उत्तम शौच

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उत्तम शौच  

एक जिज्ञासु भक्त, भगवान के चरणों में प्रार्थना कर रहा था, उसकी पुकार सुनकर आकाश से वाणी गूँजी। वत्स! तुम क्या चाहते हो, तुम क्या चाहते हो? जैसे ही ये वाणी गूँजी, उसके मुख से निकला, मेरे पास संपत्ति नहीं हैं, मैं सम्पति चाहता हूँ, तथास्तु की आवाज आई। उसे संपत्ति मिल गई फिर कुछ दिन बाद भगवान के चरणों में आया, वही गुहार करना शुरू कर दिया। फिर आकाश से वाणी गूँजी और पूछा, वत्स! तुम क्या चाहते हो? उसने कहा, भगवान संपत्ति तो मिल गई पर संतान नहीं हैं, हमें संतान चाहिए। संपत्ति मिल गई, संतान नहीं हैं, संतान के अभाव में संपत्ति का मैं क्या करूंगा, हमें संतान चाहिए। आकाशवाणी हुई, तथास्तु। और कुछ दिनों बाद उसे एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हो गई, फूला न समाया। कुछ दिन बाद भगवान के पास वही मांग-पुकार शुरू, भगवान ने पूछा, अब क्या चाहिए? प्रभु संपत्ति दे दिया, संतान दे दिया, स्वास्थ्य नहीं हैं तो स्वास्थ्य चाहिए। भगवान ने कृपा की और कहा जा, तथास्तु। वह स्वस्थ भी हो गया पर स्वस्थ तो हो गया तब तक शरीर जर्रा-जर्जरित हो गया और अब पांव भी लड़खड़ाने लगे थे। एक दिन भगवान के चरणों में फिर गया और गुहार लगाना शुरू कर दिया। आकाश से वाणी गूँजी, अब क्या चाहिए? संपत्ति मिल गई, संतान मिल गई, स्वास्थ्य मिल गया, पर सत्व नहीं हैं, शरीर में ताकत नहीं बची, मुझे सत्व-शील बना दो। भगवान ने कहा- तेरे जैसे का नि:सत्व रहना ही ज्यादा अच्छा हैं क्योंकि तू अमर बन गया तो रोज मुझे परेशान करेगा। बंधुओं! मनुष्य के मन की कैसी परिणति हैं? वो ज्यों-ज्यों पाता हैं, त्यों-त्यों परेशान होता हैं। उसे जितना लाभ होता हैं, उतना लोभ होता हैं। लाभ और लोभ का खेल उसके जीवन में सारी जिंदगी चलता रहता हैं, बस इसी को रोकने का नाम हैं, ‘शौच धर्म’।

उत्कृष्टता को प्राप्त लोभ की निवृति का नाम शौच हैं। मैं आपसे कह रहा हूँ, आप पूरी तरह निर्लोभी बन जाओ, शायद मैं ऐसा कहूं तो भी कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि आपके साथ ऐसा होने वाला नहीं हैं। आप प्रवचन ही सुनने के लोभ से सुन रहे हैं और सुनाने के लोभ से मैं सुना भी रहा हूँ। आप लोभवश सुन रहे हैंऔर मैं लोभवश लोगों को सुना रहा हूँ। आपके मन में लोभ  हैं कि गुरुदेव के दो वचन सुनकर के मैं अपना जीवन सँवारुं और मेरे मन में लोभ हैं कि चार बातें सुनाकर इनका जीवन सुधारूं। लोभ तो हैं लेकिन उत्कृष्टता को प्राप्त लोभ, मन में चाह होना और तीव्र चाह होना, चाह सबके मन में होती हैं। आज चार बातें आप से करूंगा।

  • चाह
  • दाह
  • आह और
  • राह

चाह होना, चाह आपके मन में हैं, चाह से शून्य कोई नहीं हैं। अपनी चाह को देखो, कैसी चाह हैं? मन की चाह कैसी हैं? एक चाह हैं जो तुम्हें अच्छे कार्य के लिए प्रेरित करती हैं और एक चाह हैं जो तुम्हें पापों की ओर प्रवृत करती हैं। पहले अपने मन को टटोलो कि तुम्हारी चाह कैसी हैं? धर्म की चाह हैं, कल्याण की चाह हैं, स्व-पर के उपकार की चाह हैं, जीवन को अच्छा बनाने की चाह हैं या धन की चाह हैं, संपत्ति की चाह हैं, संसार की चाह हैं, भोगों की चाह हैं, पाप की चाह हैं। चाह दोनों तरफ हैं, अभी आप सुन रहे हो वो भी चाह के कारण सुन रहे हो और मैं भी सुना रहा हूं तो चाहत से प्रेरित होकर सुना रहा हूं लेकिन यह चाह ऐसी हैं जो हमारे अंदर की दाह को मिटायेगी और एक चाह ऐसी हैं जो अंदर की दाह को बढ़ाती हैं। तुम्हारे मन में कैसी चाह हैं? टटोलना हैं, कैसी चाह, कौनसी चाह हैं, कभी सोचा? संत कहते हैं- ‘धन-पैसे की चाह तो तुम्हारे मन में जन्म-जन्मांतर से रही हैं और उस चाह को पूरा करने का तुमने जितना भी प्रयत्न किया, आज तक पूर्ण नहीं हो सकी’।

संत कहते हैं-धन-पैसे को कमाने की, जोड़ने की, संग्रहित करने की चाह तुम्हारे अंदर भाव-भवान्तरों से बनी आई हैं‘ और अतीत के जन्म की बात को गौण कर भी दे तो इस जीवन को टटोल कर देखो, प्रारंभ से तुम्हारे मन में धन की चाह रही और तुमने धन की चाह की पूर्ति के लिए बहुत सारे प्रयत्न भी किये पर मन से पूछो, क्या तुम्हारी चाह पूरी हुई? धन-पैसे की चाह पूरी हुई, अब तक तुम अपनी चाह पूरी कर सके, अपने मन से पूछ कर देखो, एक बार मैं ऐसे ही चर्चा कर रहा था।

