क्या वीगन (vegan) विचारधारा जैन दृष्टि से सही है?

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शंका

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर VEGAN शब्द का प्रयोग किया जाता है। इस विचारधारा वाले लोग जानवरों से प्राप्त किसी भी वस्तु का प्रयोग नहीं करते हैं चाहे वह मछली, अंडा, माँस, ऊन यहाँ तक कि दूध का भी प्रयोग नहीं करते। उनकी मान्यता दूध के बारे में यह है कि प्रकृति ने किसी भी mammal species को शैशवावस्था के अलावा बड़े अवस्था में दूध पीने के लिए नहीं बनाया, सिर्फ माँ का दूध मेमल द्वारा पिया जाता है। तो मनुष्य अकेला ऐसा मेमल है जो अपनी माँ के दूध के अलावा पूरी जिंदगी दूध का सेवन करता है, तो यह विचारधारा कहाँ तक सही है?

समाधान

धर्म की दृष्टि से और भारतीय संस्कृति की दृष्टि से विचारधारा पूरी तरह फिट नहीं है। इसलिए नहीं है कि हमारे यहाँ दूध को एक रस के रूप में लिया गया है और यह पाया भी गया है कि यह गाय आदि जो दुधारू प्राणी है उनको यदि पर्याप्त पोषक तत्त्व दिया जाए तो उनके शरीर में अतिरिक्त दूध प्रकट होता है। 

हमारे तीर्थंकरों में प्रथम ऋषभदेव के अलावा बाकी तेईस तीर्थंकरों ने प्रथम आहार दूध के रूप में लिया है। यह भी देखा गया है कि अगर गाय आदि का दूध न निकाला जाए तो उनको तकलीफ होती है। पूरा दूध उनके बछड़े को पिला दिया जाए तो वो बछड़े के लिए नुकसानदायक होता है, तो ये “परस्परोग्रहोजीवानाम” की युक्ति को चरितार्थ करता है। एक हमारे यहाँ परम्परा है कि चार थन में एक थन बछड़े के लिए छोड़ दिया जाए, गाय का ठीक ढंग से पालन-पोषण किया जाए और उसके बाद दूध लिया जाए या उसके और उत्पादों का प्रयोग किया जाए तो धर्म और संस्कृति की दृष्टि से कतई गलत नहीं है।

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