क्या शरीर को छोड़कर बाहर निकला जा सकता है?

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शंका

गृहस्थ या श्रावक होते हुए जैन धर्म के सिद्धांतों के अनुरूप हम "out of body experience (शरीर से बाहर आत्मा का अनुभव) कर सकते हैं जिसके लिए हमारे साधु-संतों महाराजों को कई वर्ष लगते हैं? क्या उस अनुभव से हम परिचित हो सकते हैं?

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समाधान

आउट ऑफ बॉडी की जहाँ तक बात है, हमारे शास्त्रों के विधान अनुसार प्राणी कई परिस्थितियों में आउट ऑफ बॉडी होता है उसमें एक शब्द आता है समुद्घात। समुद्घात एक ऐसी परिणति है जिसमें यह जीव कुछ समय के लिए शरीर में रहते हुए भी अपने आत्मा के प्रदेशों को शरीर से बाहर फैला लेता है। वह वेदना की अधिकता में, कषाय के आवेग में और अन्य-अन्य निमित्तों में भी होता है। लेकिन ऐसी जो अवधारणा है कि ‘समाधि धारण कर ले’, ‘ शरीर को जड़वत बना दे और बाहर जाये’ ऐसा विधान हमारे शास्त्रों में नहीं है। हमारे जैन शास्त्रों के विधान अनुसार एक ही व्यक्ति अपने शरीर के अनेक रूप बना सकता है, पर-काय में प्रविष्ट हो सकता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि शरीर में सब प्राण रहते हुए भी शरीर से बाहर हो जाये। ऐसा विधान न मुनि के लिए है, न गृहस्थ के लिए है।

Edited by: Pramanik Samooh

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