मन से पूछो कि क्या तुम अपने दांपत्य जीवन के प्रति पूर्णता ईमानदार हो या नहीं। यदि अपने प्रति ईमानदार हो तो कोई बात नहीं और अगर नहीं हैं तो उसे ठीक करने का संकल्प लो, ये तुम्हारा दायित्व हैं। अच्छे-अच्छे लोगों की स्थिति खराब हो जाती हैं, कैसे हम बोले, लोगों की अपनी अंतहीन लालसा छूटती नहीं।

एक बार एक दादाजी आए, करीब 85 साल की उम्र थी, उन्होंने मुझे नमोस्तु किया, शरीर काँप रहा था, महाराज! आशीर्वाद दो, मैं ब्रह्मचर्य का अभ्यास कर रहा हूं। मैंने कहा, बाबा, आपकी उम्र कितनी हैं। वह बोले, 85 साल। हम बोले अभ्यास अभी करोगे तो परलोक में पा लोगे। शरीर जर्जर हो जाता हैं लेकिन मन नियंत्रित नहीं हो पाता। बंधुओ! वासना का संबंध व्यक्ति के मन से हैं, उम्र सैनी से नहीं। उम्र पक जाने के बाद भी लोग वासना से मुक्त नहीं हो पाते और जवानी में भी लोग ब्रह्मचर्य का आनंद लेते हैं। मेरे संपर्क में ऐसे कई युवक हैं, जिन्होंने विवाह के उपरांत भी आज तक ब्रह्मचर्य को धारण कर रखा हैं, युवावस्था में और मेरे पास ऐसे भी कुछ बुजुर्ग आए, जिन्होंने प्रायश्चित लिया, जिनकी  70-75 साल की उम्र में भी अनैतिक संबंध रहे। दोनों तरह की स्थिति। हमारे गुरुदेव कहते हैं- वासना का संबंध न तन से हैं ना वशन से अपितु माया से प्रभावित मन से हैं।

भागवद का प्रसंग आप सब को याद हैं, सुखदेव जी जो आजन्म दिगंबर थे, वह निकल रहे थे और तालाब के किनारे कुछ स्त्रियां स्नान कर रही थी। सुखदेव जी सहज भाव से निकल गए और स्त्रियों को भी कोई पता नहीं लगा। वह निकल गए और थोड़ी देर बाद उनके पिता व्यास जी उधर से गुजरे और जैसे ही व्यास जी उधर से गुजरने को हुए, सारी स्त्रियां अपने अंगों को संकुचित करने लगी और वस्त्रो से ढकने लगी। व्यास जी ने कहा, क्या कर रही हो? अभी- अभी मेरा जवान बेटा दिगंबर गुजरा, तब तो तुम्हें कोई संकोच नहीं निकला और मैं बुड्ढा इधर से गुजर रहा हूं और तुम लोगो को संकोच, ऐसा क्यों। स्त्रियों ने जो बात कही वह ध्यान देने योग्य ने कहा, उन्होंने कहा, सुखदेव जी जवान हैं, अच्छी बात हैं और आप बुजुर्ग हो गए, यह भी बात सही हैं लेकिन आपसे केवल इतना निवेदन करते हैं कि सुखदेव जी भले जवान हैं पर उनके मन की वासना बूढ़ी हो गई। वे कब निकले, हमें उसका पता ही नहीं लगा और आप जवान भले ही वृद्ध हो गए, आपके मन की वासना आज भी जवान हैं, इसलिए हमारा ध्यान आपकी तरफ खिंच गया।