एक सज्जन ने कहा, जो आज अच्छे धनपति हैं। वो बोले, महाराज! मैं सोचता हूँ, जब मैंने अपना कारोबार शुरू किया था तो सोचा था कि एक करोड़ हो जाएंगे तो बस पर्याप्त हैं। महाराज जी! मैं बहुत गरीब अवस्था से आगे बढ़ा, घर से ₹500 लेकर निकला था, आप लोगों का आशीर्वाद रहा, भाग्य ने साथ दिया, आगे बढ़ गया और मैंने सोचा था एक करोड़ रुपए हो जाएंगे तो मैं बिल्कुल ठीक हो जाऊंगा, बस पर्याप्त फिर विराम लूंगा। महाराज जी! आप लोगों के आशीर्वाद से 5 साल में ही मैं वहाँ तक पहुंच गया और यह घटना 1990 की हैं। 5 साल में जब एक करोड़ हुआ तो मैंने सोचा यह थोड़ा कम हैं, थोड़ा और बढ़ा लूँ, थोड़ा और बढ़ा लूँ, और आज भी वह बढ़ाने में लगा हुआ हैं। मैं आपसे पूछता हूं, ऐसा एक ही आदमी हैं कि आपके भीतर भी ऐसा ही आदमी हैं। सभी ऐसे हैं और कसम खाए हैं, ऐसे ही बने रहने को। उस व्यक्ति ने जो बात कही, बोला, महाराज! अंतर आ गया हैं, जब मैंने अपने काम की शुरुआत की थी तो सोचता था ₹10000-20000 गल्ले में आ जाए, तो बहुत हैं। अब महाराज! जब तक ₹ दो-चार लाख गल्ला में नहीं आता, लगता हैं, आज कुछ काम ही नहीं हुआ। अंतर क्या हो गया? जब शुरुआत छोटी थी तो ₹10000-20000 में मन संतुष्ट हो जाता था, अब काम बड़ा हुआ तो 10-20 लाख और आगे बढ़ जाए तो करोड़ो से खेलने वाले लोग होते हैं। हमारी चाह उत्तरोत्तर बढ़ती हैं, धन की चाह सुरसा की भांति हैं। सुरसा का मुंह खुलता हैं तो बस खुलता ही जाता हैं, खुलता ही जाता हैं और बंद होने का नाम नहीं लेता। संत कहते हैं- ‘अगर सुरसा जैसी राक्षसी प्रवृत्ति को अपनाओगे तो तुम्हारा अंत बुरा ही होना हैं’।

ये चाह हैं क्या? तुम्हे व्यग्र बनाती हैं, बैचेन बनाती हैं, व्याकुल बनाती हैं। अपने मन से पूछो, आज तुम्हारे पास जितना धन हैं, आज से 25 वर्ष पहले उतना पैसा नहीं रहा होगा, स्वाभाविक हैं, एकाध अपवाद को छोड़ दो। आज तुम जहाँ हो, आज से 25 वर्ष पहले तुम वहाँ नहीं रहे होगे पर अपने मन से पूछो आज से 25 वर्ष पहले तुम जितने शांत थे, क्या आज उतने शांत हो? नहीं ना। तो आशीर्वाद दे दूँ, 25 बरस पुरानी स्थिति में आने का। महाराज! ऐसी गलती मत करना वह तो बद्दुआ हो जाएगी। चिंता मत करो, मैं दूंगा नहीं। पर मन से पूछो, सब का अनुभव यह बताता हैं, जब मेरे पास धन कम था, साधन कम थे तो मैं सुखी था। आज धन बढ़ गया, साधन बढ़ गए तो मेरे दु:ख का दायरा भी बढ़ गया। तो क्या करो? एक अवधारणा पक्की बना लो कि धन-साधन, सामग्री और सत्ता में सुख नहीं हैं। अगर सुख हैं तो मन के संतोष में हैं सुख हैं तो मन की संतोष में हैं। प्रभु से प्रार्थना करो, प्रभु! मैं आपके पास धन मांगने के लिए नहीं आया, मैं आपके पास संतोष पाने के लिए आया हूं। बस वह संतोष जग जाए, मेरा जीवन धन्य हो जाए। अपनी चाह को पूरी करने के लिए तो भगवान से रोज प्रार्थना करते हो, अपनी चाह मिटाने की कभी प्रार्थना की। चाह पूरी हो जाए, ऐसे भाव को लेकर रोज भगवान से गुहार करते हो लेकिन मेरी चाह मिट जाए, इस भाव से कभी भगवान की प्रार्थना की। प्रभु! मेरी इच्छा सफल कर दो, इस भाव से तुमने रोज प्रार्थना की। पर कभी हे प्रभु! मेरी इच्छा निर्मल कर दो, ऐसी प्रार्थना की। इच्छा सफल हो तो भी तुम सुखी हो, इसकी कोई गारन्टी नहीं।  इच्छा निर्मल हो तो तुम कभी दु:खी नहीं हो सकोगे। चाह पुरी हो तो तुम सुखी हो सकोगे, इसका कोई भरोसा नहीं हैं। पक्का हैं, चाह पूरी होने से कभी सुखी हो ही नहीं सकते और चाह मिट जाए तो तुमसे बड़ा सुखी कोई और नहीं हो सकता। जीवन के इस विज्ञान को सीखो, अपनी चाह मिटाने की प्रार्थना करो। मेरी यह चाह मिटे और मन में चाह जगे तो अच्छे की चाह जगे, सुख की चाह जगे, कल्याण की चाह जगे और उपकार की चाह जगे, आत्म-उत्थान की चाह जगे, धर्म की चाह जगे पर उल्टी चाह ज्यादा जगती हैं और ये चाह क्या करती हैं। अपने मन से पूछो, जब आपके मन में किसी प्रकार की चाहत जगती हैं तो क्या होता हैं? आकुलता पैदा होती हैं। ये चाह हैं जो दाह हैं, चाह ही दाह हैं।

