क्यों डरें पाप करने से?

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क्यों डरें पाप करने से?

एक व्यक्ति ने अपने घर के आंगन में बबूल का पेड़ बोया, रात-दिन वह उसे सींचता, खाद-पानी देता, चौबीस घंटे उसमें रमा रहता। उसकी इस तत्परता को देखकर किसी ने उससे पूछा- क्यों भाई! आखिर इस पेड़ में ऐसा क्या है जो तुम इसमे रमे हो, यह तो कटीली फलियाँ देगा। बोला- तुम्हें क्या पता? थोड़े दिन रुको इसमें आम के मीठे-मीठे फल आएंगे, सामने वाला जोर से हँसा और कहा कि भैया!

‘बोए बीज बबूल के आम कहाँ से लाएं’

बबूल के बीज में आम का फल नहीं लग सकता, यह जीवन का एक बहुत बड़ा यथार्थ है। हम लोगों को बचपन से एक पाठ पढ़ाया जाता हैं – ‘जैसी करनी वैसी भरनी’, ‘जो बोओगे सो काटोगे’, as you sow so shall you reap, यह युक्ति बहुत पुरातन है ‘जो हम बोते हैं वही काटते हैं’ और इसी बात को प्रमुखता देते हुए हमारे यहाँ कहा गया कि अपनी करनी को ठीक करो। हर प्राणी प्रवृत्ति करता है उसकी अच्छी प्रवृत्ति भी होती है और बुरी प्रवृत्ति भी होती है। अच्छी प्रवृत्ति का परिणाम अच्छा और बुरी प्रवृत्ति का अंजाम बुरा होता है और हमारी इसी अच्छी प्रवृत्ति को पुण्य और बुरी प्रवृत्ति को पाप कहा जाता हैं। आज बात ‘प’ की है और ‘प’ में पाप और पुण्य दोनों आता है।

मैं समझता हूँ – पाप-पुण्य को इंसान समझ ले तो जीवन चक्र ही बदल जाए। आज बात मैं आपसे पाप की करूँगा। कोई भी पाप पसंद करते हो? मैं आपको पापी कहूँ तो कैसा लगेगा? नहीं ना! आप पापी हो कि नहीं, पहले यह बता दो। नहीं है ना! एक गरीब फकीर आदमी को मैं धनी कहूँ तो आपको क्या लगेगा? बोलो! एक फटेहाल आदमी हो, जिसके तन पर ढंग के वस्त्र भी ना हो और मैं उसे धनी कह कर के संबोधू तो आपको क्या लगेगा? हँसी आएगी ना! महाराज! कैसे बोल रहे हैं, महाराज को दिख नहीं रहा है यह तो फटेहाल आदमी इसको धनी बोल रहे हैं। मतलब, जिसके पास धन हो उसको धनी बोलना शोभा देता हैं और जिसके पास धन ना हो उसे धनी कहना एक मजाक हैं और धनी को धनी कहूँ तो यथार्थ हैं। मैं आपसे अगर यह कहूँ आप सब महान पुण्यात्मा हो, तो ठीक है? क्यों, क्या हो गया? पुण्यात्मा हो कि नहीं हो? और पापी नहीं हो बिल्कुल? अगर तुम्हारे पास पाप है तो तुम पापी हो, अपने भीतर झांक कर देखो तुम्हारे मन में, तुम्हारे वचनों में, तुम्हारे व्यवहार में पाप है या नहीं। अगर है तो तुम पापी हो और पाप नहीं है तो तुम धर्मी हो। मन को टटोल कर देखो कोई पापी कहे तो मन को चुभता है, मन को चौंधता है ,वह उद्वेलित हो उठता है, कोई पापी कहलाना भी बर्दाश्त नहीं करता तो संत कहते हैं- पापी कहलाना पसंद नहीं है तो पाप करना पसंद क्यों करते हो? आज चार बातें कहूँगा-

