शेर का कांटा

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शेर का कांटा
(मुनि श्री प्रमाणसागर जी के प्रवचनांश)

यूनान में डायजनिस नाम का एक दास था। अपनी गुलामी से तंग आकर के एक दिन वो भाग गया। भागता-भागता वह जंगल में पहुँच गया और एक बड़े पत्थर के पीछे छिप गया। राजा के सैनिक भी उसका पीछा करते हुए जंगल में पहुँच गये। उसने देखा कि झाड़ी के नीचे एक शेर कराह रहा है। उसने शेर को देखा तो पहले तो घबराया, फिर शेर की कराह को सुनकर उसके अंदर करुणा उमड़ आयी। सारा भय त्यागकर वह शेर के सामने पहुँचा। शेर ने मदद की अपेक्षा करते हुए अपना पंजा उसकी ओर कर दिया। उसके पंजे में एक तीखा शूल चुभा हुआ था जिसकी वजह से उसको बहुत पीड़ा हो रही थी। डायजनिस ने शूल को शेर के पंजे से बाहर निकल दिया। शेर ने उसकी तरफ कृतज्ञता भरी नजरों से देखा और चुपचाप चला गया।

कुछ दिन बाद वह डायजनिस पकड़ा गया और उसे राजा ने सजा में भूखे शेर के पास छोड़ देने का आदेश दिया। उसे सजा देने के लिए एक पिंजरे में तीन दिन के भूखे शेर को लाया गया और डायजनिस को पिंजरे में धकेल दिया। पहले तो शेर जोर से दहाड़ा, पर जैसे ही वह पास आया डायजनिस की गंध शेर तक पहुँची। शेर बिल्कुल शांत हो गया। बहुत प्रयत्न किया गया कि किसी तरह से शेर उसका भक्षण कर ले। पर शेर ने उसे सूँघा, उसके चारों तरफ चक्कर काटा और अपने स्थान पर आकर बैठ गया। भूखे रहने के बाद भी शेर ने उसका भक्षण नहीं किया क्‍योंकि शेर को मालूम पड़ गया था कि यह वहीं डायजनिस है जिसने मेरे पैर का काँटा निकाला था।

डायजनिस ने जो करुणा और उपकार बेजुबान शेर के प्रति दिखाया वह उसकी जान बचाने में कारण बना। परस्परोपग्रहो जीवानाम। इस संसार में सभी जीव एक दूसरे के प्रति करुणा का भाव रखे तो सभी का जीवनयापन आनंदमय हो जाएगा। अभी का किया हुआ करुणामय व्यवहार आगे जाकर अच्छे परिणाम में जरूर फलित होता है।

Edited by: Pramanik Samooh

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