मन में जब कोई चाह आती हैं, जब तक उसे प्राप्त ना कर लो, हासिल ना कर लो मन बैचेन हो उठता हैं। कोई भी चीज पाना हो, आतुरता होती हैं, रात की नींद भी उड़ जाती हैं और दिन का चैन भी खो जाता हैं, उदेडभून में लोग लगे रहते हैं।

एक व्यक्ति मेरे संपर्क में हैं, बड़े उद्यमी हैं, एक दिन बड़े बेचैन थे। मैंने पुछा, क्या बात हैं भाई, आज इतने बेचैन क्यों हो? बोले, महाराज! इस साल का टारगेट पूरा करना हैं, अभी टारगेट पूरा नहीं हुआ, हमने जितना टारगेट बनाया था, अभी 75% हैं, 25% और करना हैं, वह टारगेट अचीव करने के लिए हम परेशान हैं। हमने कहा, टारगेट पूरा कर भी लोगे तो तुम्हें मिलेगा क्या? वो बोला, महाराज!  संतुष्टि। मैंने पुछा, फिर अगले साल तो बोला, फिर टारगेट बनायेंगे। जब भी तुम्हारे मन में कोई चाह जगती हैं, जब तक उसे पूरा न किया जाए, तब तक मन में दाह होती हैं और चाह पूरी कर लेने के बाद नयी चाह आ जाती हैं।

एक आदमी ने अपना घर बनाया, बहुत दिन से उसकी चाह थी कि मैं घर बनाऊं और ढंग का घर बनाया, अपने हिसाब से अच्छे इंजीनियर से अच्छी ड्राइंग बनाई, अच्छी डिजाइन बनाई और सब कुछ जो वह अपने हैंसियत के अनुसार कर सकता था, उससे आगे बढ़कर के घर बनाया, अब उसका घर बन गया और थोड़े दिन बाद उसके पड़ोसी ने भी अपना घर बनाया, उसका घर इससे बड़ा था और उसने कुछ ज्यादा अच्छा खर्चा किया, ज्यादा आकर्षक डिजाइन थी, अच्छा फर्नीचर था। अब, जब भी उसके घर को देखे तो इसे अपना घर काटने लगे, जैसे, मेरा घर, घर नहीं हैं। जिस दिन घर में घुसा था, उस दिन तो वह घर अच्छा था लेकिन अब  दूसरे के घर को देखा तो अपना घर खराब लगने लगा क्योंकि अब दूसरे घर की, बड़े घर की, अच्छे घर की, सुंदर घर की चाह जग गई। आजकल देखो, शहरों में जब लोग रहते हैं, पहले-पहले बसते हैं तो मन में पहली चाह होती हैं, जैसे-कैसे हो अपना एक फ्लैट हो जाए तो कम से कम अपना घर हो जाए, किराए के मकान में रहते-रहते तो दिन बीत गए। और जब फ्लैट हो जाता हैं तब सोचते हैं, फ्लैट तो हैं, अपना बंगला होना चाहिए, अपनी कोठी होनी चाहिए और कदाचित बंगला और कोठी भी हो जाए तो फिर थोड़ा पॉश एरिया में होना चाहिए, अच्छी लोकेशन में होना चाहिए और फिर जब पॉश में हो गया तो रतलाम में एक, इंदौर में तो हो ही जाए, इंदौर में भी होना चाहिए और इंदौर में हो गया तो मुंबई में भी हो जाए एक छोटा सा फ्लैट ही सही। आदमी  सारी जिंदगी घर बदलता रहता हैं, रह नहीं पाता। यही चाह हैं। आप लोग भजन गाते हो,

मन की तरंगे मार ले, बस हो गया भजन।

आदत बुरी सुधार ले, बस हो गया भजन।

इसकी दो पंक्तियां बड़ी प्रेरक हैं,

रहता हैं झोपड़ी में मगन, महलों की चाह हैं, यह चाह ही तेरे लिए कांटो की राह हैं।

इस चाह को तू मार ले बस हो गया भजन,आदत बुरी सुधार ले बस हो गया भजन।

मन की तरंगे मार ले, बस हो गया भजन।।

चाह को कम करो, चाह को खत्म करो। आप लोग कहते हैं ना,

चाह गई, चिंता गई, मनवा बेपरवाह और जिन को कछु न चाहिए, वह साहन के साह।

चाह मिटाइए क्योंकि यह चाह, दाह देती हैं और संसार का हर प्राणी अपनी इस चाह की दाह में झुलस रहा हैं, मुँह से आह निकल रही हैं, कराह रहा हैं फिर भी राह नहीं दिख रही हैं। चाह की दाह का एहसास हो रहा हैं, झुलस रहे हो कि नहीं? तुम लोगों की दशा कैसी हैं, बताऊं, दुष्यंत कुमार की पंक्तियों में, दुष्यंत कुमार के शब्दों में, वह कहते हैं।

‘हाथों में अंगार लिए मैं यह पूछता रहा, कोई मुझे इन अंगारों की तासीर बता दे।’

