क्या सभी गणधर तद्भव मोक्षगामी होते हैं?

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शंका

गणधर ६३ ऋद्धियों के धारी होते हैं इसलिए उनमें सर्वावधि अवधि ज्ञान और विपुलमती मन:पर्यय ज्ञान होना चाहिए और वह तद्भव मोक्षगामी होने चाहिए। लेकिन रतन चंद जी मुख्तियार ने अपने शंका समाधान में लिखा है कि "सभी गणधर तद्भव मोक्षगामी नहीं होते", इसमें आगम क्या कहता हैं?

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समाधान

हमारे यहाँ गणधरों के बारे में ज्यादा कुछ नहीं मिलता है। एक श्वेतांबर पुस्तक मैंने देखी थी २५ साल पहले, ‘गणधरवाद’! उसमें गणधरों के बारे में बहुत स्थूल बातें थी और वहाँ पर उन्होंने गणधरों को तद्भव मोक्षगामी लिखा था। जो गणधर के जीवन की विशेषताएँ होती है उसके आधार पर यही कहा जा सकता है कि वह तद्भव मोक्षगामी होंगे क्योंकि उन्हें सर्वावधि अवधि ज्ञान होता ही है इसमें कोई संशय नहीं, विपुलमती मन:पर्यय ज्ञान होता ही है इसमें रंच मात्र संदेह नहीं है। यह आगम के विरुद्ध हो जाता है यदि हम उनको कहें कि उनके तद्भव मोक्षगामी होने का अनियम है। हम इन दोनों बातों के आधार पर यह बात अच्छे से अवधारित और सुनिश्चित कर सकते हैं कि जितने भी गणधर है सब तद्भव मोक्षगामी ही होते हैं।

Edited by: Pramanik Samooh

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