सल्लेखना, समाधि मरण, संथारा में क्या अन्तर है?

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शंका

सल्लेखना, समाधि मरण, संथारा इन में क्या कोई अन्तर है? जैन समाज के लोग जो इसकी सरल व्याख्या नहीं जानते, उनसे यह प्रश्न यदि अजैन लोग पूछते हैं तो क्या समझाना चाहिए।

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समाधान

सल्लेखना के विषय में लोगों के बीच एक साफ़ सुथरी अवधारणा बता देनी चाहिए कि सल्लेखना किसी भी प्रकार की हत्या या मौत का आलिंगन नहीं है। सल्लेखना एक साधना है। जिसका मतलब है कि जीवन के अन्त तक अपनी तपस्या में निरत रहते हुए इस शरीर को छोड़ना, आख़िरी साँस तक अपनी साधना में निरत बने रहना यही सल्लेखना है। इस के लिए साधक अपनी शारीरिक और मानसिक तैयारी करता है। 

जैन धर्म तपस्या प्रधान धर्म है। जीवन के आदि से अन्त तक हर साधक तपस्या करता है। और ज्यों ज्यों अवस्था ढलान पर जाती है, साधना को उग्र और प्रखर कराया जाता है। जितनी प्रखर साधना होती है, हमारी आत्मा में उतना ही निखार आता है। इसलिये इस दृष्टि से अपने जीवन के अन्त के क्षणों में जब हमारा जीवन ढलान पर आ जाता है, तो धीरे धीरे धीरे धीरे भोजन पानी को कम करते हुए, तपस्या में आगे बढ़ते हुए अपने सारी physical और mental requirements (शारीरिक और मानसिक आवश्यकताओं) को reduce (कम) करते-करते शरीर को छोड़ने का नाम सल्लेखना या समाधि है। श्वेतांबर परम्परा में इसे ही सन्थारा कहा जाता है। इसका मतलब मर जाना नहीं है। सल्लेखना मरने के लिए नहीं की जाती क्योंकि

जीवितमरनाशंसा मित्रानुराग सुखानुबन्ध निदानानि।

सल्लेखना के पाँच अतिचारों में एक अतिचार है जीने की इच्छा और दूसरा अतिचार है मरने की इच्छा। जिसमें जीने या मरने की इच्छा है वह सल्लेखना ही नहीं। तो जिसमें मरने की इच्छा ही नहीं उसे आत्महत्या कैसे कहा जा सकता? यह तो जीवन-मरण से ऊपर उठने की एक साधना है। एक ऐसी साधना जो हँसते-हँसते इस संसार से विदा होने का मार्ग बताती है। यह हमारी बड़ी मौलिक साधना है, वर्षों से चली आ रही साधना है। इसे लोगों को बचाना चाहिए।

सम्यक्काय कषाय लेखनम् 

अपने शरीर को और अपने अन्दर के विकारों को धीरे-धीरे, धीरे-धीरे reduce (कम) करते जाने का नाम सल्लेखना है। एक ऐसी अवस्था में आना कि जब हम इस दुनिया से विदा लें, खाली होकर लें, विकार मुक्त होकर लें, पवित्र होकर लें; क्योंकि इसके बिना हमारी साधना भी फलीभूत नहीं।

Edited by: Pramanik Samooh

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