अन्य धर्मों के मन्दिरों के दर्शन कैसे करें? दाम्पत्य जीवन में तालमेल कैसे बनायें?

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शंका

प्र.१. जब हम कहीं घूमने के लिए जाते हैं तो वहां कई दर्शनीय स्थल होते हैं जिसमें से कुछ मंदिर भी होते हैं जैसे-अमृतसर का स्वर्ण मंदिर, कोलकाता का काली मंदिर और दिल्ली का कालका मंदिर! उनका हमें दर्शन करना चाहिए या नहीं? अगर करते हैं तो किस भाव से?

प्र.२. महाराज जी, हम दोनों में तालमेल नहीं बैठ पा रहा है, दोनों ही अशांत हैं। आप ही कुछ उपाय बताने की कृपा करें।

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समाधान

उ.१. हमारे यहां एक ही बात कही गई है कि हम उन को पूजें जहां हमारी अहिंसा और वीतरागता की पुष्टि हो, वही हमारे पूज्य हैं, चाहे वह कोई भी स्थान हो। जहां हिंसा और राग का पोषण होता हो, उसका हमें परहेज करना चाहिए। जहां तक जाने और ना जाने का सवाल है आप दुनिया में कहीं भी जाओ, एक visitor बनकर जाने का कोई निषेध नहीं है। लेकिन एक आराधक, पूजक या उपासक बनकर आप वही जाओ जहां अहिंसा और वीतरागता की पुष्टि हो।

उ.२. यह तो पहले सोचना चाहिए था दोनों ही अशांत हैं। सबसे अच्छा है दोनों अपना अपना रास्ता पकड़ लो सारी दुनिया से तालमेल बैठ जाएगा। ध्यान दीजिए तालमेल क्यों नहीं बैठता ?  कहीं ना कहीं किसी का एक दूसरे के साथ ego टकरा रहा है उस ego  गौण करें। दांपत्य जीवन एक दूसरे से उलझने के लिए नहीं, दांपत्य जीवन एक दूसरे के लिए उत्प्रेरक और पूरक बनकर चलने के लिए है। एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें, एक दूसरे की भावनाओं का आदर करें और अपने रिश्तो में आड़े आने वाले अपने अहम को विसर्जित करने की कोशिश करें। रास्ता निकलेगा, ध्यान रखना! टकराव तोड़ता है और समझौता सब को जोड़ता है। इसलिए टकराव नहीं, समझौते का रास्ता अपनाएं और जीवन को सुखमय बनाइए ।

Edited by: Pramanik Samooh

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