नज़र, नज़रिया और नज़ारे

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नज़र, नज़रिया और नज़ारे

नदी की तेज धार बह रही थी। उस धार में दो तिनके थे। पहला तिनका धार को रोकने का प्रयास कर रहा था उससे जूझ रहा था। तिनका आखिर नदी की तेज धार से कितना जूझता। पानी की एक लहर ने उसे उठाकर दूर फेंक दिया। दूसरा तिनका बड़े अहोभाव से भरा था। उसके मन में अतिरिक्त उमंग और उल्लास था। उसने सोचा यह नदी सागर तक की यात्रा पर निकली है क्यों न  मैं इसकी यात्रा का सहगामी बनूं। मैं भी इसके साथ-साथ चलूं। वह धार के साथ बहने लगा और सागर तक पहुंच गया। जीवन की भी ऐसी ही कुछ स्थिति है। कुछ लोग हैं जो वक्त की धार से लड़ते हैं और कुछ लोग हैं जो वक्त की धार में बहते हैं। लड़ने वाले अपने वजूद को समाप्त कर देते हैं और बहने वाले शुद्ध अस्तित्व को विराट स्वरूप प्रदान करते हैं। हमारे पास जीवन है। हम जीवन कैसे जीते हैं? हम जीवन से जूझ रहे हैं या जीवन के साथ बह रहे हैं, जी रहे हैं? सच्चे अर्थों में देखा जाए तो आज जीवन जीने वाले लोग कम हैं और जीवन से जूझने वाले लोग ज्यादा हैं। जीवन से जुड़ने वाले लोग जिंदगी के नाम पर एक बोझ ढोते हैं और जीवन को जीने वाले लोग जीवन का रस लेते हैं, आनंद लेते हैं। आप क्या चाहते हो? जीवन को एक बोझ बनाकर जीना चाहते हो या जीवन को अपनी आनंद की यात्रा बनाना चाहते हो? दोनों स्थितियां हमारे साथ है। हम जीवन को एक बोझ की तरह ढोकर भी पूरा कर सकते हैं और जीवन को आनंद की यात्रा भी कर सकते हैं। यह हमें तय करना है। यदि हमारे अंदर जीवन जीने की कला विकसित हो गई तो हमारे लिए यह जीवन जीवन नहीं आनंद की यात्रा है और यदि हमने जीवन की कला नहीं जानी तो यह जीवन हमारे लिए केवल भोज और भार है। संत कहते हैं निर्बोझ बनो, निर्भार बनो। अपनी जिंदगी को journey of joy बनाओ। सच्चे अर्थों में अपने जीवन को enjoy एंजॉय करो। कैसे करें?

जीवन से जूझना और जीवन को जीना दोनों में बहुत अंतर है।

प्रतिक्रिया मूलक जीवन जीने का मतलब है जीवन से जूझना और सहजता से जीने का मतलब है जीवन को जीना। कल मैंने हमारे जीवन में आने वाली अशांति के चार कारणों में कहा था– “विपरीत परिस्थितियांऔर दूसरे नंबर पर हैप्रतिक्रिया अपने जीवन में झांक कर देखें कि हमारा जीवन कितना ज्यादा प्रतिक्रियात्मक है। प्रतिक्रिया का मतलब किसी घटना, किसी प्रसंग, किसी परिस्थिति से प्रभावित हो जाना और प्रभावित होने के बाद चित्त में बारबार उसका उभार आना। सामान्य रूप से हम प्रतिक्रिया को रिएक्शन कहते हैं। रिएक्शन क्या है? रिएक्शन तभी होता है जब हम किसी चीज से प्रभावित होते हैं। घटना को घटना की तरह देखना रिफ्लेक्शन है और घटना को देखने के बाद घटना से जुड़ जाना, उसमें बह जाना रिएक्शन है। दो चीजें हैं एक रिफ्लेक्शन और एक रिएक्शन। रिफ्लेक्शन सहज है। रिएक्शन में असहजता है। दर्पण के सामने हमने कोई भी वस्तु रखी। दर्पण सहज रुप से उसे प्रतिबिंबित करता है और उसका रिफ्लेक्शन हमें दर्पण में दिखाई देता है। दर्पण के सामने अगर अग्नि की ज्वाला हो तो दर्पण उसे भी प्रतिबिंबित कर लेता है और दर्पण के सामने यदि हमने पानी का झरना रख दिया तो दर्पण उसे भी प्रतिबिंबित करता है। लेकिन आपने देखा कि दर्पण अग्नि की ज्वाला को प्रतिबिंबित करते समय कभी गर्म नहीं हुआ और झरने को प्रतिबिंबित करते समय कभी गिला नहीं होता। दर्पण दर्पण है। यह रिफ्लेक्शन है यहां जीरो रिएक्शन है। जो सामने आए उसे सहज भाव से स्वीकार कर लो और नजरअंदाज कर लो। उससे चिपको मत। उससे जुड़ो मत। यह सहजता जिसके जीवन में होती है वह सदा सुखी रहता है और जो रिएक्ट करता है प्रभावित होता है वह सदैव दुखी रहता है।