१. पाप करना

२. पाप भोगना

३. पाप काटना और

४. पाप त्यागना

पाप करना, पाप भोगना, पाप काटना, पाप त्यागना

पहला सवाल पाप करने का। अपने भीतर झांक कर देखो तुम पाप करते हो या नहीं? चौबीस घंटे में क्या ज्यादा होता है पाप? पाप कमा रहे हो ना? तो पापी कहूँ तो बुरा क्यों लगता है बोलो! ध्यान रखो जब तक अपने कृत्य को तुम ठीक तरीके से नहीं समझते और खुद के पाप को नहीं पहचानते जीवन पवित्र नहीं हो सकता। मुश्किल यह है कि मनुष्य पाप को बुरा भले कहता है लेकिन पाप को ही गले लगाता है। मनुष्य का जितना रुझान पापात्मक प्रवृतियों में होता है धर्म से इतना लगाव नहीं है बोलो! मन से पूछो- भगवान की पूजा करते समय की एकाग्रता और पिक्चर देखते समय की एकाग्रता, जितनी तन्मयता से तुम मूवी देखते हो उतनी तन्मयता से कभी भगवान की पूजा की, कभी एकाध सामयिक की, कभी स्वाध्याय किया कभी प्रवचन सुना, क्या? पाप रूचि मनुष्य के अंदर संस्कार से है और उन्ही संस्कारों से प्रेरित होकर वह पापात्मक प्रवृत्तियों में ज्यादा रस लेता है। पाप करने का कोई मौका आये आदमी कुछ नहीं सोचता और पुण्य करने का मौका आये तो जरूर सौ बार सोचता है। आपसे कोई अच्छे काम की प्रेरणा दी जाए तो आप दस बार विचार करोगे लेकिन बुरे काम के लिए, देखो! कभी किसी की प्रशंसा करने की बात आपके सामने आए तो आप सोच करके बोलोगे इसकी प्रशंसा में कौन से शब्द दूँ? इसकी प्रशंसा में कौन से शब्द दूँ लेकिन कभी किसी को गाली काढ़ना हो तो बोलो! सोच के गालियाँ देते हो? सपने में भी कभी गाली देने की बारी आये तो बेधड़क निकलती है, इसका तात्पर्य समझते हैं? यह पाप के प्रति जमी हुई अभिरुचि की अभिव्यक्ति है। जब तक पाप के प्रति गाढ़ रुचि होगी तुम पाप करने से अपने आप को बचा नहीं सकते।

चौबीस घंटे पाप करते हो, मन से करते हो, वचनों से करते हो और शरीर से करते हो और मुश्किल यह है कि पाप करते वक्त तुम्हें पाप, पाप जैसा लगता भी नहीं हैं। मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, घृणा, नफरत द्वेष, बैर, वैमनस्य के भाव आना, पुण्य हैं या पाप? किसी को नीचा दिखाने का भाव आना, पुण्य पुण्य हैं या पाप? किसी को तिरस्कृत करने का, किसी को अपमानित करने का, किसी के साथ छल करने का, किसी को प्रताड़ित करने का भाव आना, पुण्य हैं या पाप? किसी प्रकार का दुर्भाव आना पुण्य हैं या पाप? अपने मन से पूछो चौबीस घंटे में कितनी बार तुम्हारा मन पटरी से नीचे उतरता है बोलो- भोग विलासिता की कामना, पुण्य हैं या पाप? समझ रहे हैं बाहर से हम कुछ होते हैं और भीतर कुछ चलता रहता हैं। तो यह बताओ पाप ज्यादा करते हो या पुण्य? मन से कितना पाप होता है तुम्हें इसका एहसास हैं? तुम किसी पर गुस्सा कर रहे हो, झल्ला रहे हो, उस पर चिल्ला रहे हो, पुण्य कर रहे हो कि पाप? जब पता है यह पाप है तो फिर पाप से इतना अनुराग क्यों? हैं ना विचारणीय बात, जब मालूम है यह पाप है तो फिर पाप से इतना अनुराग क्यों? पाप के प्रति इतना झुकाव क्यों? पाप से इतना लगाव क्यों? महाराज! हमें दूसरों का पाप पाप दिखता है खुद का पाप पाप नहीं, वह मजबूरी दिखती हैं। क्या करें, गुस्सा करना पड़ता है कोई दूसरा गुस्सा करे तो कहोगे- गुस्सैल है दूसरा यदि कुचक्र रचे तो कहेंगे कि आदमी बड़ा षड्यंत्रकारी है, खुद करे तो थोड़ा बहुत तो तिकड़म लगाना ही पड़ता है यह तो ट्रैक्ट है कैसा दोहरा नजरिया अपने जीवन के प्रति।

‘तुम बिगड़े तो बिगड़े रे भाई, हम बिगड़े तो राम दुहाई’।

यह बात कहाँ से आई? यह प्रवृत्ति, यह मान्यता जब तक हमारे भीतर बैठी रहेगी हम अपने आप को पाप से बचाने में समर्थ नहीं होंगे। अपने आप को पाप से बचाना है तो हमें सबसे पहले पाप को पहचानना होगा पाप करने से डरना होगा। चौबीस घंटे बेखौफ होकर पाप करते हो मन में चाहे जैसा विचार विकारग्रस्त भाव लाते हो ,वचनों से चाहे जैसे अनर्गल वचन बोल देतो हो, निष्ठूर, कर्कश, मर्मघाती हृदयविदारक शब्दों का प्रयोग कर लेते हो और शरीर से न जाने कितनों को, कितने प्रकार की यातनाएं दे डालते हो ,उस समय कुछ नहीं सोचते। संत कहते हैं- इससे बचना है तो पहले पाप से डरो, क्या करो पाप से डरो। आप अपराध से डरते हो कि नहीं? किसी भी सभ्य मनुष्य को कोई अपराध करने के लिए कहा जाए तो क्या वह राजी होगा, क्यों नहीं? केवल इसलिए कि अगर अपराध करूँगा तो मैं अपराधी कहलाऊंगा, मुझे जेल जाना पड़ेगा, दंडित होना पड़ेगा, मेरी प्रतिष्ठा खराब होगी, मेरे ऊपर संकट छाएंगे, इसी कारण से वह व्यक्ति कानून से डरता है, अपराध से बचता है। जो कानून से डरता है वह अपराध से बचता है जो पाप से डरेगा वह पाप से बचेगा। कानून के डर के कारण तुम अपराध से बच जाते हो, जिस दिन कुदरत के कानून से डरने लगोगे पाप से भी बच जाओगे। कानून में तो फिर भी ऐसी गुंजाइश है कि अपराधी अपराध करके भी बच जाए पर कुदरत के कानून में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं वहा तो जो अपराध करता हैं उसे अपराध का परिणाम, पाप का परिणाम भोगना पड़ता हैं ।

