कन्यादान का हमारे जीवन में क्या महत्त्व है?

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शंका

कहते हैं कन्यादान चार बिन्दुओं से निर्धारित किया गया है- सांसारिक दृष्टि से, व्यावहारिक दृष्टि से, नैतिक दृष्टि से और धार्मिक दृष्टि से। इस कन्यादान का हमारे जीवन में क्या महत्त्व है?

समाधान

यह कन्यादान को समदत्ती की संज्ञा दी गई है। वंश की सन्तति कन्या के बिना नहीं हो सकती। आध्यात्मिक दृष्टि से इनका कोई अलग महत्त्व नहीं है लेकिन जिन दृष्टियों से आपने अभी कहा धार्मिक, व्यावहारिक, नैतिक और सांसारिक दृष्टि से इनका बड़ा महत्त्व है। जैन धर्म में कन्यादान को एक श्रेष्ठदान कहा है और इसलिए कि इसके बिना धर्म की सम्पत्ति नहीं होती। बहुत ध्यान से सुनना, एक ऐसे विषय को मैं आप सब तक पहुँचा रहा हूँ जिसे शायद आपने कभी देखा नहीं होगा। कन्यादान विवाह पूर्वक होता है। आप जितने लोग बैठे हैं यहाँ, जितने बड़े लोग हैं सब कन्यादान स्वीकार कर चुके हैं। हम अपवाद हैं, लेकिन यह कन्यादान विवाह पूर्वक और यह विवाह की जो गरिमा और महिमा है, कन्यादान की महिमा उससे अपने आप प्रकट हो जाती है। सबसे पहले विवाह के उद्देश्य और औचित्य पर विचार कीजिए। आप लोगों ने विवाह किया, विवाह का उद्देश्य क्या है? विवाह किस लिए करते हो? जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए धार्मिक, सामाजिक कार्य करने के लिए विवाह करते हैं। अनुभव से बताना विवाह के बाद जीवन सुचारु होता है या बीमारू होता है? अनुभव उल्टा है।

विवाह के तीन उद्देश्य बताए गए हैं: सबसे पहला धर्म  सम्पत्ति- विवाह करने से धर्म की प्राप्ति होती है। लोक में ऐसी अवधारणा है कि विवाह करने के बाद धर्म खत्म हो जाता है लेकिन विवाह के प्रथम उद्देश्य में धर्म सम्पत्ति क्यों? क्योंकि विवाह करने के बाद व्यक्ति अपने पत्नी और पति से बन्ध करके शील धर्म का पालन शुरू कर देता है। स्वदार सन्तोष व्रत का पालन शुरू कर देता है यहाँ से धर्म की प्राप्ति होती है। एक गृहस्थ के लिए तीन पुरुषार्थ बताए हैं- धर्म, अर्थ और काम। इन तीनों पुरुषार्थ की सिद्धि कोई गृहस्थ तभी कर सकता है जब वह विवाह के बन्धन में बन्धता हो। कहीं सौधर्म इन्द्र बनना हो तो कोई कुँवारे या विधुर आदमी को सौधर्म इन्द्र नहीं बनाया जाता है। किसको बनाया जाता है, क्यों बनाया जाता है? विवाहित जोड़ों को बनाया जाता है। धर्म सम्पत्ति इसलिए हमारी संस्कृति में विवाह को धर्म विवाह की संज्ञा दी गई। और विवाह के बाद विवाहित स्त्री को धर्म पत्नी या सहधर्मणी कहा गया। इसी से समझ लीजिए कि विवाह का उद्देश्य क्या है? इसलिए जितने लोग यहाँ विवाहित हैं अब विवाहित सम्बन्ध में बन्ध जाने के बाद अपने धार्मिक कार्यों की गति के लिए और प्रयत्नशील हो जायें तभी आपका विवाह सार्थक होगा।

नंबर दो-प्रजा उत्पत्ति- सन्तान की उत्पत्ति बिना विवाह के नहीं होगी और सन्तान की उत्पत्ति नहीं होगी तो सन्तति कैसे चलेगी? और सन्तति नहीं होगी तो समाज आगे नहीं बढ़ेगा और वंश परम्परा आगे नहीं बढ़ेगी तो धर्म की परिपाटी भी नष्ट हो जाएगी क्योंकि “ना धर्मो धार्मिकेर्बिना” धर्म धर्मात्मा के बिना नहीं होता। इसलिए सब साधु बन जाएँगे जिस दिन, उस दिन धर्म समाप्त हो जाएगा। इसलिए धर्म को चलाने में जितना साधुओं का रोल है श्रावकों का रोल उससे कम नहीं है। ये एक रथ के दो पहिए हैं। साधु धर्म का प्रवर्तन करते हैं और श्रावक धर्म को पोषण देते हैं, धर्मात्माओं को पोषण देते हैं, बिना पोषण के प्रवर्तन नहीं हो सकता। यह श्रावक धर्म की महिमा है, गरिमा है इसे समझना चाहिए तो प्रजा उत्पत्ति यह दूसरा उद्देश्य है।

तीसरा उद्देश्य है रति, जिसे सबसे आखरी में रखा गया, जो मनुष्य अपने मानवीय दुर्बलता को कम करने के लिए करता है। अपनी मानसिक कमजोरी के कारण करता है, यह तीसरा उद्देश्य है। इसलिए कहते हैं विवाह का उद्देश्य वासना का निमंत्रण नहीं, नियंत्रण है।

आगे बढ़ें तो कन्यादान सामाजिक मर्यादाओं को स्थिर बनाए रखने के लिए, धर्म की परम्परा को प्रवर्तित बनाए रखने के लिए, और आपके सन्तति का विकास करने के लिए बहुत जरूरी है। इसके बिना आपका सांसारिक जीवन नहीं चल सकता, इसका अपना उपयोग है पर कन्यादान में जो विकृति आ गई उससे भी सावधान होने की आवश्यकता है।

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