आचार्य कुंदकुंद ने हमें अपने जीवन को दुख से मुक्त रखने का उपाय बताते हुए बड़ी मार्मिक बात कही। उन्होंने कहा कि संसार में दो तरह के लोग होते हैं एक वह जो चिपकते हैं और एक वह जो तटस्थ  रहते हैं। आप धूल में लेट हो गए आपके शरीर में धूल नहीं चिपकेगी पर यदि आपका शरीर गीला हो उसमें चिकनाई लगी हो तो धूल चिपके बिना रही नहीं रहेगी। सारी प्रवृत्तियां समान हैं एक ज्ञानी की भी और एक अज्ञानी की भी। अज्ञानी आसक्ति की धूल से जुड़ा होता है। आसक्ति की स्निग्धता से जुड़ा होता है। वह राग द्वेष मूलक प्रतिक्रिया करता है तो उसके साथ कर्म की रज चिपक जाती है जो कालांतर में उसे दुख देती है। उस क्षण उसको आकुल करती है। यह आकुलता ही दुख है। और ज्ञानी राग रहित होता है, आसक्ति रहित होता है इसलिए वह चिपकता नहीं। कर्म के बंद से रहित होता है। उसके अंदर कोई आकुलता नहीं होती। हम इस बात को थोड़ा गहराई से समझने की कोशिश करें। हमारा चित्त अपना काम करता है लेकिन प्रभावित किससे होता है? जिससे जुड़ाव होता है। जिससे जुड़ा होता है उससे प्रभावित होता है। सड़क चल रहे हैं सैकड़ों लोग रहे हैं जा रहे हैं। अच्छे लोग भी हैं बुरे लोग भी हैं। कभी हमारा ध्यान उनकी तरफ जाता है? क्यों नहीं जाता? हमें कोई मतलब नहीं है और जिन से मतलब नहीं उनसे हम प्रभावित नहीं होते। हम प्रभावित होते हैं, जल्दी प्रभावित हो जाते हैं और जितने प्रभावित होते हैं उतना हमारे अंदर आकुलता होती हैं। जो ज्ञानी होता है वह तटस्थ होता है। उसमें प्रतिक्रिया शून्यता होती है तो वह ना कभी सुखी होता है ना कभी दुखी होता है। ना उसे हर्ष होता है ना उसे विषाद होता है। ना प्रसन्नता होती है ना खिन्नता होती है। वह तटस्थ समता में बना रहता है। बड़ेबड़े ज्ञानी योगियों के सामने आप उनकी प्रशंसा के गीत गाओ उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता और कोई जाकर उनकी निंदा आलोचना करें तो भी उन्हें कोई फर्क नहीं। क्यों? क्योंकि उन्होंने ना कभी प्रशंसा को पकड़ा है ना निंदा को पकड़ा है। नतीजाना प्रशंसा से प्रभावित होते हैं ना निंदा से प्रभावित होते हैं। सच्चाई तो यह है जो स्वयं में भावित होता है वह पर से प्रभावित नहीं होता और जो पर से प्रभावित नहीं होता वह कभी दुखी नहीं होता। अपने मन को देखो। कोई तारीफ करे तो पल में खिल जाते हैं। थोड़ी सी तारीफ से खिल जाते हैं भले झूठी तारीफ हो और टिप्पणी करें तो खौल जाते हैं। पल में खिले पल में खौले। एक पल लगता है कितने कच्चे हैं। हम लोग यानी हमारी प्रसन्नता और हमारी खिन्नता हमारे हाथ में नहीं है दूसरों के हाथ में है। जैसे स्विच ऑन करो लाइट जल गई जैसे स्विच ऑफ करो लाइट बुझ गई और लाइट को कोई कभी भी जला सकता है कोई कभी भी बुझा सकता है। संत कहते हैं लाइट के स्विच दूसरे हाथ में रहे तो कोई बात नहीं। लाइट को कोई सामने वाला अपनी इच्छा से जलाएं और बुझाए तो कोई बात नहीं। पर कम से कम अपने जीवन की लाइट को तो संभाल लो। उसके स्विच अपने हाथ में रखो। उसे चाहे जब चाहे जो जलाएं चाहे जब चाहे जो बुझाए वैसी स्थिति निर्मित ना होने दो। क्या करते हैं आप? बोलिए। थोड़ीथोड़ी बातों में मन बहुत जल्दी प्रभावित होता है और जब मन प्रभावित होता है तो आकुलता होती ही होती है। दो तरह का जीवन है एक सोने जैसा एक लोहे जैसा। सोने को कीचड़ में डालो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। कीचड़ में रहते हुए भी वह सोना सोना रहता है। उसको निकालकर धोने भर की देर है और कुछ करने की जरूरत नहीं होती और लोहे को कीचड़ में डालो तो क्या होता है? जंग लग जाती है। लोहा जंग खा जाता है। आचार्य कुंदकुंद कहते हैं

ज्ञानी और अज्ञानी की यही पहचान है कि ज्ञानी संसार की किस में रहता है पर वह सोने की भांति जीता है। कीचड़ में रहने पर भी उससे अलिप्त रहता है। जैसे सोना कीचड़ में पड़ने के बाद बात भी उससे लिप्त नहीं होता। ज्ञानी संसार में रहते हुए भी, सांसारिक क्रियाओं को करते हुए भी उनमें लिप्त नहीं होता तो कर्म नहीं बंधता, आकुलता नहीं होती, दुख नहीं होता, द्वंद नहीं आता, दुविधा नहीं आती। लेकिन अज्ञानी अपने राग भाव के कारण कर्म से बंद हो जाता है। जैसे लोहा कीचड़ में पड़ने के बाद जंग खा जाता है। उन्होंने हमें बहुत बड़ा सूत्र दिया है। तुम जिस संसार में रह रहे हो इस संसार को नहीं बदला जा सकता। तुम सोचो कि मेरे जीवन में कोई ऐसे निमित्त ना आए। असंभव! निमित्तो को मैं नहीं रोक सकता कोई भी नहीं रोक सकता। भगवान भी नहीं रोक सकते। निमित्त तो सबके आगे आएंगे। बाहर का निमित्त भले रोक दो कर्म के निमित्त को तो तुम नहीं रोक सकते। निमित्त आएंगे कदमकदम पर आएंगे। निमित्त को नहीं रोका जा सकता। किसे रोका जा सकता है? नैमित्तिक को रोका जा सकता है। मेरे सामने कोई प्रतिकूल प्रसंग ना आए यह मेरे हाथ में नहीं पर प्रतिकूल प्रसंगों से मैं प्रभावित ना होऊं यह मेरे हाथ में है। मैं अपनी स्थिरता बनाए रखूं यह मेरे हाथ में है। कोई मुझे सताए नहीं यह मेरे हाथ में नहीं है। पर कोई मुझे सताने आए तो भी मैं अपनी समता को टिकाए रखूं यह मेरे हाथ में है। हम हमारे हाथ में जो है उसे संभालने की कोशिश करें। अपने मन को टटोल कर देखें छोटीछोटी बातों में आप कितना दुखी होते हो। सुबह से उठने से लेकर सोने तक की क्रियाओं की समीक्षा कीजिए। उठे हैं, घर से मंदिर जाना है। ड्राइवर को आने में लेट हो गई। आप क्या करते हैं? चीखाचिल्ली शुरू होती है कि नहीं? एक पल का भी धैर्य मन में होता है? मन के विरुद्ध कोई भी बात होती है मन उसे पचा नहीं पाता और परिणामस्वरूप प्रतिक्रियाएं करना शुरू कर देते हैं। चलो, प्रतिक्रिया भी हो तो भी थोड़ा देखो प्रतिक्रिया का स्तर क्या है। तीखी प्रतिक्रिया, उल्टी प्रतिक्रिया होती है। क्यों? और इसकी बात पाते क्या हो? सुख पाते हो? आनंद पाते हो? आज तक का अनुभव क्या बताता है? कभी प्रतिक्रियाओं से आपने प्रसन्नता पाई है तो मैं कहूंगा जी भर के प्रतिक्रिया करो। किसी ने पाई? फिर भी मन है जो बारबार प्रतिक्रियाएं करता है और हमारे चित्त को दुखी बनाता है क्योंकि हम बारबार लोगों से, चीजों से, घटनाओं से प्रभावित होते हैं। अच्छेअच्छे लोग हो जाते हैं। हमने गुरुदेव को देखा कि गुरुदेव बहुत कम प्रतिक्रिया करते हैं और प्रतिक्रियाओं से बिल्कुल प्रभावित नहीं होते।