पाप से डरे, अपराध तो बाहर जो प्रकट होता है वह है पाप मन में पलता है कानून अपराध को नियंत्रित कर सकता है लेकिन पाप को नियंत्रित करने के लिए तुम्हें खुद को जगाना होगा तो पाप करने से बचना है तो पहली बात पाप से डरो। कुछ पाप से डरते हैं और कुछ पाप करके डरते हैं। पाप से डरने वाला पाप करता नहीं और पाप करके डरने वाले का रास्ता प्रशस्त नहीं होता। पाप करके, डरके क्या पाओगे? अरे अब हम से पाप हो गया अब क्या करें? करो टेंशन, भोगो, पाप का फल संताप है। पाप करने से डरो पाप करके मत डरो। पाप करने से डरोगे तो पाप होगा ही नहीं, और करके डरोगे तो बच नहीं पाओगे तो पहली बात पाप करना।

अपनी रुचि को आप बदलिए, पाप रूचि से बाहर आइए जिनकी पाप रुचि अधिक होती है वह पापी होते हैं, पाप बेखोब करते हैं। अपने आप को सौभाग्यशाली मानो कि तुमने एक ऐसे कुल में जन्म लिया जहाँ पीढ़ियों से, तुम्हारे अंदर अहिंसा, करुणा, दया के संस्कार है। एक चींटी भी अगर धोखे से मर जाए तो हृदय में पीड़ा होती है। यह तुम्हारा महान सौभाग्य हैं कि तुम्हारे लिए जन्म-घुट्टी में दया के संस्कार है, पाप-भीति के संस्कार है। इसीलिए प्रवृत्तिगत बहुत सारे पाप से अपने आपको बचा लिए। धरती पर ऐसे भी अनेक लोग हैं जो बेखौफ होकर पाप करते हैं। जो जानवरों की खाल को घास-फूस की तरह उखाड़ डालते हैं। आज का दिन इस धरती के लिए बड़ा गंदा दिन है। आज कितने मूक-प्राणियों को अकाल मौत का शिकार होना पड़ेगा। हालांकि यह सब लोग अपने-अपने विश्वासों के अनुसार कर रहे हैं। लेकिन हम तो केवल भावना ही भा सकते हैं। हमें जानना चाहिए कि जब हम किसी को प्राण दे नहीं सकते तो हमें प्राण लेने का क्या हक है। जिनके मन में पाप से डर होता है जो इसे पाप मानते हैं, पाप समझते हैं वह सपने में भी ऐसा नहीं सोच सकते। लेकिन जिनके अंदर ऐसी समझ नहीं उनके लिए यह रोजमर्रा का काम है। एक कसाई को देखो उसे किसी जानवर को काटने में, मारने में कोई संकोच नहीं। उसके संस्कार खोटे हैं। तुम भाग्यशाली हो उस पाप से अपने आप को बचाए हुए हो तुम्हारे आचार-विचार, खान-पान, व्यवहार में इस तरह का पाप तो नहीं है, इससे बच गए हो, लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं हैं।

दूसरे प्रकार का पाप भी तुम्हारे साथ जुड़ा है जो तुम्हारी प्रवृत्तिगत पाप है। तुम्हारे विचार, वाणी और व्यवहार में पनपने वाला पाप हैं, जिसे करने के बाद हर प्राणी को भोगना पड़ता है। आज भी हम जो भी कर रहे हैं, भोग रहे हैं अपने किए को भोग रहे हैं और भविष्य में भी भोगेंगे, वह अपने किए को भोगेंगे। हिंसा और क्रूरता का परिणाम तो नरक है ही लेकिन दुष्प्रवृत्तियों का परिणाम जीवन को नरक बना देता है। आज जब पाप भोगने की बारी आती है तो रूह काँपती है। जब तुम पर कोई पाप हावी होता है, पाप का फल सामने आता है, तो तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया होती है? घबराते हो, विपत्ति आ रही है, बीमारी हो रही है, वियोग हैं और घर परिवार में विसंगतियाँ हैं, अशांति है, मन उद्वेलित होता है किसके कारण यह हुआ है, यह विपत्ति कौन लाकर दिया, यह बीमारी कौन लाकर के दिया है, यह बिछड़-वियोग किसने दिया, यह विसंगतियाँ, विषमताओं को किसने जन्म दिया? बोलो! तुम्हारे पाप ने ही तो। इसका बीज किसने बोया, इसका बीज किसने बोया? तुमने स्वयं ने ही। करते समय तो तुम्हें कुछ भान नहीं था, भोगते समय तुम हैरान हो। लोग पाप बेभान होकर करते हैं और भोगते समय हैरान होते हैं। संत कहते हैं- अगर पाप करते समय सावधान होते तो आज भोगते वक्त तुम्हें इतना हैरान होने की नौबत नहीं आती। बड़े-बड़े पाप जो करेंगे वह तो कितने भवान्तरों तक दुख पाएंगे कुछ नहीं कह सकते। लेकिन जो पाप तुम्हारे रोजमर्रा के जीवन में होता है जिसे तुम पाप नहीं मानते, उस पाप का फल भी तुम्हें भोगना पड़ेगा। महापुरुष भी उससे वंचित नहीं रहे। पाप को सबको भोगना पड़ा।

