समाधि मरण का भाव सारे जीवन रखें या सिर्फ़ अंत में?

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शंका

समाधि साधना पूर्वक होती है, लेकिन कई बार देखा जाता है कि कोई व्यक्ति जीवन भर धर्म करता है लेकिन अंत में उसकी समाधि खराब हो जाती है। उनकी मौत किसी एक्सीडेंट या किसी अन्य तरह से होती है; और कभी कभी देखते हैं कि कोई जीवन भर धर्म नहीं करता लेकिन अंत में उसकी समाधि के निमित्त इतने अच्छे होते हैं कि बहुत ही अच्छी समाधि कर पाता है। तो यह क्या पूर्व का उदय है या आगामी का बंध?

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समाधान

समाधि की उपलब्धि बहुत दुर्लभ है, श्रुत केवलियों के लिए भी अंत समाधि बहुत दुर्लभ कही गई है। इसलिए जीवन के हर पल में समाधि मरण का भाव रखना चाहिए। मैं समाधि पूर्वक देह छोड़ूं ऐसी भावना अपने मन में बना करके रखनी चाहिए। समाधि की भावना कभी ना छोड़ें! कई लोगों के बारे में यह देखने में आया है, जिंदगी भर उल्टे पुल्टे तरीके से जिए अंत में अच्छी समाधि हो गई, यह क्या है? फिर तो हम यह मान लें कि “जो कुछ करना है सो करो, जब अच्छा होना होगा तो हो जाएगा।” 

आचार्य शिवकोटी से किसी ने प्रश्न किया-“अंत में अच्छे भाव होंगे तो हमारा उद्धार हो जाएगा तो जिंदगी भर इतनी साधना करने की क्या जरूरत? अंत में अपने भाव सुधार लेंगे और तर जाएँगे।” उन्होंने बहुत अच्छी फटकार लगाई और उन्होंने कहा – “भैया! किसी शहर के व्यस्ततम चौराहे पर, जयपुर की बड़ी चौपड़ जैसी जगह पर, दिन के १२:०० बजे किसी अंधे को खजाना मिल जाए तो यह देखकर कि अंधे को खजाना मिलता है, अपनी आँखें फोड़ देना अच्छी बात नहीं मानी जाएगी।”

Edited by: Pramanik Samooh

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