सल्लेखना आत्मचिन्तन है, आत्महत्या नहीं!

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शंका

सल्लेखना और संथारा के बारे में मैंने आपसे बहुत कुछ सुना, बहुत कुछ पढ़ा। उससे मुझे यह समझ में आया कि सल्लेखना का समय आत्म चिंतन का समय है, तो न्यायलय ने आत्म चिंतन को आत्महत्या कैसे कह दिया?

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समाधान

आत्म चिंतन के स्वरूप को वही समझ सकता है जो खुद आत्म चिंतन करता है और आत्मा का चिंतन वही कर सकता है जिसे आत्मा का ज्ञान हो। 

यह हमारा देश है और देश क्या संपूर्ण दुनिया में दो प्रकार के विचारधारा से जुड़े हुए लोग हैं- एक, आत्मवादी विचारधारा, आध्यात्मवादी विचारधारा और दूसरी, भोगवादी विचारधारा। विडम्बना यह है कि आज भोगवादी विचारधारा के लोगों का बाहुल्य है जो हमारे धर्म, हमारी संस्कृति को ठीक ढंग से नहीं समझ पाते, अध्यात्म और आध्यात्मिक साधना की महिमा को नहीं जान पाते। उसी के कारण हम सबके बीच ऐसे नतीजे निकल आते हैं। हमारी कोशिश होनी चाहिए इस अभियान के माध्यम से एक आध्यात्मिक अलख जगाने की, जो हर आदमी को आत्म बोध करा सके और जीवन की दिशा सुनिश्चित कर सके।

Edited by: Pramanik Samooh

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