‘ना भुक्तं छियते कर्मः’

हम किससे अपनी बात शुरू करें? सबसे पहले तो हम इस युग के प्रथम महान पुरुष आदिम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के सामने खड़े होकर देखते हैं। भगवान ऋषभदेव तीर्थंकर जिनके वर्तमान जीवन में कोई पाप नहीं था। एक पाप उनसे हुआ, क्या हुआ था? क्या हुआ था? थोड़ा जोर से बोलो- बैल के मुँह में मुँसीका बाँधा था, बैल के भोजन में अंतराय डाला, नतीजा क्या निकला, छ: महीने तक आहार नहीं हुआ, है ना। तो उनके लिए हो गया महाराज! हम तो कुछ भी करें, हमें तो सब माफ़ है बोलो ऐसा हैं। उनको तीर्थंकर की अवस्था प्राप्त करने के बाद भी अपना पाप भोगना पड़ा तो क्या तुम्हें नहीं भोगना पड़ेगा? सामन्य आदमी तो इसको पाप, पाप के रूप में गिनता ही नहीं है, अरे इसमें कौन सा पाप! तो एक ऐसे छोटे से कृत्य का इतना बड़ा दुष्परिणाम है,तो रोजमर्रा की जिंदगी में चौबीस घंटे में तुम कितने जघन्य स्तर के पाप करते हैं उनका हिसाब लगा कर देखो। रूह काँपेंगी और काँपनी ही चाहिए। सीता जी के अतीत जीवन को जब हम जैन पुराणों के अनुसार पलट कर देखते हैं क्या किया था सीता ने? अग्नि परीक्षा देने के बाद भी उन्हें वनवास जाना पड़ा। निर्दोष होने के बाद भी वो लांछित हुई। पूरी कथा के प्रसंग को देखकर, सुनकर ऐसा लगता है कि उनके साथ घोर अन्याय हुआ। लेकिन इसका बीज किसने बोया था। अतीत जीवन में झाँककर देखो। एक मुनिराज, एक आर्यिका, जो गृहस्थ अवस्था की बहन थी उनसे बात कर रहे थे एकांत में। सीता के मन में उनके प्रति खोटे भाव आ गए, लांछन लगा दिया, नतीजा निर्दोष होने पर भी वह लांछित हुई। हेकहानी, श्रीपाल के चरित्र को पलट कर के देखो। उसने मुनियों को भांड कहा खुद भांड बनना पड़ा। उन्हें कोड़ी कहा, खुद कोड़ी बनना पड़ा। जब-जब पाप किया उसका परिणाम उसे भुगतना पड़ा। अगर हम पुराणों को पलट कर के देखेंगे तो उसमें पाप पुण्य का खेल ही दिखेगा और कुछ नहीं दिखेगा। हर प्राणी को अपने कृत्य का परिणाम भुगतना ही पड़ता हैं, फिर तुम किस खेत की मूली हो।

सम्राट श्रेणिक ने एक पाप किया था। एक मुनिराज के गले में मरा हुआ साँप डाल दिया था उपसर्ग किया था। उसके लिए नरक आयु का बंध हो गया, बाद में वह बदला, भगवान का परम भक्त हो गया, श्रावक श्रेष्ठ हो गया, क्षायिक सम्यक-दृष्टि हो गया, अटल श्रद्धालु हो गया। और अपनी आत्मा में इतनी भी योग्यता बढ़ा ली कि आने वाला वह प्रथम तीर्थंकर बनेगा। लेकिन एक कथा आती है कि श्रेणिक को मालूम पड़ा कि उसे नरक जाना पड़ेगा तो भगवान महावीर के चरणों में विफल होकर पहुँच गया और कहा- भगवन यह बड़ा गड़बड़ हो गया, भगवान यह बड़ा गड़बड़ हो गया। हमें किसी भी तरह से नरक जाने से बचा लो मैं आपका इतना बड़ा भक्त हूँ। मैं नरक जाना नहीं चाहता। भगवान ने कहा-जाना तो पड़ेगा। भगवन आपका इतना भक्त, कुछ तो उपाय करो कुछ तो कृपा बरसाओ। भगवान ने कहा- ठीक है एक काम कर, तीन उपाय बताता हूँ तीन में कोई एक उपाय कर ले तो तू नरक जाने से बच सकता है। बताओ- पहला काम तो यह कर कि तेरी दादी आज तक मेरे दर्शन के लिए नहीं आई एक बार उसे ले आ। दूसरा काम यह कर कि जिनदत्त श्रेष्ठि की दासी है देवदत्ता- उसने आज तक कभी दान नहीं दिया उसके हाथ से दान करा ले और तीसरा काम एक कालसोकरी नाम का कसाई है तेरे राज्य में जो प्रतिदिन पाँच-सौ भेंसो का वध करता है एक दिन का उसका वध रोक दे, तू नरक से बच जाएगा। राजा श्रेणिक तो फूला नहीं समाया। यह तीनो मेरे लिए तो एक पल भर का काम हैं, यह चुटकी भर का खेल है।