क्या तासीर बतायेंगे, हाथ झुलस रहा हैं, चाह की दाह हैं फिर भी मरे जा रहे हो। चाह बढ़ा रहे हो घटा नहीं रहे हो। जीवन में कभी सुखी नहीं होओगे, जीवन में सुखी होना हैं तो अब बस, अब बस की बात होनी चाहिए लेकिन आजकल तो बस and, and, और,और। संत कहते हैं- ‘नहीं अब AND नहीं, END होना चाहिये’।

बस, जिस दिन बस आ गया ना तो तुम्हारा मन अपने आप वश में हो जाएगा और जब तक और, और, और, और तब तक कोरी दौड़, दौड़, दौड़, यह आपाधापी, यह भागदौड़ आखिर कब तक। किसके लिए, क्यों कर? कभी इस विषय में सोचने की कोशिश की, कभी सोचा, आखिरकार यह सब क्यों और कब तक? धन चाहिए, स्वीकार हैं, पर कितना? कितना? लिमिट नहीं हैं तो चाह हैं की दाह। झुलसो, अगर इस दाह से बचना चाहते हो तो समीक्षा करो, अपना पर्यालोचन करके देखो, अपने अंतर में क्या हैं, यह चाह कभी पूरी होने वाली नहीं हैं, अंतहीन हैं, अनंत हैं। भगवान महावीर कहते हैं- ‘जैसे-जैसे लाभ होता हैं, वैसे-वैसे लोभ होता हैं’। लोभ लाभ से बढ़ता हैं। आपको वो कहानी याद होगी, कपिल ब्राह्मण की, आज नहीं सुनाऊंगा, दूसरी सुनाऊंगा।

कपिल ब्राह्मण की कथा हमारे आगमो में आती हैं कि एक कपिल ब्राह्मण था जिसे राजा ने ऑफर किया कि तुम्हें क्या मांगना हैं, मांगो और वो दो मासा सोना की भावना लेकर गया था और राजा ने जब कहा, जो मांगना हैं, मांग लो तो दो मासा सोना मांगता, मांगता, मांगता, मांगता, पूरा राज्य मांगने की मनोवृत्ति में आ गया। यह हमारी चाह की दाह, जब इसी उधेड़बुन में लगा रहा तो राजा ने कहा, ब्राह्मण, मांगो क्या मांगते हो? तो उसी पल उसके अंतर का ब्रह्म जग गया और कहा, राजन! मुझे कुछ नहीं चाहिए, मुझे कुछ नहीं चाहिए। राजा बोले, क्यों? तुम आये थे, नहीं मुझे जो चाहिए था वह मिल गया। मैंने तो अभी कुछ दिया नहीं अब फिर क्या मिल गया। वो बोला- हाँ! मुझे जो मिला हैं वह तुम दे भी नहीं सकते और जो तुम दे सकते हो मुझे नहीं चाहिए। मैंने देख लिया लाभ और लोभ के इस गणित का। अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। मेरे मन में कोई चाह नहीं हैं, सारी चाह मिट गई हैं। मैं अपने आप ब्रह्म को धारण करूँगा और वो दीक्षित हो गए। मुनि बन गए, केवलज्ञान हो गया। दूसरी बात सुना रहा हूं-

सोने और चांदी के कैलाश पर्वत की तरह असंख्य पर्वत हो। इच्छा आकाश के समान अनंत हैं,  यह पूरी नहीं होती। घर के छत पर बैठकर क्षितिज को निहारो तो ऐसा लगता हैं, 8-10 मील चलेंगे तो धरती आसमान एक हो रहा हैं। हम क्षितिज तक पहुंच जाएंगे लेकिन दुनिया के किसी कोने में धरती और आसमान एक हैं? हम जहाँ जाते हैं, हमें वह 2-4 मील ही दिखता हैं। हम टारगेट अचीव करते हैं, टारगेट तुम्हारा अचीव होगा ही नहीं, तुम जितना-जितना अचीव  करोगे, तुम्हारा टारगेट उतना-उतना बढ़ता जाएगा।

चाह का कोई अंत नहीं, विचार करो। इस व्याकुलता का परिणाम क्या हैं, इसे भोग कौन रहा हैं? तुम ही भोगोगे, तुम ही दु:खी रहोगे तो अपनी दिशा को, अपनी दशा को बदलने का सतप्रयत्न हमारा होना चाहिए। उसके लिए परम पुरुषार्थ की आवश्यकता हैं। धन चाहिए, नहीं चाहिए तो जोड़ा क्यों हैं, छोड़ दो कमेटी को बहुत चाहिए, अभी। चाहिए, कितना चाहिए? बस तय यह करना हैं, कितना चाहिए? कोई हिसाब, कोई माप, एक समय तक मनुष्य अपनी जरूरत के लिए पैसा कमाता हैं, आगे चलकर पैसा कमाना ही मनुष्य की जरूरत बन जाती हैं। अपने मन से पूछो, तुम जरूरत के लिए कमा रहे हो कि केवल कमाने के लिए कमा रहे हो? बोलो, यहां 80% ऐसे होंगे जो केवल कमाने के लिए कमा रहे हैं, सही बोल रहा हूं ना। मतलब क्या हैं, विचार करो कि मैं अपने जीवन को किस दिशा में आगे बढ़ा रहा हूं? आखिर उसकी सीमा क्या हैं, उसका अंत क्या हैं? दाह बढ़ेगी, चाह में दाह और फिर आह। आह तो  निकलती ही हैं, आह भरते हैं।