सन 2001 में कुंडलपुर का महोत्सव हो रहा था। गुरुदेव मंच पर बैठे। ढाई घंटे तक स्थिर आसन से बैठे। अभी उनका नंबर नहीं आया। कार्यक्रम चल रहा है। संचालक समय खा रहा है। कार्यक्रम को जबरदस्ती खींच रहा है। हम थे, क्षमा सागर जी महाराज थे, समता सागर जी महाराज थे। हम तीनों इस बीच बीसों बार प्रतिक्रिया कर चुके थे। यह कहां टाइम खा रहा है, जनता का कितना नुकसान हो रहा है। दो लाख की संख्या में जनता सामने बैठी है। समय खराब कर रहा है। गुरुदेव को जल्दी माइक देना चाहिए। जबजब भी कुछकुछ होता हम सब आपस में समीक्षाएं कर लेते। पर गुरुदेव बैठे हैं एकदम स्थिर। उस दिन शाम को मुझसे रहा नहीं गया। आचार्य भक्ति के बाद हम गुरु चरणों में बैठते थे। हमने कहा गुरुदेव गजब की समता है आप में। इतना समय उसने बर्बाद किया, इतनी बड़ी सभा और उसमें इतना समय वेस्ट किया और आपने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। हम लोगों ने तो बीसों बार प्रतिक्रिया कर दी। तो गुरुदेव ने क्या कहा? उन्होंने कहामैं इसी को अपनी सामायिक मानता हूं। जानो और देखो। मैंने सोचा दो घंटे मेरी सामयिक हो गई।

आपने देखा किसी गहरी नदी को? देखोगे तो उसकी करंट का एहसास नहीं होगा। गंगा को अगर आप देखोगे तो लगेगा कि ठहरी हुई है और किसी पहाड़ी नदी को देखोगे तो ऐसा लगेगा कि सरपट भाग रही है। गंगा ठहरी हुई है ऐसा लगता है उसमें करंट नहीं है। ऐसा दिखता है लेकिन जब उसमें पांव रखोगे तो पता लगेगा कि उसमें कितना तेज करंट है। उसका प्रवाह कितना तेज है। जिनका व्यक्तित्व गहरा होता है उनकी प्रतिक्रियाएं प्रकट नहीं होती। वह अपने में स्थिर रहते हैं। और जिनका व्यक्तित्व उथला होता है वह उथली नदी की भांति पलपल मे प्रतिक्रियाएं देते रहते हैं। संस्कृत में एक सूक्ति हैमहसाम वृत्तिर् दुर्लक्षःमहापुरुषों की वृत्ति दुर्लक्ष है। वह देखी नहीं जाती। वह कोई प्रतिक्रियाएं करते नहीं। चीजों से प्रभावित नहीं होते, जाल में सबको लेते हैं पर उलझते नहीं है। जानना और देखना आत्मा का धर्म है उलझ जाना अधर्म है। कुछ हो उसको जानो, देखो उससे सीख लो। पर उलझ गए, अटक गए, फस गएं। आप लोग क्या करते हैं? उलझते हैं। अर्थहीन बातों में उलझते हैं। फिजूल की बातों में उलझते हैं। अपने मन को देखो कोईकोई प्रसंग आता है, कितनेकितने प्रकार की प्रतिक्रियाएं आपके मन में होती है। और फिजूल की प्रतिक्रियाएं ज्यादा होती है काम की कम। कुछ भी देखा दिमाग चलना शुरू हो गया। कुछ भी सुना दिमाग चलना शुरू हो गया। उलझ गए और आलतूफालतू बातों में कभीकभी ऐसे अटकते हैं कि हास्यप्रद स्थिति हो जाती है।