मैं मगदाधिपति हूँ, राजगृही का सम्राट हूँ, यह क्या बात हैं। सबसे पहले अपने घर आया और अपनी दादी से कहा- किसी भी तरह से तू भगवान महावीर के दर्शन के लिए चल। दादी ने साफ इनकार कर दिया। श्रेणिक ने खूब कहा- कि तू एक बार तो चल, जब मानने को तैयार नहीं हुई तो श्रेणिक ने दूसरा उपाय रचा और वन विहार के बहाने उसे रथ पर बिठाया और समोशरण की ओर बढ़ गया। जैसे ही रथ समोशरण की ओर मुड़ा, दादी ने समझ लिया यह मुझे समोशरण लेने के लिए ले जा रहा है तत्क्षण उसके पास एक तकुआ था, उससे अपनी दोनों आंखें फोड़ ली। श्रेणिक को बड़ी निराशा हुई, दुःख भी हुआ। इसके बाद वह जिनदत्त श्रेष्ठि से कहा कि अपनी दासी देवदत्ता से दान करवाओ। श्रेष्ठि ने देवदत्ता से कहा कि तुम दान दो और एक भिक्षुक आया और उसे दान देने की बात की गई। देवदत्ता ने पहले तो इनकार कर दिया लेकिन जब उस पर ज्यादा दबाव डाला गया, राजभय दिखाया गया तब देवदत्ता ने यह कहते हुए दान दिया कि यह मेरा दान नहीं, जिनदत्त का है। मैं तो केवल निमित्त बन रही हूँ, मेरा दान में विश्वास नहीं। दान कहाँ से होगा? अब श्रेणिक के पास तीसरा और आखिरी उपाय था। पहुँच गया सीधे कालसोकरी के पास, आदमी भेजा और कहा तू एक दिन वध रोक दे। कालसोकरी ने इंकार कर दिया यह मेरा पुश्तैनी धंधा हैं, यह काम नहीं हो सकता। एक दिन का वध रोकने की बात की गई। कालसोकरी ने कह दिया है मेरा पुश्तैनी धंधा मैं यह नहीं कर सकता। श्रेणिक ने उसे बड़ा प्रलोभन भी दिया, भय भी दिखाया लेकिन टस से मस नहीं हुआ। क्षुब्ध होकर श्रेणिक ने उसे उठाकर के जेल में डाल दिया, एक दिन जेल में रहेगा भेंसे ही नहीं होंगी तो मारेगा किसको। एक दिन का उसे कारावास दे दिया गया, जेल में रख दिया गया। लेकिन जेल में जब रखा गया उसने अपने शरीर के मैल की बत्तियाँ बनाकर पाँच-सौ भेंसे बनाकर उनका वध कर दिया। भाव हिंसा तो उसने कर ही दी तब श्रेणिक को समझ में आया ‘ना भुक्तं क्षीयते कर्मः’ भगवान से कहा- भगवान आपकी बात मैं समझ गया अब मुझे नरक जाने का कोई भय नहीं, मैंने जो काम किया उससे तो मुझे भोगना ही पड़ेगा। लेकिन अब वर्तमान जीवन को सुधारता हूँ। इतना तो कर लिया श्रेणिक ने कि सातवे नरक को पहले नरक में ले आया तैंतीस सागर को चौरासी हज़ार वर्ष में समेट लिया। उसके भीतर अटल श्रद्धा आ गई क्षायिक सम्यग्दर्शन हो गया और आने वाले युग में तीर्थंकरत्व को प्रदान करने की हैसियत उसने प्राप्त कर ली, तीर्थंकर प्रकृति का बंध भी कर लिया। यह पुरुषार्थ उसका काम कर गया लेकिन अपने आप नरक जाने से नहीं बचा पाया। तो मैं आप सबसे कहता हूँ -पाप करोगे तो पाप भोगना भी पड़ेगा। और ध्यान रखना- एक बात और विशेष ध्यान रखने की। पाप करने में लोग साथी हो सकते हैं, भोगना तो अकेले ही पड़ेगा। साथ मिलकर के जो पाप करेंगे, भोगने में तुम्हारे साथी नहीं बनेंगे अकेले ही भोगना पड़ेगा। तुम जिनके पीछे पाप करते हो, पाप भोगने में वह साथ देते हैं क्या? अपने पाप को खुद ही भोगना पड़ता है। इसीलिए इस पाप भोग से अपने आप को बचाना चाहते हो तो पाप करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाओ, उसे कम करो, जीवन तब धन्य होगा। छोटी-छोटी बातें भी हमारे लिए महान भयानक हो जाती हैं इसे हमें कभी भूलना नहीं चाहिए। जीवन में मोड़ लाइए, जीवन में बदलाव लाइए। अनादि से पाप ही तो करते आए हो। पहला काम पाप करने से डरो हो तो पाप भोगना कम होगा और कदाचित पूर्व के पाप को भोगने कि नौबत आये तो अपने अंदर समता बढ़ाओ। पाप भोगने की दो स्थितियाँ होती है, एक व्यक्ति पाप भोगता हैं रो-धोकर, दूसरा व्यक्ति पाप भोगता है समता रखकर। जो रो-धोकर के पाप भोगता है वह नया पाप बाँधता है और जो समता रखकर के पाप भोगता हैं वह पाप काटता है।