सवाल उम्र का नहीं हैं, सवाल मन का हैं। काम को नियंत्रित करिए और उसके लिए क्या करें? राम को पहचानो, अपने आत्मा-राम को पहचानो। बस आत्म दृष्टि जिसके भीतर विकसित हो जाती हैं, उसे फिर बाकी बातें नि:सार लगने लगती हैं, बेकार लगने लगती हैं, व्यर्थ लगने लगती हैं। हम काम से राम की ओर मुड़े, देहदृष्टि छोड़े और आत्मदृष्टि को उद्घाटित करे। देखिये, हमारे लिए कुछ भी असंभव नहीं। जीवन का एक अलग आनंद और एक अनुभूति होगी पर उस तरफ बहुत कम लोग  देखते हैं। हमारे गुरुदेव ने बहुत अच्छी बात कही हैं, प्रीत मैं उसे मानता हूं जो अंगातीत होता हैं और गीत में उसे मानता हूं जो संगातीत होता हैं। संगातीत गीत और अंगातीत प्रीत की अनुभूति वो ही कर सकते हैं, जो अपनी आत्मा को पहचानते हैं। आत्मा को पहचानो, मैं देह नहीं चेतन हूं, इस बात को अपने ह्रदय में अंकित कर लो, स्थायी रूप से अंकित कर लो तो फिर तुम्हारा मन कभी डांवाडोल नहीं होगा, तुम्हारे चित्त में किसी भी प्रकार की विकृतियों उत्पन्न नहीं होगी और जीवन को आगे बढ़ा सकोगे।

हमारे पुराणों में ऐसे अनेक आख्यान भरे पड़े हैं, जिनने गृहस्थ अवस्था में भी अपने ब्रह्मचर्य के तेज से नये आदर्श उपस्थित किये। विजय सेठ और विजया सेठानी की कहानी आप सब को पता होनी चाहिए, पुराने जमाने में संस्कार कैसे होते थे और वो कैसे लोग अपने जीवन में उतारते थे। विजय और विजया दोनों अलग-अलग गुरुकुल में पढ़ते थे। विजय सेठ का गुरुकुल में अध्ययन हुआ और विजया का आर्यिकाओं के पास अध्ययन हुआ। उस समय प्रणाली गुरुकुल शिक्षा की प्रणाली थी, गुरुकुल में पढ़ाया जाता था और जब अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद वह अपने गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करते थे तो गुरु चरणों में कुछ संकल्प लेकर जाते थे, प्रतिज्ञा लेकर जाते थे, दोनों ने प्रतिज्ञा ली और वो प्रतिज्ञा उनके मन तक थी। संयोगतः  दोनों के मध्य विवाह हुआ, विवाह के बाद जब दोनों मिले तो विजय सेठ ने कहा, इन दिनों शुक्ल पक्ष चल रहा हैं और मेरा शुक्ल पक्ष में ब्रह्मचर्य का नियम हैं तो विजया ने कहा, यह तो अहोभाग्य हैं मेरे लिए पर आपके लिए चिंता का विषय हो सकता हैं। मैंने अपनी गुरुवाणी से कृष्ण पक्ष में ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया हैं, मेरा कृष्ण पक्ष का ब्रह्मचारी का व्रत हैं, अब आप एक काम करें मुझे तो एक बहुत अच्छी अनुकूलता मिल गई कि मैं आप की पत्नी बनी। आपका शुक्ल पक्ष का ब्रह्मचर्य और मेरा कृष्ण पक्ष का ब्रह्मचर्य तो मैं पूरे के पूरे इस काम के कीच से बच जाऊंगी और मेरा अखंड ब्रह्मचर्य हो जाएगा। आप से निवेदन हैं, आपको अपने वंश को आगे बढ़ाना हैं तो किसी दूसरी स्त्री से विवाह कर ले ताकि आप अपना काम कर सके। विजय सेठ ने कहा, नहीं, अब इसकी जरूरत नहीं। अगर नियति को यही पसन्द हैं तो मुझे स्वीकार्य हैं, अगर तुम अखंड ब्रह्मचर्य व्रत ले सकती हो तो क्या मैं कमजोर हूं। अभी हम दोनों में एक का शुक्ल पक्ष, एक का कृष्ण पक्ष हैं। चलो, अब दोनों पूरे मास का ब्रह्मचर्य लेते हैं और अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। ये एक आदर्श।