एक आदमी था। अपने घर के ओंटे पर दातुन किया करता था। और ठीक उसी समय एक सांड आया क्या करता था। उस सांड की सींग बड़ी आर्च नुमा थी। उसका दातुन करना और सांड का आना दोनों का लगभग एक समय था एक बार दातुन करते समय उसके मन में आया कि सांड के सिंग में मैं अपनी गर्दन घुसाऊंगा तो घुसेगी कि नहीं। बात दिमाग में आई और देखो प्रतिक्रिया कैसे आती है। प्रतिक्रिया करतेकरते कई दिन बीत गए। एक दिन उससे रहा नहीं गया। छोड़ो माथापच्ची प्रेक्टिकल करके देख लो और उसने आव देखा ताव सांड के सिंग में अपनी गर्दन को घुसा दी। फिर क्या हुआ आपको पता है। जो होना था वही हुआ। उसका कचूमर निकल गया। हंसी रही है उस व्यक्ति की करतूत पर? लेकिन अपने मन से पूछो दिन भर में कितनी बार सांड के सींग में अपनी गर्दन घुसाते हो? सांड के सींग में अपनी गर्दन घुसाने की आदत छोड़िए। सही बात है ना। बिना मतलब की बातों में उलझने से बचें। आज से तय कीजिए कि मैं कम से कम प्रतिक्रियाएं करूंगा और प्रतिक्रिया करूंगा तो नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं करूंगा। माना आप पूरी तरह से वीतरागी नहीं है, उतनी तटस्थता आपमे नहीं सकती। आप क्या हम साधु हैं हम भी अपने आप को पूरी तरह प्रतिक्रिया रहित नहीं मानते, ना बना पाए हैं, बनाने की कोशिश में लगे हैं। साधना की जैसेजैसे परिपक्वता होती है प्रवृत्तियां सीमित होने लगती है, निवृत्ति की ओर बढ़ना शुरू हो जाते हैं। हमारी सारी प्रतिक्रियाएं अपने आप नियंत्रित हो जाती है। पर प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने के लिए अपने इमोशंस पर कंट्रोल बहुत जरूरी है। जो प्रतिक्रियाएं हैं वह कौन कराता है? हमारे अंदर का भाव, विचार जो मन से नियंत्रित होता है। इमोशंस जिसके ऊपर जितने हावी होते हैं उस आदमी की प्रतिक्रिया, बहुल प्रवृत्ति उतनी अधिक होती है और उसकी प्रतिक्रियाएं भी उतनी ही तीखी हो जाती है। इमोशंस में भी दो तरह के इमोशंस हमारे अंदर हैं। एक पॉजिटिव और नेगेटिव इमोशन से है। किसी के प्रति प्रेम, करुणा, स्नेह, आत्मीयता, दया यह भी एक इमोशन है और क्रोध, गुस्सा, अहंकार, ईर्ष्या, विद्वेष यह भी एक इमोशन है। एक पॉजिटिव इमोशन है और एक नेगेटिव इमोशन है। मन में करुणा के भी भाव उमड़ते हैं तो मन में क्रोध का उबाल भी आता है। मन में दया का सागर लहराता है तो मन में हिंसा और हत्या के भाव भी आते हैं। मन में प्रेम प्रकट होता है तो घृणा और नफरत भी मन में ही प्रकट होती है। दोनों धाराएं हमारे अंदर है। एक नेगेटिव और दूसरी पॉजिटिव। जिस व्यक्ति का जीवन स्तर जैसा होता है उसके अंदर वैसे ही इमोशंस प्रभावी होते हैं और उसी के अनुरूप उसकी अभिव्यक्ति होती है। एक सात्विक व्यक्ति के जीवन में जो भी प्रतिक्रियाएं होती है वह प्रायः सकारात्मक होती है और एक व्यक्ति जिसके ऊपर नेगेटिव इमोशंस हावी हैं उनकी जो भी प्रतिक्रियाएं होंगी वह प्रायः नकारात्मक ही होंगी। आप देखिए मेरे द्वारा जो भी प्रतिक्रिया होती है वह कैसी होती है? सकारात्मक या नकारात्मक। सकारात्मक प्रतिक्रिया से आप खुद के लिए भी और सामने वाले के लिए भी एक अच्छी सीख देंगे और नकारात्मक प्रतिक्रिया से आप स्वयं को और पर को दोनों को नुकसान पहुंचाएंगे। जैसे आपका बच्चा कम मार्क्स लेकर आया। रिजल्ट से आपको असंतोष हुआ। अब क्या प्रतिक्रिया देंगे? इमानदारी से बोलो। बच्चा अच्छा रिजल्ट नहीं दिया, आपके अनुसार रिजल्ट नहीं दिया। आपने सोचा था मेरिट में आए वह मेरिट में नहीं आया। आपने सोचा था वह डिस्टिंक्शन लाएं, डिस्टिंक्शन नहीं लाया। कम मार्क्स लाया। अब आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी? गुस्सा करोगे? एक प्रतिक्रिया यह है और दूसरी प्रतिक्रियाबेटा कोई बात नहीं मार्क्स कम आए हैं। चलो पास हो गए। अगले साल थोड़ा ज्यादा मेहनत करना तो तुम और आगे बढ़ोगे। देखो अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाने के लिए हमें अपने काम में पूरी तरह दिल लगाना चाहिए। तुम्हें अपना करियर बनाना है तो उसके तुम्हें खुद को सावधान होना पड़ेगा। अगर तुम ठीक ढंग से नहीं पढ़ोगे तो तुम्हारा अपना कैरियर खराब होगा और पढ़ो अभी अगर मार्क्स कम आए तो कोई चिंता नहीं आगे चलकर तुम इसे कवर कर लो आगे बढ़ जाओगे। बोलो कौन सी प्रतिक्रिया को अच्छा मानोगे? और बेटे पर कौन सी प्रतिक्रिया का असर अच्छा पड़ेगा? पहले वाली प्रतिक्रिया में पहले तो आपका मूड खराब फिर बेटे का मूड खराब। बाप ने बेटे को किसी किसी बात को लेकर गुस्से में मारा। बेटा बहुत शांत चुपचाप रहा। बोला कि पापा आपको भी कभी आपके पिताजी ने ऐसा मारा होगा? पिताजीहां मारा था। बोला आपके पिताजी के पिताजी ने भी दादाजी को मारा होगा? तो पिताजी बोलेहां मारा था। पर यह सब तू पूछ क्यों रहा है? बोला मैं तो यह जानना चाह रहा हूं कि यह गुंडागर्दी हमारे खानदान में कब से चली रही है।