तीसरा क्रम पाप काटना है। पाप काटने के लिए पाप भोगते समय अपने अंदर समता विकसित करो, सहनशील बनो, विचलित होने से बचो। अपने किए का फल मानकर उसे सहज भाव से स्वीकार करो। कितना भी बड़ा पाप तुम्हारे जीवन में क्यों ना आ जाए दुखी मत हो, उसे अपने ऊपर हावी मत होने दो। इस बात का पक्का श्रद्धान रखो यह पाप पुण्य तो कर्म की परिणति है। मेरी आत्मा तो पाप-पुण्य दोनों से ऊपर उठी हुई हैं। मेरी आत्मा तो पाप-पुण्य दोनों से ऊपर उठी हुई हैं। मेरा कुछ बिगाड़ नहीं होने वाला। स्वरूप की तरफ दृष्टि रखोगे समता का भाव होगा, जन्म जन्मांतर के पाप को भी तुम काट दोगे। एक बात बता देता हूँ पाप भोगते हुए घबराना मत, कितना भी बड़ा पाप है एक दिन कटता है। बहुत-बहुत महान लोगों के जीवन में पाप उदय आया उनने पाप को भोगा, पाप को काटा। व्याकुल-चित्त व्यक्ति पाप को भोगते हैं और समता-निष्ठ व्यक्ति पाप को काटते हैं। अभी तक तुम पाप भोगते आए हो, पाप काटने की कला सीखो। पाप भोगते आये हो पाप काटने की कला सीखो। पापोदय में विचलित मत होओ।

एक दिन गुरुदेव ने हम लोगों को, जब हम ब्रह्मचारी थे स्वामी-कार्तिकेय-अनुप्रेक्षा पढ़ा रहे थे। आहारजी की बात है और उन दिनों हम लोग साधना करते थे तो सब साधुओ में होड़ थी, एकदम यौवन का प्रारंभिक चरण था। तो हम लोग उपवास आदि करते थे तो एकदम लंबी साधना करते थे, एक ही स्थान पर चौबीस-चौबीस घंटे खड़े रहना, बैठ-बैठ करके चौबीस घंटे बैठकर ध्यान करना तो हम सबका चलता था। हम ब्रह्मचारी अवस्था में भी करते थे महाराज लोग भी करते थे। गुरुदेव ने वह तो बोध देते हैं बोले – बैठे-बैठे यदि घुटने में दर्द हो रहा है, तो यह मत सोचो कि घुटने में दर्द हो रहा है, यह सोचो असाता जा रही है जाने दो, पिंड छूटें। क्या दृष्टि हैं -दर्द हो रहा है तो यह मत सोचो- दर्द हो रहा है यह सोचो असाता जा रही है तुम्हारे जीवन में आगत पाप को भागते समय यदि कोई पीड़ा उत्पन्न हो तो होने दो, मन को पीड़ित मत करो। गजकुमार मुनिराज के पापोदय से उनके सिर पर सिगड़ी जला दी गई। अंगीठी-अंगार झुलस रहे थे। मैं आप से पूछता हूँ – क्या गजकुमार मुनिराज ने पाप को भोगा था या पाप को काटा था। समझ में आ रही है बात, पाप भोगने की जगह पाप काटने की कला सीखो। समता ही पाप काटने का सबसे बड़ा हथियार है। उन्होंने देखा- ठीक है आ गया कर्म का उदय हैं यह हो रहा है मुझे थोड़ी जलाया जा रहा है मुझे तो कोई छू भी नहीं सकता। यह तो केवल तन हैं जा रहा है। जैसे हम आप देख रहे हैं वैसे वह जान रहे थे देख रहे थे, ज्ञान के बल पर समता लाया जा सकता है। आज तुम्हारे लिए ऐसा उपसर्ग नहीं हो कि तुम्हारे सिर में सिगड़ी जला दे लेकिन तुम्हारे दिमाग में भट्टी जरूर जलती हैं। गजकुमार के सिर के ऊपर सिगड़ी जली थी तुम लोगों के दिमाग के भीतर भट्टी जलती है, जलती कि नहीं जलती। चौबीस घंटे टेंशन, यह आग क्यों लगाते हो? ज्ञान से उसका समाधान जगाओ। पाप भोगना नहीं हैं, पाप काटना है।

