उत्तम मार्दव धर्म (Supreme Modesty)

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क्या होता है मार्दव धर्म?

कोमलता के भाव ही मार्दव है। चित्त की सरलता, विनय करना, आदर करना, बहुमान करने के भाव ही मार्दव धर्म है। उत्तम मार्दव धर्म अपनाने से मान व अहंकार का मर्दन होता है और व्यक्ति अपनी सच्ची विनयशीलता को प्रकट करता है। जब तक हम स्वयं के बारे में सोचते हैं तो अहम भाव हमारे साथ रहता है। मार्दव धर्म हमारे अहम भाव का विसर्जन कर ‘हम’ भाव की ओर ले जाता है, ह्रदय की सरलता को प्रकट करता है।

किन भावों से होता है मार्दव धर्म लुप्त?

स्वयं का सम्मान और अपमान दोनों ही हमें चिंतित करते हैं। पैसा, रूप, प्रतिष्ठा, शान-शौकत, ज्ञान आदि के आधार पर हम चाहते हैं कि सभी हमें मान, सम्मान, बहुमान दें। यह है तो बहुत अच्छा पर अपने ही बारे में सोचना, खुद को श्रेष्ठ प्रदर्शित करना, सच्चा और सही मानना हमारे अहम अहंकार को दिखाता है।

जीवन में मार्दव धर्म कैसे अपनाएं

जो महान लोग होते हैं वे कभी मान नहीं करते, बड़ा मानने से कोई बड़ा नहीं होता, बडप्पन के कार्य करने से ही इंसान बड़ा होता है क्योंकि सम्मान देने वाला खुद ही सम्मानित हो जाता है। हमें सभी को सम्मान देना है। जिनका हमारे जीवन पर उपकार है, जीवन के निर्माण में योगदान है उनका बहुमान करना है। किसी का भी अपमान नहीं करना है और खुद को कभी अपमानित महसूस नहीं करना है। यदि ये बातें जीवन में घटित हो गई तो हमारा ये मार्दव धर्म सार्थक हो जाएगा।

Edited by: Ankita Jain, Michigan

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