आप अपने बच्चों के प्रति, किसी के प्रति भी यदि नकारात्मक प्रतिक्रिया करते हैं तो परिणाम नकारात्मक ही आएगा। वह डिस्करेज होगा और कभीकभी इस नकारात्मक प्रतिक्रिया से प्रभावित होने वाले बच्चे सुसाइड भी कर लेते हैं। आज सुसाइड की घटना कितनी घटती है। बच्चा कम मार्क्स लेकर आया। आपने उनको चार बात सुनाई। उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ।

नकारात्मकता का असर नकारात्मक ही होता है और बच्चे ने नेगेटिव प्रतिक्रिया करके अपनी जीवन लीला को समाप्त कर दिया। नतीजा क्या? आपने खोया या पाया? और उसकी जगह आप ने एक सकारात्मक प्रतिक्रिया दी तो बच्चा सोचेगा चलो पापा ने मुझे डांटा नहीं एनकरेज किया और उसके मन में एक भावना आएगी कि मांपापा ठीक कर रहे हैं मुझे अब करना चाहिए और अच्छे से पढ़ना चाहिए और पढ़ाई में अच्छा ध्यान देगा और मांबाप मेरिट के शुभ चिंतक हैं वह उसके दिमाग में बैठेगा और उसका जीवन आगे अच्छा होगा। मैं आपको कहना चाहूंगा कि डांट से जो काम नहीं होता वह प्रेम और दुलार से हो जाता है। इसलिए हर जगह डांटडपट की आदत छोड़िए प्यार की भाषा को अपनाना शुरू कीजिए। नकारात्मक प्रतिक्रियाओं से अपने आप को यथासंभव बचाइए। सब चीजें हमारे मन की नहीं होती, गलत भी होती है। उसके गलत परिणाम ही हमें दिखाई पड़ते हैं। प्रतिक्रिया करना है ठीक है। गलत का प्रतिकार भी सही तरीके से करो। यदि गलत का प्रतिकार आप गलत तरीके से करते हो तो यह दूसरी गलती होगी। प्रतिकार करो सही तरीके से करो।

पत्नी ने खाना बनाया। मान लीजिए अच्छा नहीं बना। सब्जी का स्वाद आपको अनुकूल नहीं लगा। आप क्या प्रतिक्रिया करते हो? इमानदारी से बोलो। मान लो भोजन के लिए बैठे हो और सब्जी का स्वाद बिगड़ा हुआ हो तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी? क्या खाना बनाया है, खाना बनाना नहीं आता।

एक बार मैंने ऐसे ही एक सवाल पूछा तो सभा में एक ने कहा महाराज चुपचाप खा लेंगे। हमने कहा गजब की समता है। तो बगल वाला बोलामहाराज इसी में इसकी खैरियत है। घरवाली ऐसी कि अगर प्रतिक्रिया करें तो गए। लेकिन अमूमन आपकी प्रतिक्रिया नकारात्मक होती है। जाने आप क्या क्या बोलोगे। खुद के परिणाम खराब, पत्नी का परिणाम खराब और यदि उसी को थोड़ा दूसरे लहजे में प्रकट करो तो कितना अच्छा होगा। अरे क्या बात है! आज सब्जी इतनी अच्छी बनाई कि बहुत मीठी मीठी लग रही है। नमक का तो स्वाद ही नहीं है। पत्नी ने इरादतन नमक नहीं डाला ऐसी बात तो नहीं है। भूल गई और भूल गई तो आप इतनी ज्यादा क्षुब्ध क्यों हो रहे हैं? आप उसके लिए आरोप की भाषा, झड़ने की जगह आत्मीयता से भी तो बात कर सकते हैं। अनुरोध भी तो कर सकते हैं। दूसरे तरीके से कहा जा सकता है कि क्या बढ़िया आज खाना बनाया, मीठामीठा लग रहा है। उसको उसका एहसास होगा। आप अपने मन को टटोलो कि रोज आपके मनोनुकूल खाना बनाने वाली पत्नी की आप प्रशंसा कभी नहीं करते लेकिन एक दिन कुछ चूक हो जाए तो टिप्पणी करने में नहीं चूकते। कहां हैं आप? सकारात्मक प्रतिक्रिया करो।

एक आदमी खाना खा रहा था। सब्जी में जरूरत से ज्यादा मिर्च थी। इतनी मैच की मिर्च की धांस से आंसू रहे थे। वैसे ही राजस्थान वाले ज्यादा मिर्च खाते हैं। मिर्च खाना पर मिर्च लगाना मत। जरूरत से ज्यादा मिर्च होने के कारण आंख से आंसू रहे थे। पत्नी ने पूछा आप रो क्यों रहे हैं? पति बोला यह खुशी के आंसू हैं। पति बोला आज सब्जी तुमने इतनी अच्छी बनाई है कि खुशी में आंसू रहे हैं। तो पत्नी ने कहा थोड़ी और सब्जी डालूं क्या? तो पति बोले नहीं अब ज्यादा खुशी बर्दाश्त नहीं होगी। क्या ऐसे सकारात्मक प्रतिक्रिया से आप अपने घरपरिवार के माहौल में समरसता नहीं घोल सकते? बोलिए कर सकते हैं कि नहीं? आप क्या करते हैं कटुता फैलाते हैं क्योंकि कटुता भीतर भरी हुई है। आप अपनी सोच को बदलने की कोशिश कीजिए कि मैं नेगेटिव रिएक्शन नहीं करूंगा जब भी करूंगा सकारात्मक प्रतिक्रिया करूंगा। आप कर सकते हैं। थोड़ीथोड़ी बातों को लेकर जिस तरह की खींचातानी लोग कर लेते हैं उससे जो माहौल बिगड़ता है उसका परिणाम महान भयावह वह होता है। तो बदले अपने आप को और आप ऐसा कर सकते हैं कि नहीं? बोलो।