पहला क्रम पाप करना नहीं, दूसरा क्रम पाप भोगना नहीं, क्या करना हैं पाप काटना है। तो मशीन समझ में आ गई पाप काटने की। समता, जितनी अधिक समता रखोगे अपनी विपत्ति को उतनी सहजता से दूर कर पाओगे। बीमारी उतनी सहजता से जाएगी। जो भी तुम्हारा दुख: है समता से जल्दी दूर होगा। आकुलता करोगे तो लंबा समय लग जाएगा। तो पाप काटने की कला अपनाइए, अभी तक तो भोगते हो। भोगने वाला दुखी होता है क्योंकि भोगते समय जो आकुलता होती है उससे नए पाप का बीज हम बो लेते हैं। तो फिर पाप की संतति नष्ट नहीं होती। अगर हम पाप को काटना सीख जाए तो फिर पाप की संतति का उच्छेद स्वत: होगा, वो चलेगा ही नहीं। तो पाप काटिये समता से पाप काटिये। आप लोग भी पाप काटते हो लेकिन पाप काटने के लिए क्या है हम लोगों के हृदय में एक जन्मजात विश्वास है- भगवान का नाम लो पाप कटेगा, पूजा-पाठ करो पाप कटेगा, धर्म करो पाप कटेगा, पाप कटता हैं हम तो कहते हैं एक बार एक बच्चे ने पूछा- महाराजी!

‘ऐसो पंच णमोयारो, सव्व पाप पणासणो, मंगलाणं च सव्वेसिम पड्डम हवई मंगलम’

जब यह बोला जाता है कि णमोकार बोलने मात्र से सारे पाप कट जाते हैं तो फिर पाप काटने के लिए और कुछ करने की जरूरत ही नहीं। खूब जी भर पाप करो णमोकार बोलो।

मैंने उसका उत्तर दिया शंका-समाधान में किसी बच्चे ने सवाल किया। हमने कहा यह सच है णमोकार जपने से पाप कटते हैं लेकिन हमारा मन इतना खराब है कि जपते-जपते भी पाप कर लेता है। जपते हैं णमोकार, दिमाग में आता है कुछ और। जब तक पाप का प्रोडक्शन जारी रहेगा तो पाप साफ कैसे होगा? ध्यान रखना पूजा, भक्ति, आराधना, उपासना पाप का शमन करते हैं, इनसे पाप कटता है लेकिन केवल पाप इस तरीके से पाप काट कर के तुम अपने जीवन को सुखी नहीं बना सकते। अगर तुम ऐसे भ्रम पूर्ण विश्वास के साथ जियो कि ठीक है भगवान के पास जाओ सारा पाप कट गया और मैं अब पाप करने के लिए आजाद हूँ तो श्रेणिक भगवान महावीर का सानिध्य पाकर के भी पूरा पाप नहीं काट पाया तो तुम कहाँ हो? अपने जीवन को पवित्र बनाना है तो समता से पाप काटो और पाप को काटने से भी बड़ा कदम है पाप को त्यागना। क्या? पाप त्यागो, क्या करो पाप त्यागो। फिर पाप काटने की जरूरत नहीं होगी। पाप काटने के लिए धर्म करने वाले लोग तो खूब मिल जाते हैं पाप त्यागने के लिए धर्म करने वाले लोग विरले होते हैं।

देखो! आप लोगों में क्या स्थिति हैं? सड़क चलते हैं, रेड लाइट आती हैं गाड़ी रोकते हो कि नहीं? रोकते हो- ग्रीन सिग्नल है गाड़ी आगे बढ़ाते हो। ग्रीन सिग्नल पर गाड़ी आप रोके भी रहो तो कोई दिक्कत नहीं लेकिन रेड सिग्नल पर गाड़ी आगे बढ़ा दो तो चालान कटता है कि नहीं? आप लोगों की स्थिति उल्टी है आपसे मैं कहूँ पूजा करो, पाठ करो, जाप करो, व्रत करो, उपवास करो, त्याग करो तो राजी, पर कह दूँ गुटखा छोड़ो, शराब छोड़ो, सिगरेट छोड़ो तो राजी नहीं। रेड सिग्नल दिखाया जा रहा हैं गाड़ी क्यों नहीं रोक रहे हो? बोलो- पाप त्यागने के लिए तुम उत्साहित क्यों नहीं होते? जीवन का उत्कर्ष तभी और तभी होगा जब पाप त्यागने का मनोभाव जागृत करो। अपना जीवन पवित्र बनाना चाहते हो तो पापत्मक प्रवृतियों का प्रतिज्ञा पूर्वक परित्याग करो। मुझे पाप छोड़ना है, कोई पाप का कार्य नहीं कर सकते, अपने अंदर भीतर झांक कर देखो कि जो भी पाप का काम है जितना मैं बच सकूं बचना है और प्रतिज्ञा पूर्वक त्याग करना है। भगवान ने धर्म की शुरुआत ही करते हुए का हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह पाप है इसको त्यागो। और आजकल ध्यान रखना एक मैं देख रहा हूँ इन दिनों धर्म की प्रभावना तो बहुत हो रही है लेकिन धार्मिक क्रिया-कांडो तक ही लोग सीमित है। धार्मिक क्रियाओं के प्रति तुम्हारा जितना रुझान हैं यदि धर्म के प्रति उतना रुझान होता तो जीवन ही बदल जाता। अपने आप को भीतर से बदलिए गुरुओं की शरण में लोगों की भीड़ रोज बढ़ रही है। साधु संतों के प्रवचनो के पांडाल खचा-खच दिखते हैं। और जब विवाह शादी में रात्रि भोज होता है तो वहाँ भी खचा-खच दिखते हैं। बोलो- खुल्लम-खुल्ला पाप और अनाचार करने में जिन्हे कोई संकोच ना हो उनका उद्धार कहाँ होगा? पाप को त्यागने की शुरुआत कीजिए। पाप काटने के लिए धर्म खूब किया अब पाप त्यागने का धर्म करो। पाप काटते-काटते तो दिन बीत गए, पूरी जिंदगी कट जाएगी पाप नहीं कटेगा। लेकिन पाप त्याग दोगे तो तुम्हारा जीवन पूज्य और पवित्र बन जाएगा।

