दहेज का बदलता रूप और बचने के उपाय
दहेज अर्थात शादी में लड़की के पिता द्वारा लड़के को एक साथ कोई रकम या घर के सामान देना। आज इसने एक नए आग्रह का रूप ले लिया है जिसमें कि कईं बार आदमी को अपने सामर्थ्य से ऊपर जाकर यह कार्य करना पड़ता है। हमें ये मानसिकता बदलनी होगी क्योंकि एक पिता उच्च शिक्षा दिला कर अपनी बेटी को योग्य बनाता है, फिर सामर्थ्य अनुसार शादी करता है| लेकिन इतने के बाद भी लोगों को दहेज़ चाहिए होता है|
भारत की संस्कृति के इतिहास को पलट कर देखें, तो जब-जब असुरी शक्तियां हावी हुई है उनका अंत दुर्गा, काली बनकर किसी नारी दैवीय शक्ति ने किया है। दहेज जैसे भस्मासुर का अंत करना है तो युवतियों को दुर्गा बनकर आगे आना होगा और यदि सामने वाला दहेज का आग्रह रखें तो रिश्ता एक सिरे से खारिज कर देना होगा। जब पूरे समाज में एक क्रांति रूप में यह होगा तो सुधार अवश्य आएगा।
परन्तु युवतियों को भी ये ध्यान रखना होगा कि वे दुर्गा ही बनें चंडी नहीं बनें और मानवीय संवेदनाओं का उल्लंघन कभी न करें, अपनी सीमाओं का हमेशा ख्याल रखें|
अपनी सामर्थ्य और रुचि से आदमी पूरा धन लुटा दे कोई बुराई नहीं लेकिन यदि दबाव या याचना के कारण खर्च हो तो इससे बुरा कुछ नहीं। साथ ही फिजूलखर्ची पर पूरा ध्यान रखना चाहिए और अपने बेटी को देने का अर्थ विपत्ति में उसके काम आना होना चाहिए। तो हमें अपनी सोच को बदलना होगा और इस विकृत रूप से बचना होगा|
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