एक बार मैंने ऐसे ही चर्चा में कहा तो बोले क्या करें महाराज बर्दाश्त नहीं होता। हमने कहा तुम्हें घर में बर्दाश्त नहीं होता, घर की बातें बर्दाश्त नहीं होती, घरवाली बर्दाश्त नहीं होती बाकी सब की बर्दाश्त हो जाती है। देखिए मैं आपको अपने जीवन को नेगेटिव प्रतिक्रियाओं से बचाने के लिए कुछ टिप्स देता हूं। पहली बात– “अपने लक्ष्य को सामने रखेंआपके ऊपर नकारात्मक प्रतिक्रिया हावी नहीं होगी। आप गाड़ी ड्राइव कर रहे हैं, हाईवे पर चल रहे हैं, अपनी मस्ती में चल रहे हैं, सैकड़ों गाड़ियां जा रही है। आपको कोई फर्क पड़ता है? क्यों रही है, जा रही है। कोई ओवरटेक भी कर रहा है। आपको फर्क क्यों नहीं पड़ता? भाई हम को जहां जाना है वहां जाना है। रास्ते में कहीं अटकते हो? एक से एक रेस्टोरेंट दिखते हैं, एक से एक दृश्य दिखाई पड़ते हैं। मन अटकता है? नहीं, क्यों? हमें हमारा लक्ष्य पाना है तो लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जब हमारी दृष्टि होगी तो हमारे ऊपर किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया हावी नहीं होगी। आपने नटों को देखा है? रस्सी पर चलने वाले। नट रस्सी पर चलते हैं, नाटक करतब दिखाते हैं। हजारों लोग तालियां बजाते हैं पर उन्हें वह दिखता है? उनकी तालियों से प्रभावित होते हैं? ढोल नगाड़े बज रहे हैं, तालियां बज रही है, सब कुछ हो रहा है लेकिन नट को क्या दिख रहा है? उसे रस्सी भी नहीं अपना टारगेट दिख रहा है कि मुझे कहां पहुंचना है। उसे अपना लक्ष्य दिख रहा है और लक्ष्य को भूल जाएगा तो क्या होगा उल्टी ताली बजेगी। तो तुम्हारा लक्ष्य क्या है? शांति पाना, आनंद पाना, प्रसन्नता को टिकाना। अगर तुम अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहोगे तो इधर उधर की बातें तुम पर हावी नहीं होंगी। शांति चाहिए चुप रहो। शांति चाहिए नकारात्मक प्रतिक्रिया मत करो। शांति चाहिए फालतू बातों में मत उलझो। शांति चाहिए मत फंसो। चलो रहने दो आता है कि नहीं मन में? और जहां आप अपने लक्ष्य को लेकर चलते हो वहां आपकी शांति टिकती है कि नहीं?

कभीकभी बलजोर से आपकी पेच फंस जाए तो आप क्या करते हो? प्रतिक्रियाएं वैसी ही देते हो? बोलो। सोचते हैं कोई बात नहीं। एक बार ऐसा हुआ। एक आदमी जा रहा था तो किसी की बाइक से उसे छींटे लग गए। बरसात का समय था, सफेद नए कपड़े पहने थे। गुस्सा आया, जोर से चिल्लाया, ! बाइक वाला एक पहलवान था। उसने गाड़ी रोकी और तेज सर्वर में बोला क्या बोलता है। तो आदमी बोलाकुछ नहीं मैं तो पूछ रहा था कि आपकी गाड़ी है क्या? अब क्या हो गया? थोड़ी देर पहले प्रतिक्रिया कुछ और थी अब प्रतिक्रिया बदल गई। क्यों बदली? बाप सामने हैं इससे उलझे तो फसेंगे, अशांति होगी इसलिए वह काम मत करो। तो बाहर जब तुमसे कोई भारी दिखता है उससे तुम उलझना पसंद नहीं करते तो समझ लेना उलझन ही जीवन का भार है। हमें किसी से नहीं उलझना। ना घर में उलझना, ना परिवार में उलझना, ना समाज में उलझना। जीवन में उलझन आनी ही नहीं चाहिए। जहां भी हो केवल सुलझन की बात हो। शांति को आप अपना लक्ष्य बनाइए। और एक प्रयोग कीजिए सुबह उठकर एक भावना भाइयेमुझे शांत रहना है! मुझे शांत रहना है! मुझे शांत रहना है! मैं शांत रहूंगा कोई कैसी भी बात करें! मुझे सहन करना है! सहन करना है! सहन करना है! शांत रहना है! मैं अपने आप को शांत रखूं इस प्रकार की फीडिंग आप अपने सबकॉन्शियस माइंड में देंगे तो कभी भी आपके अंदर नेगेटिव रिएक्शन नहीं पाएंगे। फिर किसी शांतिधारा की जरूरत नहीं पड़ेगी। मंदिर में तुम शांतिधारा करते हो लेकिन उसमें भी अशांति कर लेते हो। कभी थोड़ा ऊपर नीचे जाए। तुम्हारी इच्छा हो और किसी दूसरे का नंबर जाए तो अशांति जाती है। तो वह शांतिधारा बाद में काम में आएगी पहले मन में भाव की शांति रखनी है। प्रेक्टिस करो मेरा लक्ष्य शांति है तो मुझे शांत रहने का अभ्यास करना ही पड़ेगा। मुझे शांत रहना है! मुझे शांत रहना है! मुझे सहन करना है! मुझे कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं देनी है! यह लक्ष्य आपको बनाना होगा। आप लोगों के साथ कहानी यह है कि सब बातें प्रवचन तक अच्छी लगती है। बाहर जाने के बाद फिर वही हाल। बदलिए। तो पहली बातअपने लक्ष्य को सामने रखिए