हमारी संस्कृति का आजकल कहां ऐसा मिलता हैं, बहुत कम देखने को मिलता हैं हालांकि ऐसे लोगों का पूरी तरह अभाव नहीं। हमें उन्हें ही आदर्श बनाना चाहिए, जिनकी दृष्टि आत्मा पर केंद्रित हो जाती हैं, वे कभी भटकते नहीं और जिनके भीतर अध्यात्मिक दृष्टि प्रकट नहीं होती, वो कदाचित ऊपर से ब्रह्मचारी हो भी जाए पर भीतर का ब्रह्मचर्य गठित नहीं होता। आत्म दृष्टि चाहिए, अपने भीतर के आत्माराम को पहचानो, मैं कौन हूं, मेरा क्या हैं, इसे जानने की कोशिश करो और फिर देखो जीवन का क्या आनंद आता हैं, फिर ज्यादा कोई छटपटाहट तुम्हारे भीतर नहीं होगी, फिर बैचनी नहीं होगी। मन में एक अलग आलाप और एक अलग प्रकार की संतुष्टि तुम्हारे भीतर गठित होगी, जो तुम्हारे जीवन को एक नयी ऊंचाई प्रदान करेगी, उसकी तरफ तुम्हारी दृष्टि जानी चाहिए। राम को पहचानो, काम के परिणाम को देखो और एक बात हर पल में ध्यान में रखो कि काम का अंत कभी अच्छा नहीं हैं, उसमें एक पल का सुख हैं और बहुत काल का दु:ख हैं।

ये काम भोग में हैं क्या, रखा क्या हैं, विचार करो, उसकी निःसारता पर विचार करो, जिसमे क्षण मात्र का सुख और बहुत काल का दुःख। थोड़ा सा सुख और बहुत सारा दुःख। उसका कोई पैमाना नहीं, सारे अनर्थो का यह खान हैं, यह व्यर्थ हैं, यह बात तुम्हारे मन-मस्तिष्क में  बैठ जाए तो फिर तुम्हारे मन में कोई आकर्षण ही नहीं बचेगा, एक वितृष्णा का भाव जागृत हो जाएगा, जो तुम्हारी लालसा हैं वो समाप्त हो जाएगी। जीवन की दिशा-दशा सब परिवर्तित हो जाएगी, उसकी तरफ दृष्टि जगाइए और अपने मन को मोड़िये और जीवन के वास्तविक विलास का आनंद लीजिये। आत्मा से संतुष्टि होनी चाहिए, आत्मा की तरफ दृष्टि होनी चाहिये, जिसकी ऐसी दृष्टि होती हैं, वह अपने जीवन को एक नई ऊंचाई प्रदान करते हैं।

हमारे यहां अयोध्या प्रसाद गोली एक बहुत बड़े साहित्यकार विद्वान हुए, उन्होंने एक घटना लिखी। एक ब्रह्मचारिणी गाय की बातें, आप सब सुनकर के ताज्जुब करोगे कि गाय में भी ब्रह्मचर्य हो सकता हैं। मैं तो यह देखता हूं कि आजकल आदमियों में जो काम नहीं होते, वह सब जानवरों में हो जाते हैं और जानवरों के काम आदमियों में हो गए। उन्होंने एक घटना लिखी कि ग्वालियर के एक परिवार में एक गाय पलती थी, उस गाय ने अपने पीछे 7-8 बछड़ा-बछड़ियों को जन्म दिया, उसके बाद उसे पुनः गर्भवती करने का प्रयास किया जाने लगा और एक दिन घर में पलने वाली बेटी को सपना आया और सपने में गाय ने कहा कि मैं ब्रह्मचर्य व्रत ले चुकी हूं, अब मुझे पुनः गर्भवती बनाने का प्रयास ना किया जाये अन्यथा मैं कुएं में कूदकर जान दे दूंगी। बच्ची ने घर के लोगों को बात बताई, घर के लोगों ने उसे सुनकर अनसुना कर दिया और बोले, आदमी में ब्रह्मचर्य व्रत नहीं गाय में कहाँ से होगा, ये तो सपना हैं और उसे फिर से गर्भवती बनाने की कोशिश की गई और जैसे ही उसके लिए कोशिश की गई, वो तेजी से भागी और घर के आंगन में कुआं था, उसमे कूद कर अपनी जान दे दी। जैसा सपने में हुआ था, वैसा ही हुआ। आखिरी समय में उसके दो जुड़वा बचे थे, उन दोनों बच्चों के विषय में लिखा कि इन दोनों बच्चों का रूप-रंग एक सा था और बड़ा प्रेम था, दोनों की लघु शंका भी एक साथ होती थी, ये संस्कार। एक गाय के भीतर में ब्रह्मचर्य हो सकता हैं।