एक सज्जन मेरे पास आए, बड़े उद्योगपति, अरबपति व्यक्ति, एक दिन भरी आंखों से उन्होंने मुझसे कहा, महाराज! मेरे पास सब कुछ हैं पर मेरा कोई नहीं। तीन बेटे, तीनो अपने-अपने में मस्त, वो पति-पत्नी दोनों एक अलग मकान में रहते थे। उनकी धर्मपत्नी को कैंसर था, नर्स कंपाउंडर लगे हुए थे, सारी व्यवस्था थी और बाप के लिए ₹200000 महीना फिक्स कर दिया गया और कुछ नहीं। उसी में पूरा खर्चा, उस व्यक्ति ने भरी आंखों से कहा, महाराज! मेरे पास सब कुछ हैं, पर मेरा कोई नहीं। आज मेरी आत्मा दुखती हैं कि मैंने अपना जितना समय और शक्ति, पैसो के पीछे गंवाया। संतान को रुपया देने में लगाया यदि संस्कार दिए होते तो आज मेरी यह दुर्दशा नहीं होती। आज मुझे लगता हैं कि काश मेरे पास इतना पैसा नहीं होता, मैंने अपनी संतान को पैसा दिया, उनका कारोबार और कारोबार इतना बड़ा, इतना बड़ा, इतना बड़ा कि उनके पास, मेरे पास बैठने को भी 2 मिनट का वक्त नहीं। 15-20 रोज में कोई एकाध आ जाता हैं 2-5 मिनट के लिए तो मन नहीं मानता तो मैं ही उनसे फोन करता हूँ तो प्रायः जब भी फोन लगाता हूं, कह देते हैं, पापा अभी बिजी हूं, फिर फोन पर बात करूंगा। यह दाह, यह आह अंदर की, हो सकता हैं। तुममे से भी ऐसी स्थिति को भोगने वाले लोग यहां होंगे लेकिन अगर अपने जीवन की राह नहीं चुनोगे तो यही हाल होना हैं, सब का यही हाल होना हैं।

दाह मिटाओ, आह नहीं भोगनी पड़ेगी। चाह कम कर दो, दाह मिटेगी फिर कोई आह नहीं। तुम्हें देखकर लोग कहेंगे, वाह! आह से वाह चाहते हो तो आपकी आह को मैं वाह बनाना चाहता हूं और अगर आप चाहो तो इस पर्यूषण में आपकी आह, वाह  में परिवर्तित हो जाएगी, बशर्ते हमारी राह को अंगीकार करना पड़ेगा। तुम्हारी आह, वाह में परिवर्तित होगी, सही राह को पकड़ो।

राह क्या हैं, जीने की राह क्या हैं? पहली बात आवश्यकता और आकांक्षाओं की सीमा रेखा हैं, देखिये, मेरी रिक्वायरमेंट क्या हैं और मेरी डिजाइर कितनी हैं? रिक्वायरमेंट फुलफिल की जाती हैं, की जा सकती हैं पर डिजायर एंडलेस होती हैं। अपने रिक्वायरमेंट को देखें, डिजायर को रिड्यूस करें, रिक्वायरमेंट को फुलफिल करें, जो मेरी जरूरत हैं वह मैं करूंगा और जो हमारी ज़रूरत हैं नहीं हैं उसकी तरफ में ध्यान नहीं दूंगा।

पहले चरण में आप ऐसा कर सकते हैं, आवश्यकता और आकांक्षा के मध्य सीमा निर्धारित करना। आकांक्षाओं को कोई पूरा नहीं कर पाया और न कभी कर पाओगे। जितनी मेरी जरूरत हैं, उतना मैं कर लूं तो बस धन्य हो गया। फिर हाय-हाय नहीं, समीक्षा कर लो और देखो। अब मेरी पैसा कमाने की कोई जरूरत बची, अब धन जोड़ने की कोई जरूरत बची, अब व्यापार-कारोबार करने की मेरी कोई जरूरत हैं। अगर अंतर्मन कहता हैं कि नहीं हैं जरुरत तो तुम वहां पर विराम लगा दो। महाराज! आपकी बात सुनकर लगता तो अच्छा पर हिम्मत नहीं होती, विराम लगा देंगे तो करेंगे क्या? विराम लगा देंगे तो करेंगे क्या? तो दूसरा सूत्र, अगर तुम्हारे पास धन-पैसा जितना जरूरत हैं, उतना या उससे ज्यादा तुम्हारे पास धन हैं और तुम चाहते हो कि व्यापार-व्यवसाय बंद नहीं कर सकते, कोई चिंता नहीं, व्यापार करो, अपनी जरूरत के लिए नहीं, औरों की जरूरत की पूर्ति के लिए करना शुरू कर दो, जरूरतमंदों के सहाय बन जाओ, यह लक्ष्य बनाओ, यह दूसरा सूत्र हैं।

मैंने अपनी जरूरतें पूरी कर ली, चलो मैं सक्षम हूं, मेरे पास सत्व हैं, बुद्धि हैं, समझ हैं, प्रतिभा हैं, मैं और जरूरतमंदों की पूर्ति करूंगा। बोलो, मैं आपसे पूछता हूं जो व्यक्ति इस तरह का कार्य करेगा, उसको देखकर आपके मन में क्या भाव होगा, वाह निकलेगा। तो आप औरों के वाह निकालना चाहते हैं कि आपके लिए लोग वाह कहे, ऐसा चाहते हैं। जब लोग जोड़ते हैं तब लोग उसके लिए वाह कहते हैं या जब वह छोड़ते हैं तब वाह निकलता हैं। छोड़ने पर वाह  निकलता हैं ना तो छोड़ो जी भर के आज। छोड़ना शुरू कर दो आज, सब कहेंगे, वाह! वाह! वाह! यह हैं जीवन की सच्ची राह। मेरे पास सर प्लस हैं, उसका मैं सही जगह विनियोजन क्यों ना करूं फिर तीसरी बात उसके परिणाम का विचार करो, अंत क्या हैं, अंत क्या हैं? तुमने जिंदगी भर पैसा कमाया, खूब जोड़ा, खून-पसीना एक कर दिया, उसके बाद खाया? पैसा वाले प्रायः खा भी नहीं सकते, ज्यादातर पैसा वाले नहीं खा पाते। रसोइए ने सेठ के लिए रोटी परोसी, रोटी में घी ज्यादा था। रसोइए ने रोटी परोसी, रोटी में घी ज्यादा थी, सेठ ने कड़कते हुए कहा, रोटी में इतना घी क्यों? रसोइयां आया और कहा, मालिक! क्षमा करें, गलती से हमारी थाली आ गई। सेठ का भाग्य कहाँ कि वो घी में डूबी रोटी खाए, रोटी तो नौकर-चाकर खाते हैंतो अंत क्या?