दूसरी बातअपने हित का विचार कीजिए आप रोज का अनुभव देखें

आप दुकान में बैठे हैं। ग्राहक आए। मान लो कपड़े की दुकान है। 50 साड़ियां दिखा दी। एक घंटे से माथा चाट रहे हैं और एक भी पसंद नहीं है। आप क्या करते हैं? पसंद नहीं आए यह बात तो जाने दो टिप्पणी और कर रही हैं तुम्हारी दुकान में तो कुछ है ही नहीं। आप क्या प्रतिक्रिया करते हो? बोलते होबहन जी चिंता मत करो माल ट्रांसपोर्ट में पड़ा है एकदो दिन में खुलेगा आप तब ले जाइए। मैं आप से कहता हूं इतनी देर अगर आपकी घरवाली आपका दिमाग चाटे तो आप बर्दाश्त करोगे? क्या हुआ?महाराज इतनी देर तो हमारी आपस में बात ही नहीं होती और कोई ऐसा कह दे तो बर्दाश्त नहीं। दुकान में है तो बर्दाश्त हो रहा है। वहां आप कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दे रहे। सही भाव प्रकट कर रहे हैं। क्यों? अरे महाराज ग्राहक से रिलेशन बिगाड़ लेंगे तो धंधा ही चोपट हो जाएगा। तो ध्यान रखो ग्राहक से रिलेशन बिगाड़ने पर धंधा चौपट होता है और अपनों से रिलेशन बिगाड़ने पर शांति चौपट होती है, जिंदगी चौपट होती है। अगर तुम्हें धंधा चौपट होने की चिंता है तो अपने जीवन को चौपट होने से भी तुम्हें बचाना होगा। तुम्हें जीवन की भी चिंता होनी चाहिए। आप अपनी प्रतिक्रियाएं दे सकते हो। मेरा लाभ जिसमें है मुझे वह काम करना है। मेरा, मेरे परिवार का, समाज का जो हित है वह मुझे करना है। यह सकारात्मक प्रतिक्रिया में है। नकारात्मक प्रतिक्रिया में नहीं। तो मुझे किसी भी अर्थ में कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं करनी। यह आप जान सकते हैं। ख्याल रखो अरे भाई इसमें कोई फायदा नहीं है, इसमें नुकसान है, इसमें अहित है। मत भूल जो चैप्टर को यहीं क्लोज करो और जहां गुस्सा आने की संभावना हो वहां एक स्माइल दे दो। काम खत्म। अंतर आएगा कि नहीं? बोलो। एक बात बताइए असर किसका ज्यादा पड़ता है? अपने अनुभव से बताना। गुस्से का कि स्माइल का? दोनों में अंतर मालूम है? अगर तुम किसी के प्रति गुस्सा करते हो तो तुम्हारे गुस्से से प्रभावित होकर अपना तुमसे डरता है और स्माइल देते हो तो वह तुम पर मरता है। तो तुम क्या चाहते हो? कोई तुम पर मरे या तुम से डरे? अपना बनाओ। पराए को भी अपना बना सकते हो। अपने संबंध को मेंटेन करो। जिन बातों से संबंध बिगड़े उनको छोड़ो। मैं आपसे पूछता हूं पकौड़ी खाने से पेट खराब होता है तो पकौड़ी छोड़ते हो कि नहीं? जिन बातों से संबंध खराब होते हैं उन बातों को क्यों नहीं छोड़ते? उनकी तरफ अपनी दृष्टि ही नहीं रखो। जीत की तरफ अपना ध्यान रखोगे तो कभी नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं होगी।  

तीसरी बात– “नजरअंदाज करना सीखें”, इग्नोर करने की आदत डालें। चीजों को इग्नोर करें जिन चीजों में कोई सार नहीं जिन चीजों में शांति नहीं जिन बातों से अशांति है उनको इग्नोर करें। देख कर अनदेखा करें। सुनकर के अनसुना करें। तो बात ही नहीं आएगी। जैसे मान लो आपको किसी ने कोई बुरा शब्द कह दिया और बुरा शब्द सुनकर आपने अनसुना कर दिया तो आपको कोई फर्क पड़ेगा क्या? इधर से सुनो उधर से निकालो। चैप्टर क्लोज हुआ कि नहीं और आपने उस शब्द को पकड़ लिया तब? जैसे एक शांत सरोवर में कंकड़ फेंकते हैं तो कंकड़ क्या करता है एक वलय बनाता है और वलय वलय वलय बनतेबनते पूरे सरोवर को व्याप्त कर लेता है। वैसे ही कान में एक शब्द आते हैं और दिमाग में चल जाता है। सामने वाले ने तो एक बार गधा कहा और तुमने सोचते हुए अपने आप को 5 बार कहा। क्या हुआ? अगर उस बात को हमने इग्नोर कर दिया। एक शब्द को सुनकर अनसुना कर दिया तो आपके अंदर नकारात्मकता बढ़ेगी। अपने आप अशांत हो जाएंगे। आप लोग पकड़ लेते हैं अच्छी बातों को तो इग्नोर कर दोगे और बुरी बात को पकड़ लोगे। आप औरों की बात जाने दो महाराज के साथ भी यही बात है महाराज प्रवचन में अच्छी बात बोलते हैं वह आपको याद नहीं रहेगी और एकआध चुभने वाली बात बोल दे तो महाराज को ऐसी बात नहीं बोलनी चाहिए थी।

संत कहते हैं किसी भी भवन में दो गेट होते हैं एक एंट्री का, एक एग्जिट का। तो हमें दोनों गेट का इस्तेमाल करना सीखना चाहिए। और बुरी बातों को एग्जिट कर के बाहर कर देना चाहिए। जिन बातों से मेरे मन की शांति, प्रसन्नता, समता टिकी रहे उन्हें एंट्री दें और जो मन की शांति को, तृप्ति को, मस्ती को खंडित करें उसे एग्जिट कर के बाहर कर दें। इग्नोर करना सीखिए कुछ भी फर्क नहीं पड़ेगा।