आत्मा की पहचान तो किसी को भी हो सकती हैं, जिस दिन तुम्हारा आत्मा अनुराग जाग जाएगा, बाकी सब बातें तुम्हें व्यर्थ दिखने लगेगी, उनका कोई अर्थ नहीं रहेगा, उनसे तुम्हें कोई लाभ नहीं हो पाएगा, उनको तुम सोच नहीं पाओगे। अपने जीवन को उसी अनुरूप ढालने की कोशिश कीजिये, अपने जीवन को उसी अनुरूप बढ़ाने का प्रयास कीजिये तो वह हमारे जीवन की दिव्यता और धन्यता का आधार बनता हैं। हमे उस तरीके से सोचने कि कोशिश करना चाहिए, वैसा प्रयास करना चाहिए तो ये जीवन को आगे बढ़ाने का प्रयास निरंतर होते रहना चाहिए। हम राम को पहचाने, आत्मा को पहचाने। वस्तुत: ब्रह्मचर्य का अर्थ भी यही हैं, ब्रह्म यानि आत्मा और चर यानी रमण । आत्मा में रमण करना ही वास्तविक ब्रह्मचर्य हैं और जिसे हम ब्रह्मचर्य कहते हैं वह आत्मा में रमण करने की चर्या हैं। हमारी जो चर्या, जो क्रिया हमें आत्मन मुखी बनाएं, वह ब्रह्मचर्य हैं और जो हमें आत्मा से विमुख कर दे, वह अब्रह्म हैं।अब्रह्म से ब्रह्मा की ओर जाने के लिए हमें आत्मा से निकटता बढ़ाने की जरूरत हैं और आत्मा से निकटता तभी बढ़ेगी, जब हम आत्मा के स्वरुप को पहचानेंगे। मैं कौन हूं, मेरा स्वरूप क्या हैं, उसे जानो। जो पूर्ण हैं, कृतकृत्य हैं, परम तृप्त हैं, जहाँ किसी और की कोई आवश्यकता नहीं, मैं वह आत्मा हूँ। उस आत्म दृष्टि से संपन्न हूँ, जीवन बदल जाएगा।