यह तीसरी बात जिस पर हमें विचार करना हैं। आखिर उसका अंत क्या? लेकर जाओगे? कोई ले जा सका हैं तो क्या करोगे? छोड़कर जाएंगे, किसके लिए? किसके लिए छोड़ोगे? बाल-बच्चों के लिए? बाल बच्चों के लिए छोड़ोगे कि महाराज के लिये छोड़ जाओगे। चिंता मत करो, तुम छोड़ोगे तब भी यहाँ स्वीकार नहीं हैं पर यह बताओ किसके लिए छोड़ोगे? बाल-बच्चों के लिए छोड़ोगे। यह बताओ, तुम्हारे बाप ने तुम्हारे लिए कुछ छोड़ा था कि नहीं छोड़ा था, सबके मां-बाप जो उनके पास होता हैं, छोड़कर जाते हैं, नहीं भी छोड़े तो कानूनन अधिकार उनका हो ही जाता हैं। तुम्हारे मां-बाप ने तुम्हारे लिए बहुत कुछ छोड़ा, क्या तुमने उसका उपभोग किया? वो सब धरा हैं। जो तुम्हें पैरेंटल प्रॉपर्टी मिली थी, जो संपत्ति तुम्हें तुम्हारे मां-बाप से मिली, तुमने अपनी कुशलता और तत्परता से उससे कई गुना बढ़ा लिया। बिरला भाग्यहीन ही कर्म फूटा होगा, जो मां-बाप की संपत्ति को मिटाता हैं, ज्यादातर तो जो पाते हैं, उससे बढ़ाते ही हैं। बढ़ाते हो ना, जो तुम्हे मिला तुमने उसे बढ़ाया यानी तुम्हारे पिता की संपत्ति तुम्हारे कोई काम ना आई। तुम्हारे बाप की संपत्ति तुम्हारे काम में नहीं आई तो तुम्हारी संपत्ति भी तुम्हारे बेटे के काम में नहीं आने वाली, इस बात को गांठ में बांध के रख लो। तुम्हारी संतान को तुम्हारी संपत्ति काम में नहीं आएगी, नहीं आएगी ,नहीं आएगी। यदि उसमें हुनर होगा तो अपना साम्राज्य खड़ा कर लेगा और हुनरहीन होगा तो सब मटियामेट कर देगा, सत्यानाश कर देगा। तो बोलो भाई, अब क्या करोगे? छोड़ कर जाओगे?

महाराज! आप फंसाओ मत।  आप जब ऐसा बोलते हैं तो एकदम ग्रिप में ले लेते हैं। भैया, हम फंसायेंगे क्या, फंसे हुए तो तुम हो। हम तो तुम्हें छुड़ाने की बात कर रहे हैं पर तुम्हे फंसे रहने में ही मजा हैं। आप तो कहते हो कि महाराज! बस आप तो बोल दो। एक बार एक ने कहा, महाराज! आपके सारे प्रवचन अच्छे लगते हैं पर जिस दिन आप पैसों के बारे में बोलते हैं ना तो लगता हैं कब खिसकुं? कैसी स्थिति हैं? कितनी प्रगाढ़ लिप्सा हैं? शुचिता, पवित्रता आखिर उद्घाटित होगी तो कैसे होगी? इस सत्यता को हृदय में अंकित करो। पहली बात, मेरी जरूरत क्या हैं, अगर जरूरत के अनुरूप हैं तो फिर काम करने की जरूरत क्या हैं, फिर भी यदि जरूरत कर रहे हैं तो दूसरी बात जरूरतमंदों के लिए करो और तीसरी बात इस बात का नित-प्रति विचार करो, अंत क्या हैं। जब तुम्हें मालूम हैं, अंत जीरो हैं, छोड़कर चले जाएंगे, फिर तुम्हारी तो होगी नहीं जिसकी होगी उसकी होगी, वो भी उपभोग कर पाएगा, नहीं कर पाएगा, कोई भरोसा नहीं। जब हमें पता हैं कि मेरी संपत्ति किसी के काम में नहीं आने वाली तो जीते जी मैं उस संपत्ति का सदुपयोग कर लूं। उसका सदुपयोग करो, एक सीमा तक जितना आवश्यक और अपेक्षित हैं, संतान को दो, बाकी का जरूरत हैं तो संग्रह करो, नहीं हैं तो जो संग्रहित हैं उसका उपयोग करो, सदुपयोग करो। अब ज्यादा संग्रह करने की क्या जरूरत, जितना समय, जितनी शक्ति, जितना समय मैं धन-पैसा जोड़ने में लगाता हूं, उतना समय, शक्ति और श्रम मैं अपने आत्मा के कल्याण में लगाऊं वो मेरे लिये ज्यादा अच्छा होगा। नौकरी-पेशे वाले लोग तो फिर भी 60 साल में रिटायर हो जाते हैं, तुम लोग टायर्ड हो जाते हो पर रिटायर होने का नाम नहीं लेते। टायर्ड हो जाओगे लेकिन रिटायर्ड नहीं होओगे। कब तक? यह भाग-दौड़ कब तक, यह आपाधापी कब तक और क्यों कर? यह सवाल तुम्हें अपने मन से पूछना हैं, जब तुम्हारे मन में यह सवाल जगेगा, तब तुम्हें राह दिखेगी, दूसरों के कहने से नहीं होगा।