एक सज्जन है। बड़े शांत स्वभाव स्वभावी और उनकी धर्मपत्नी उतनी ही तेज मिजाज। प्रायः प्रकृति भी तालमेल ऐसे ही बैठाती है। पत्नी कुछ भी बोलती है बस वह मुस्कुराकर सुनते रहते हैं। उसको जो बोलना है बोल दे। सामने वाले के चेहरे पर मुस्कुराहट रहती है। करता वही है जो करना है लेकिन उस समय कुछ नहीं बोलता। एक बार मैंने उनसे पूछा कि तुम्हारी पत्नी इतना उलजलूल बोल लेती है झेलते कैसे हो? बोलेमहाराज मैं सुनता ही नहीं। वह कुछ बोलती रहती है मैं अपना ध्यान कही और लगा लेता हूं। मैं सुनकर अनसुना कर देता हूं क्योंकि उसकी बातें सुनने लायक है ही नहीं। जो बातें सुनने लायक है ही नही उसे सुनो क्यों? आप नजरअंदाज करना शुरु कीजिए। आप यह व्यवस्था नहीं बना सकते कि सब मेरे अनुकूल वचन बोलें। कोई नहीं बना सकता। मैं भी नहीं बना सकता कि सब मेरे अनुकूल वचन बोले। मेरे अनुकूल व्यवहार करें। ऐसी व्यवस्था मैं नहीं बना सकता पर सब के वचन और व्यवहार को मैं अपने अनुकूल बना सकूं यह व्यवस्था तो मेरे हाथ में है। दुनिया मुझे अपना बनाएं यह मेरे हाथ में नहीं पर पूरी दुनिया को मैं अपना बना लूं यह तो मेरे हाथ में है। हम सकारात्मक प्रतिक्रियाएं करें। जिससे अपने जीवन की बेहतरी को विकसित कर सकें। जीवन को आगे बढ़ाने में समर्थ हो सके। जीवन को इग्नोर करना सीखिए।

चौथी बात– “सहन कीजिए जो सहन करता है वही समर्थक बनता है। जितना हो सके सह लीजिए। ध्यान रखो दुख सदैव सहने के लिए होते हैं कहने के लिए नहीं। आप लोग कहते हो सहते नहीं। सहने से दुख कम होता है कहने से दुख बढ़ता है। क्या चाहते हो दुख को कम करना कि बढ़ाना? कम करना चाहते हो पर आप करते क्या हो? सहन करो, बर्दाश्त करो, पचाओ, हाजमे को बढ़ाओ, स्ट्रॉन्ग बनो, जो है एडजस्ट करो, पेशंस रखो, टॉलरेंस बढ़ाओ। आजकल लोगों का जीरो टॉलरेंस होता जा रहा है। कोई बर्दाश्त, सहन ही नहीं कर पाता। अगर आपके हृदय में सहनशीलता बढ़ जाए तो आप उल्टे को भी सीधा कर सकते हो। आपकी प्रतिक्रिया सदैव सकारात्मक होगी।

एक घर में बहू आई। बड़ी संस्कारी, सहनशील, विनय, गुणवान बहू आई और सास बड़ी उग्र, चंडी रूप थी। अब क्या शादी के दोचार दिन तक तो सब ठीक रहा लेकिन धीरेधीरे सास अपने तेवर में गई। बहू को उलजलूल बकना, तरहतरह से प्रताड़ना देने की कोशिश करना चालू हो गया और बहूजी मां जीजवाब देती रही। वह जो कहे  वो कर दे, जो सुनाए वह सुन ले। एक दिन सास ने कहा अरे तू कैसी है धरती को भी पांव मारो तो आवाज होती है और तू कैसी है पत्थर की पुतली तेरे मुंह में जीभ नहीं है क्या? बोलती क्यों नहीं। बहु कुछ नहीं बोली पर पड़ोसन ने बात सुन ली और पड़ोसन ने यह बात सुनी तो उसे समझ गया और सास को ललकारते हुए बोली कि तुझे लड़ने का इतना ही शौक है तो मुझसे लड़। यह देवी सी बहू तेरे घर में गई और तू अपना रोब उस पर झाड़ रही है। लड़ना है तो मुझसे लड़। बहू ने तुरंत आगे आकर कहा नहीं चाचीजी ऐसा मत कीजिए। यह मेरी मां है और मेरी मां ही मेरी गलतियों को नहीं बताएगी तो कौन बताएगा। आप इनसे ऐसा कहकर इनका अपमान ना करें। बहू के यह शब्द सुनते ही सांस की आंखें खुल गई और बोली मैं इतनी उग्र और तू इतनी शांत। मुझे सीख लेनी चाहिए। मेरे उस उग्र और दुर्व्यवहार के आगे भी यह इतनी समता और शांति का उदाहरण प्रस्तुत कर रही है उसका हृदय परिवर्तित हो गया। आप भी अपने भीतर यह सब घटित कर सकते हैं। मैं तो आपको यह कहूंगा आप जो भी पाओगे सह कर पाओगे लड़ कर नहीं। घर परिवार की बात मैं आपसे कर रहा हूं अगर वहां कुछ पाना चाहते हो तो सह कर पाओ लड़ कर नहीं। हमेशा सकारात्मक प्रतिक्रिया दो। नकारात्मक प्रतिक्रिया मत दो। तो हम निश्चित अपने जीवन को सुखी बना सकेंगे, समर्थ बना सकेंगे। तो

आज की चार बातेंअपने लक्ष्य को ध्यान में रखें“, “अपने हित का ख्याल रखें“, “चीजों को इग्नोर करना सीखेंऔरसहन करना सीखें अपने अंदर यह चारों बातें आएंगी निश्चित हम अपने जीवन को नकारात्मक प्रतिक्रियाओं से बचा सकेंगे और जीवन को आगे बढ़ाने में समर्थ हो सकेंगे।

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