हमारे यहां एक कथा आती हैं, देशभूषण और कुलभूषण मुनिराजो की, दोनों राजकुमार गुरुकुल में पढ़ते थे। 12 वर्ष तक की शिक्षा उन्होंने ग्रहण की, यौवन अवस्था संपन्न होने के बाद शिक्षा पूर्ण करके घर लौटे। दोनों राजकुमारों के घर लौटने के लिए पूरे के पूरे नगर को दुल्हन की तरह सजाया गया। पूरे नगर निवासी उनके लिए पलक-पांवड़े बिछाए बैठे थे, हमारे भावी राजकुमार यहां आ रहे हैं और दोनों रथ पर आ रहे हैं और अचानक दोनों की दृष्टि महल के झरोखे में खड़ी एक 16 वर्षीय युवती पर पड़ी और दोनों की जैसे ही दृष्टि पड़ी, दोनों के दोनों काम के दसों बाणो से एक साथ बिध गए और दोनों ने मन ही मन फैसला कर लिया कि अब अगर हमें आगे अपनी जीवनसंगिनी को चुना हैं तो बस हमारी जीवनसंगिनी यही होगी। हमारे जीवनसंगिनी यही होगी, मन में आ रहा हैं कि मैंने जीवनसंगिनी बनाने का मन तो बना लिया लेकिन कहीं भैया ने ऐसा सोच लिया तो सोच लिया तो क्या होगा, इस मामले में कोई कॉम्प्रोमाइज नहीं होगी, मैंने पहले देखा मेरा होगा, अब जो होगा, विवाह तो मैं ही उस से करूँगा, चाहे जो हो। इधर बड़े भाई के मन में आ रहा हैं, मैंने उसे देख लिया हैं और मेरी जीवन संगिनी तो वह ही हैं लेकिन छोटे भाई ने कुछ कहा तो जो कुछ कहा होगा निपट लेंगे,  मैं बड़ा हूँ और मेरा अधिकार पहले हैं, पहले मेरा विवाह होगा और बाद में छोटे का। जो होगा, देखेंगे और अगर उसने कुछ कर लिया तो मेरे बाँहो में बहुत बल हैं, हम उन से युद्ध करेंगे और युद्ध में पराजित कर देंगे और फिर इससे विवाह करेंगे। दोनों के अंदर ऐसी उधेड़बुन चल रही थी। सच्चे अर्थों में दोनों एक दूसरे से गूंथ करके लड़ रहे थे, जूझ रहे थे, रथ आगे बढ़ रहा था और रथ के साथ-साथ उनका मनोरथ भी आगे बढ़ रहा था। अचानक रथ रुका और उनके कानों में उनकी मां की और पिता की एक साथ आवाज आई और कहा बेटी, अपने भैया की आरती उतारो। बेटी, अपनी भैया की आरती उतारो और जैसे ही मां और पिता की एक साथ आवाज सुनी, दोनों का ध्यान टूटा और देखा तो सामने देखते हैं, माता-पिता हैं और वही युवती हैं जिसके पीछे एक-दूसरे से उलझे थे। बेटा, तेरी बहन। जब तू यहाँ से गया था तब ये 4 बरस की थी और अब 16 वर्ष की हो गई हैं। चलो, अब घर चलो। चलो, अब घर चलो। ये बात सुनते ही दोनों के हृदय में घोर आत्मग्लानि हो गई, अंदर से छटपटा गए और छटपटा करके बोले कि ये क्या हो गया, हमने क्या कर लिया। ये हमारी सगी बहन, धिक्कार हैं उस काम को। जिसने भाई और बहन की पवित्रता को भी खंडित कर दिया, अब हमे इस काम की कोई जरूरत नहीं। बेटा, घर चलो, क्या कर रहे हो। बेटे बोले, नहीं अब घर जाने की जरूरत नहीं हैं, दोनों ने एक-दूसरे का चेहरा देखा और बोले, अब हम इस घर में नहीं जाएंगे, निज घर में जाएंगे। हमने देख लिया इस शरीर के रूप आकर्षण में मुग्ध होकर हमने कितना बड़ा अनर्थ कर दिया। आज हम दोनों भाई एक दूसरे को इतना प्रेम करते थे लेकिन एक के पीछे हम एक दूसरे की हत्या पर भी आमादा हो गए, धिक्कार हैं उस काम को, धिक्कार हैं उस वासना को। अब हमें काम नहीं राम की ओर जाना हैं और राम के माध्यम से धाम को पाना हैं और दोनों के दोनों तत्क्षण वहां से वन में चले गए और दिगंबरी दीक्षा धारण कर ली। परम तपस्या की, ध्यान में निमग्न हुए और उनके ऊपर जब उपसर्ग आया तो कहते हैं, रामचंद्र जी, लक्ष्मण जी ने अपने वनवास के काल में उनके उपसर्ग का निवारण किया और उन्हें केवल ज्ञान की प्राप्ति हो गई। यह देशभूषण-कुलभूषण मुनिराज हमारी संस्कृति के भूषण बन गये। यह हैं वैराग्य।

काम से राम की और मुड़ने की वृति और जब तुम काम से राम की ओर मुड़ोगे तभी शिव धाम तक पहुंच पाओगे, इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं हैं। इसलिए चाम से दृष्टि मोड़ो, काम को नियंत्रित करो, राम को पहचानो, धाम पहुंच जाओगे, फिर दुनिया की कोई ताकत तुम्हें रोक नहीं पाएगी। आज के ब्रह्मचर्य के दिन में आप सबसे केवल इतना ही कहना चाहता हूं कि इसे आदर्श बनाओ और एक संकल्प लो की हम विवाहेतर संबंध नहीं करेंगे, जो अविवाहित हैं विवाह पूर्व कोई संबंध नहीं करेंगे। यह संकल्प सब को लेना हैं। हमारे अंदर यह  दृष्टि हो, यह पवित्रता हैं। बंधुओं! यह तुम्हारी दुर्बलता हैं पर तुमने दृष्टि मोड़ ली तो यही तुम्हारी उपलब्धि हो जाएगी। दुर्बलता को दूर करो, अपने जीवन में पवित्रता को उद्घाटित करने का सतप्रयास करें, यही हमारे जीवन का सार हैं। बोलिये परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की जय।

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