अभी तो तुम्हें एक ही राह दिखती हैं, वह हैं, पैसा। जैसे-तैसे-कैसे भी हो बस पैसे। येन केन उपायन, कैसी विडंबना हैं। लोगों की आसक्ति बड़ी प्रगाढ़ दिखती हैं, उस प्रगाढ़ आसक्ति को हमें मंद करना हैं, उसे जीतना हैं। यह तो मृग-मरीचिका हैं मृग-तृष्णा हैं जहां केवल दौड़ हैं, मंजिल नहीं। दौड़ते रहोगे, तुम सोचोगे लखपति से करोड़पति बन जाए तो करोड़पति बनने के बाद अरबपति बनने का ख्याल आएगा, अरबपति बनोगे तो खरबपति की तरफ दृष्टि जाएगी और ख़रबपति भी बन गए तो नंबर वन बने रहने की चाह जगती ही रहेगी।

चाह, दाह हैं जो आह उत्पन्न करती हैं, कराह उत्पन्न करती हैं। सब कराह रहे हैं, सब आह भर रहे हैं, अपने अंदर की पीड़ा को सब भोग रहे हैं। कहते हैं, क्या करें? समय ही नहीं हैं और बड़े-बड़े धन पतियों को तो खाने के लिए समय नहीं, इतने व्यस्त हैं। रोटी के लिए समय नहीं हैं, बताओ कहते हैं कि हम दो रोटी के लिए कमाते हैं पर दो रोटी खा कहां पाते हैं। रोटी के लिए कमाओ ठीक हैं लेकिन कमाने के बाद रोटी तो खाओ, समय ही नहीं हैं। आपाधापी और भागमभाग क्यों कर रहे हो, यह सब असंतोष हैं, यह सब आह हैं। क्या करूं, क्या करूं? कई बार ऐसा होता हैं, घर का व्यक्ति बिजनेसमैन हैं, अपने कार्य में बहुत व्यस्त घर से दूर, बाहर-बाहर रहे, घर आए और घरवाली चार बातें सुनाये तो कहता हैं, क्या करूं, काम बहुत हैं। क्या करूं, बहुत बिजी हूं, जरूरी काम हैं। यह क्या हैं? यह सब आह हैं।

बदलिये, अपनी प्राथमिकताएं बदलियें, सुनिश्चित कीजिए मुझे क्या करना हैं, किसके लिए करना हैं, यह नर भव मुझे क्यों मिला। ध्यान रखना, धन-पैसे का जीवन में वही स्थान हैं जो नाव के संतुलन के लिए नदी के  प्रवाह का। नदी में पानी का प्रवाह नहीं हो तो फिर नाव नहीं तैर सकती। यह बड़ी सच्चाई हैं, नाव को नदी में तिराने के लिए नदी में पानी होना जरूरी हैं लेकिन इस बात को सदैव ध्यान में रखना चाहिए, पानी नाव के नीचे हो, नाव के भीतर ना हो। पानी नाव के नीचे हो, नाव के भीतर ना हो हो। देखो, तुम्हारी नाव के नीचे पानी हैं कि नाव में पानी हैं। नीचे हैं तो फिर वाह हैं और भीतर हैं तो आह हैं। यह तुम्हें देखना हैं, टटोलना हैं,  छानबीन करके देखना हैं तो जीने का मजा आएगा, जीने का रस ले सकोगे, जीवन का आनंद भर सकोगे अन्यथा सब कुछ व्यर्थ और बेकार साबित होगा, कुछ भी नहीं होगा।

निचोड़ में चौथी बात जो राह हैं। धन को जीवन निर्वाह का साधन माने, साध्य नहीं। जीवन के  गुजारे के लिए धन हैं, धन के लिए हमें जीवन नहीं गुजारना। मैं शरीर के साथ रहता हूं, शरीर के लिए नहीं। आप धन के साथ रहो, धन के लिए नहीं। बस यह सूत्र अपना लो। धन के साथ रहो, धन के लिए मत जियो, धन के साथ जियो, ठीक हैं, तुम गृहस्थ हो। तुम्हारा धन, तुम्हारे जीवन में सहायक हैं, आवश्यक भी हैं लेकिन साधन, साधन हैं पर साध्य नहीं। इस बात को कभी विस्मृत मत करो। आज उल्टा हो रहा हैं, साधन ही साध्य बना जा रहा हैं। जीवन के गुजारे के लिए धन कमाना समझ में आता हैं लेकिन धन कमाने में ही जीवन गुजार देना समझ से परे हैं। तुम क्या कर रहे हो, गुजारे के लिए धन कमा रहे हो या कमाकर के जीवन गुजार रहे हो। तय तुम्हे करना हैं तब तुम जीवन की सच्ची राह अंगीकार कर सकोगे, तभी अपने जीवन में आगे बढ़ सकोगे और कुछ हासिल कर सकोगे। अन्यथा कुछ भी होने वाला नहीं हैं, धन का जीवन में वही स्थान हैं जो स्थान खेत के फसल की सुरक्षा के लिए चारों ओर लगाई जाने वाली बाड़ का हैं। बाड़ किसलिए लगाई जाती हैं ताकि उस फसल को मवेशी नुकसान न करें। कीमती फसल हैं बाड़ नहीं। बाड़ तो कंटीली झाड़ियों की लगाई जाती हैं, फसल कीमती होती हैं लेकिन कोई बाड़ ही पूरी खेत को भर दे तो उसके लिए हम क्या कहेंगे। कबीर ने लिखा हैं-

