अनंत बल वाली आत्मा शरीर के दर्द से दुर्बल क्यों होती है?

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शंका

यदि आत्मा अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत बल, और अनंत सुख वाली है, तब जब पुद्गल को वेदना होती है तो आत्मा क्यों विबल होती है?

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समाधान

ऐसा इसलिये क्योंकि आत्मा कर्म के साथ Attach (जुड़ी) है। जब तक Attachment (जुड़ाव) है, तब तक पीड़ा है।

एक बात बताता हूँ! गुरुदेव ने एक बार एक बात कही कि “एक लोहार जब अपनी लौहशाला में गया तो अग्नि की धौंकनी को सुलगाने से पहले उसने अग्नि को नमन किया। उसके बाद जब लोहे को उस अग्नि में तपाया और घन का उस पर प्रहार करना शुरू कर दिया तो अग्नि बौखला गई और लोहार से पूछने लगी कि, ‘यह मैं क्या देख रही हूँ? अभी थोड़ी देर पहले तो तुमने मुझे नमन किया, अब मेरी पिटाई कर रहे हो।’ तो उस लोहार ने कहा कि, ‘जब तक तुम अकेली थीं, तब तक तुम शुद्ध थीं; मैंने तुम्हें नमन किया। जब तक तुम इस लोहे की संगति में हो तब तक तुम पर प्रहार होता रहेगा।’

आत्मा जब शुद्ध है तब तक उस पर कोई प्रहार नहीं हो सकता और जब तक इस शरीर रूपी लोहे की संगति है तब तक कर्म के प्रहार पड़ते रहेंगे।

Edited by: Pramanik Samooh

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