इस धरती पर किसकी पूजा होती है? पाप काटने से तुम्हारा पाप कटे, पूरी तरह कटे इसमें कोई संशय नहीं। लेकिन तुम यदि पाप त्याग दोगे तो तुम्हारा तो उद्धार होगा ही होगा जो पाप त्यागते हैं उनके दर्शन से भी लोगों के पाप कट जाते हैं, कटते हैं की नहीं। परमेष्ठियों के वंदन से पाप कटते हैं, कटते हैं ना बोलो तो! क्यों कटते हैं? परमेष्ठियों के वंदन से पाप क्यों कटते हैं क्योंकि उनके पाप त्याग कर अपने आप को पवित्र बना लिया है। तो वह पवित्रता तुम्हारे हृदय में विकसित होनी चाहिए। पाप त्यागने का भाव जगाइए, बड़ा गाड़ अनुराग है लोगों का पाप में, छूटता नहीं बड़ा मुश्किल होता है। एक सज्जन पचत्तहर साल के थे अब तो दुनिया में नहीं है। थे धार्मिक लेकिन वह गुटखा खाते थे, उनकी धर्मपत्नी व्रती थी वह हमेशा दुखी रहती थी। उसने मुझसे कहा- महाराज जी! इनका गुटखा छुड़ा दो मैंने उनकी तरफ देखा तो कहा- महाराजी! इस काया के साथ ही छूटेगा नहीं छूट पायेगा। छूटता ही नहीं, पचत्तहर साल का हो गया छोड़ नहीं पाता, इतनी पकड़ गहरी बना ली कि छोड़ने की स्थिति नहीं बन रही। यह पाप बुद्धि का प्रतिफल है पापानुराग का परिणाम है। समय रहते जीतिए, अपनी चेतना को जगाइए सब कुछ छूट सकता है। पाप के जंजाल से अपने आप को मुक्त करिए। तो पाप करना, पाप भोगना, पाप काटना, पाप त्यागना। पाप करना हैं तो पाप करिए मत, पाप से डरिए। अब एक बार आपको फिर इन्ही चारों बातों में सार में क्या करना है तो बता रहा हूँ। पाप करिये मत और अगर पाप करना ही पड़े तो उसमें रस मत लीजिए, क्या हुआ? पाप करिए मत और पाप करना पड़े तो मन मारकर करिए, मजबूरी में। उससे क्या होगा? आने वाला पाप प्रगाढ़ नहीं होगा, रुचिपूर्वक मत कीजिए। धर्म का काम पूर्ण-उत्साह से कीजिये और पाप का काम मन मसोसकर करिए। देखिए! आप लोग दवाई खाते हो, बहुत से लोगों के सभा में जो सुबह से ही दवाई खाते होंगे और दवाई पर जिंदा हैं और मिठाई भी खाते हो। दवाई खाने में और मिठाई खाने में, दवाई रोज खाते हो मिठाई यदाकदा खाते हो दोनों के प्रति रुचि एक सी होती क्या? मिठाई चाव से खाते हो और दवाई बचाव के लिए खाते हैं। एक में चाव हैं एक में बचाव, एक में सहज स्वीकृति हैं दूसरे में मजबूरी। संत कहते हैं- धर्म का काम मिठाई खाने की तरह उत्साह से करो पाप का काम ऐसा करो जैसे दवाई खा रहे हो, जबरदस्ती करना पड़ रहा हैं। पाप करने में अनुत्साह, करते वक्त भी यह मनोभाव हो कि यह पाप है, दुष्कृत्य हैं, दुष्कर्म हैं, मुझे इससे बचना है, यह जाग्रति रखो तो पाप करते समय अनुत्साह रखो, पाप का बंधन कमजोर होगा और पाप को भोगते समय सचेत रहो, समता रखो तो पाप तुम्हें विचलित नहीं कर पाएगा, तुम्हारा बिगाड़ नहीं होगा। कैसा भी पाप का प्रकोप होगा, तुम व्यग्र और बेचैन नहीं हो सकोगे। उससे तुम पाप को काटने में समर्थ होगे, जब तुम्हारा पाप कुछ अंशो में घटेगा तभी तुम पाप त्याग कर पाओगे। हर कोई के बूते की बात नहीं है कि वह पाप त्याग दे और जिसने भी पाप त्यागा है वह हम सब के लिए आदर्श है। जीवन में पाप त्यागो और जिनने भी पाप को त्यागा हैं उन्हें अपना आदर्श बना करके चलोगे तो हमारा जीवन धन्य होगा

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