हमने खेत की फसल की सुरक्षा के लिए बाड़ लगाया लेकिन हमारी बाड़ ही खेती को खाने लगे तो हम क्या करें। ध्यान रखना, जब तक तुमने धन को साधन के रूप में स्वीकार किया हैं, वह बाड़ हैं और जिस दिन धन साध्य हो गया, समझ लेना बाड़ खेत हो गए। बाड़ खेत बन गई, अब सुरक्षित नहीं रहोगे, केवल आह निकलेगी। ये सीमा रेखा होनी चाहिए, बहुत सारे लोग हैं जो धन जोड़ते हैं पर खा भी नहीं पाते। महाकंजूस होते हैं, खा भी नहीं पाते, कमा लेते हैं पर आसक्ति इतनी प्रगाढ़ होती हैं कि खा भी नहीं पाते।

एक महाकंजूस था, पैसा अपार था, पर खाता नहीं था, प्रायः उपवास ही करता था और पारणा भी जिस किसी के घर करता था। कहता आज एकादशी का उपवास, आज चतुर्दशी का उपवास, आज अष्टमी का उपवास हैं। सोचा, आप के यहाँ पारणा करके आपको पुण्य का लाभ दे दे और लोग उसको पारणा करा- करा कर पुण्य लाभ लेते रहते थे। एक रोज उसके घर एक चोर घुसा और चोर ने सारा माल बटोरा, जिंदगी में पहली बार इतना माल मिला था क्योंकि कंजूस के घर में सबसे ज्यादा माल मिलता हैं तो चोर घुसा, अपार माल दिखा, उसने सोचा, अब मुझे जिंदगी भर चोरी करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, इतना माल मिल गया और उसने सोचा चलो कुछ पुण्य का कार्य कर ले तो उसने चोरी के बाद पूरे गांव की एक पंगत की। गांव की पंगत की, गांव भर के लोग आए तो श्रीमान भी पहुंच गए, श्रीमान पंगत में बैठे और जैसे ही मुंह में कोर डाला, उनका कोर बाहर आ गया, दूसरा कोर डाला वह भी बाहर, तीसरा भी बाहर। वह उठकर खड़ा हो गया और कहा, पकड़ा गया, पकड़ा गया। सब बोले, क्या पकड़ा गया? श्रीमान बोले, चोर पकड़ा गया। मेरे माल को इसी ने चुराया हैं, मेरे माल को इसी ने चुराया, मेरे घर में इसी ने चोरी कि हैं। सब बोले- प्रमाण क्या? वो बोला, इससे बड़ा क्या प्रमाण। प्रत्यक्षे किं प्रमाणं। वो बोला, आज दिन तक मैंने अपनी कमाई का एक दाना भी नहीं खाया, आज तक अपनी कमाई का मैंने एक दाना भी नहीं खाया, यह माल, यह अनाज, मेरी कमाई का हैं तभी मेरे गले से नीचे नहीं उतर रहा हैं। पराया होता तो उतर गया होता। ऐसे लोगों को क्या कहेंगे? उपयोग कीजिए, उपभोग कीजिए। साधन हैं या साध्य इस बात का हमेशा ध्यान रखें।

मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूं, जिसका शहर के हर चौराहे पर मकान हैं। शहर के हर चौराहे पर मकान और वो आदमी दो कमरे के टूटे से मकान में रहता हैं, खुद। बड़े-बड़े, तीन-तीन  मंजिल के मकान फिर भी खुद दो कमरे के एक टूटे से मकान में रहता हैं। आज से 30 वर्ष पुरानी बात बोल रहा हूं और उसके पास एक साइकिल थी वह भी Hercules का पुराना संस्करण, प्रथम संस्करण। जिसकी हॉर्न को छोड़कर सब कुछ बजता था, दूर से ही पता लग जाता था कि सेठ जी आ रहे हैं। उस आदमी का क्या काम, महीना शुरू हो और 1 तारीख से किराया वसूलना और किराया वसूल कर के उसको ब्याज पर लगा देना। बोलो, ऐसे को क्या करेंगे, मर जाएगा, अभी तो जिंदा हैं। लेकिन मर जाए तो जिनके पास माल हैं, उन्ही का रहेगा, उसका क्या?  ना ढंग का खाता हैं, ना ढंग से रहता हैं, ना ढंग से सोता हैं। बोलो, ऐसे लोगों को धनपति कहोगे या पैसे का कीड़ा? क्या कहोगे? पैसे का कीड़ा, बहुत सारे लोग होते हैं।

एक बार हम विहार कर रहे थे, बुंदेलखंड की बात हैं, सर्दी का समय था, शाम को रात हो जाती थी । हमारे साथ के बच्चे सब भूखे रह जाते थे और ना कोई ढंग की होटल न कुछ। एक गांव में गए 10-12 घर की समाज थी, बच्चे तीन दिन से लगभग-लगभग भूखे थे और हमारा एक-एक टाइम में 25-25 किलोमीटर का विहार हो रहा था तो एक रोज एक गांव में गए, वहां के सिंघई के यहां उन लोगों का निमंत्रण हुआ,सिंघई जो समाज के मुखिया होते हैंऔर सब बच्चो को उबली हुई लौकी और घुटनो तक पानी वाली मूंग की दाल, मालूम पड़ा खुद ही ऐसा खाता हैं तो दूसरों को क्या खिलाएगा, यह कृपणता हैं, यह कंजूसी हैं।

संत कहते हैं- संपत्ति का उपयोग करो, उपभोग करो, उसमें आसक्त मत होओ’ यह राह हैं, अगर आपने इस राह को स्वीकार लिया तो फिर वाह हैं, नहीं तो चाह, दाह, आह की राह तो आप भोग ही रहे हो तो आपकी चाह, वाह में परिवर्तित हो जाए, सच्ची राह पकड़ लो। बोलिए, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की  जय।

 

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