घर में मौत होने पर १२ दिन का नहीं खाने का नियम धर्म सिद्धांत या रुढ़ीवाद

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शंका

घर में मौत होने पर कुछ लोग १२ दिन का नहीं खाने का नियम लेतें हैं। यह धर्म सिद्धांत है या रुढ़ीवाद है?

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समाधान

देखो, मैं तो यही कहता हूँ यदि किसी के घर में किसी की मृत्यु होती है तो मृत्यु भोज से परहेज करने के लिए ऐसा कहते हैं १२ दिन तक उनके यहाँ आपको नहीं खाना चाहिए। ऐसा इसलिए कि क्योंकि एक रुढि हो गयी मृत्यु भोज के नाम पर। बहुत सारा बोझ लगने लगा लोगों पर कि किसी की मृत्यु हो गयी उसी के बाद गड़बड़। लेकिन इसमें एक कुरीति मुझे और समझ में आती है। किसी के यहाँ किसी की मृत्यु होती है और लोग उनके यहाँ बैठने जाते हैं। जिनके यहाँ बैठने जाते हैं उनके घर में उनके लिए एक बड़ा सिर दर्द हो जाता है। क्यों? अपने घर में आने वाले लोगों को खिलाने पिलाने का इंतजाम करना पड़ता है। गाँव के भी लोग आते हैं बाहर के भी आते हैं। हलवाई  बुलाना पड़ता है मेनू सेट करना पड़ता है। कई परिवारों में तो ऐसा भी देखने को मिला है कि कच्ची मौत होने पर भी लोग आए हैं। और माल पूड़ी खा रहे हैं। भैया! तुम शोक संवेदना प्रकट करने गए हो कि माल खाने गए हों। बहुत टेंशन होता है। 

तो मैं तो कहता हूँ जितने लोग आज इस कार्यक्रम को देख रहे हैं, उन सब से यह कहना चाहता हूँ कि संकल्प लो- “किसी की मृत्यु हो तो शोक संवेदना के लिए जाऊँगा। अगर स्थानीय हूँ तो एक गिलास पानी भी नहीं पिऊँगा। और बाहर से आया हूँ तो खाऊँगा क्या, केवल खिचड़ी खा कर काम चला लुँगा। कम से कम कढ़ाई की कोई वस्तु का उपयोग नहीं करूँगा।” तब तो तुम्हारी सहानुभूति है, उस आदमी के ऊपर को वजन नहीं पडना चाहिए। उस आदमी के ऊपर कोई अलग से परेशानी नहीं आनी चाहिए। लेकिन यह ऐसी रूढ़ि लोगों ने बना दी है कि वो भी ऐसा लगता ही नहीं कि यहाँ एकदम मातम है। लगता है यहाँ कोई जश्न हो रहा है। यह क्या है?  यह बिलकुल एक कुपरंपरा है। एक जागरूकता होनी चाहिए। कोई कितना भी बनाये, आप किसी के दुःख में शोक में गए हो, बाहर से गए हो तो खाना तो पड़ेगा ही। खाओ, बोलो की हम कोई कढ़ाई की चीज़ नहीं खाएंगे, और अच्छा हो कि केवल खिचड़ी खा के काम चला लो। कुछ फर्क नहीं पड़ता। बीमार पड़ते हो तो खिचड़ी खा कर रहतो हो कि नहीं रहते हो? तो यह एक प्रवृत्ति होनी चाहिए जो व्यक्ति को स्वविवेक से विकसित करने की आवश्यकता है। ऐसी प्रवृत्ति ना होने के कारण कई लोगों को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

Edited by: Pramanik Samooh

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