दुःख है संसार का स्वभाव 

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दुःख है संसार का स्वभाव 
एक आदमी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ स्कूटर से जा रहा था। चार लोग बैठे थे एक स्कूटर पर । खुद था, धर्म पत्नी थी और दो बच्चे थे। एक को आगे और एक को पीछे बिठाया हुआ था। बरसात का समय था, उसके स्कूटर से पानी के छींटे उछठे और एक पहलवान के कुर्ते पर पड़ गए। तो फिर क्या था पहलवान गुर्राया, एक घूंसा दे बैठा। बोला- भैया! मुझे मारा तो ठीक पर मेरी पत्नी को मत मारना, उसने पत्नी को भी दे दिया। बोले- भाई! पत्नी को दे दिया तो ठीक, पर बच्चों को मत छेड़ना। उसने एक-एक करके बच्चों को भी एक-एक तमाचा दे दिया। जब चारों को मारा तो उसने स्कूटर की किक मारी, बिठाया और गाड़ी लेकर चलता बना। घर आया, बच्चों ने कहा, पापा हद हो गई आप तो पिटे सो पिटे पर हम लोगों को भी पिटवा दिये। पापा बोले- देख! अब कोई नहीं कहेगा कि अकेले पापा पिटे, सब पिटे।
सीख:
हम कभी कभी सोचते हैं कि ये हमारे साथ ही क्यों हुआ? मेरे में क्या कमी थी, ऐसा सोचके हम परेशान होते रहते हैं। मगर जब हमें समझ में आ जाये कि हकीकत में अपने चारों और देखें तो कोई भी सुखी नहीं है सब दुःखी है। तो हमें अपनी परेशानी का बोझ हलका हो जाता है।
जब भी हमारे जीवन में दुःख आए, यह नहीं सोचना चाहिए कि मेरे जीवन में दुःख है, यह सोचना चाहिए कि सब दुःखी हैं। सब पिटे-पिटाये हैं, कोई सुखी नहीं है  इतना ही तो सोचना है और हकीकत में अपने चारों और देखें तो कोई भी सुखी नहीं है सब दुःखी है। क्योंकि दुःख तो संसार का स्वभाव है उसको कोई टाल ही नहीं सकता।
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