मम्मी-पापा बच्चों पर मन्दिर जाने के लिए दबाव क्यों डालते हैं?

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शंका

जब हम मन्दिर नहीं जाते, तो मम्मी पापा कहते हैं कि ‘अमुक के बच्चे मन्दिर जाते हैं उनको देखो, उनकी सब तारीफ़ करते हैं, उनका मान सम्मान बढ़ता है।’ तो क्या मम्मी पापा का ये कहना सही है कि उनका मान सम्मान बढ़ेगा, इसलिए हम मन्दिर जाएँ? क्या इस मान से उनके पाप का बन्ध नहीं बढ़ेगा?

समाधान

निश्चित रूप से मम्मी पापा की ये एक भूल है, बच्चों के लिए। इस बात के लिए मन्दिर जाने को प्रेरित करना मेरी दृष्टि में ठीक नहीं है। माँ-बाप को चाहिए कि बच्चों को प्रारम्भ से ऐसी बातें सिखायें और समझाएँ कि- ‘बेटा, मन्दिर तुम्हारे जीवन का एक अंग है। मन्दिर जाये बिना तुम अपने जीवन को पवित्र नहीं बना सकते हो। अपने मन को रिचार्ज करने के लिए भगवान का दर्शन करना चाहिए। मन्दिर जाने से मन प्रसन्न होता है। जीवन की वास्तविकता का बोध होता है। हमारे संस्कार अच्छे होते हैं। हमारे भाव निर्मल होते हैं।’ जब बच्चों को प्रारम्भ से ये बातें सिखा दी जायें, तो बड़े होने के बाद बच्चों को मन्दिर जाने के लिए कहने की आवश्यकता नहीं होती है। जैसे बच्चों को स्कूल का महत्त्व (इम्पोर्टेन्स) आप बताते हैं। 

आज मैंने देखा कि बच्चों को स्कूल का महत्त्व (इम्पोर्टेन्स) पता है, तो बच्चे स्कूल को न कहना पसन्द नहीं करते हैं। कभी भी अनुपस्थित रहने की बात हो की एक दिन स्कूल न जायें, तो बच्चे कहते हैं कि नहीं मम्मी हमारा कोर्स पिछड़ जायेगा। जैसे उन्होंने स्कूल का महत्त्व (इम्पोर्टेन्स) जान लिया है, उसी तरह मन्दिर का क्या महत्त्व है, उन्हें ये बताना चाहिए और धर्म की महिमा का बोध कराना चाहिए, धर्म थोपना नहीं चाहिए। गलती कहाँ होती है? लोग बच्चों को धर्म की महिमा बताने की जगह धर्म थोपते है। एक उम्र तक तो बच्चे उसे स्वीकार कर लेते हैं पर जब बड़े हो जाते हैं, तो उनका मन बगावती बन जाता है। फिर जो तर्क बच्चों के सामने उपस्थित किये जाते हैं, उससे बच्चों को समाधान नहीं मिलता है, वो भटक जाते हैं। तो उनको ठीक तरीके से समझाने की जरूरत है कि मन्दिर का हमारे जीवन में क्या स्थान है? मन्दिर का हमारे जीवन में क्या महत्त्व है? मन्दिर हमें क्यों जाना चाहिए? जब ये बातें बहुत अच्छे तरीके से समझा दी जाएँ तो सारा काम बहुत अच्छे तरीके से सम्पन्न हो सकता है। 

अब सवाल, माँ-बाप तुमसे ये कहते हैं कि ‘मान सम्मान बढ़ता है, तो तुम मन्दिर जाओ।’ बच्चों को तो ये जानना चाहिए कि माँ-बाप बोल रहे हैं तो हमें किसी न किसी के लिए मन्दिर जाना चाहिए। हम माँ-बाप की खुशी के लिए भी तो मन्दिर जा सकते हैं। उनकी बात को कभी ठुकराना नहीं चाहिए। भले माँ-बाप बहुत अच्छे तरीके से ये बात नहीं बता पा रहे हैं, फिर भी माँ-बाप हैं। ये सोचना चाहिए कि हर माँ-बाप जो भी हमें बताते हैं, हमारे भले के लिए बताते हैं। भले वो हमें अच्छा न लगे लेकिन उसमें भी हमारा हित है। इसलिए मैं हर बच्चों से ये कहना चाहता हूँ कि अपने माँ-बाप की किसी भी बात को काटना नहीं चाहिए। एक बार एक बच्चे ने मुझसे कहा कि ‘महाराज जी, मेरे माँ-बाप मुझे हर बात में रोकते हैं, हमें अच्छा नहीं लगता है।’ हमने कहा कि ये बताओ वो तुम्हें गलत बातों के लिए रोकते हैं या अच्छी बातों के लिए रोकते हैं? ‘नहीं, उनको मेरी जो भी बात गलत लगती है, तो रोक देते हैं। हमको अच्छा नहीं लगता मैं क्या करूँ?’ हमने कहा कि गाड़ी चलाते हैं और रास्ते में रेड लाइट आ जाती है, तो क्या करते हैं? गाड़ी को रोकना पड़ता है या नहीं? रोकना पड़ता है। वो बोला ‘रोकना पड़ता है। बहुत जरूरी काम है फिर भी गाड़ी को रोकते हो न? माता-पिता की रोक-टोक भी रेड लाइट की तरह है।

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