भारत में ही सबसे ज़्यादा पूजा-पाठ, धर्म, ध्यान आदि होता है फिर भी भारत एक सफल और सम्पूर्ण देश नहीं बन पाया। वहीं विदेशों में धर्म, पूजा-पाठ का इतना प्रचलन नहीं है फिर भी वहाँ अत्यधिक विकास और तरक्की हो रही है। वहाँ के लोग भारत के लोग से अधिक सम्पूर्ण हैं तो क्या इसका मतलब ये हुआ कि धर्म, पूजा-पाठ आदि का कोई विशेष महत्त्व नहीं है?
भारत में धार्मिक क्रियाओं पूजा-पाठ के प्रति जितना ज़ोर है अन्य देशों में वैसा नहीं है, लेकिन संपन्नता, उन्नति और टेक्नोलॉजी आदि के क्षेत्र में अगर देखा जाएँ तो भारत से दूर देशों के लोगों में वो ज़्यादा दिखती है। प्रश्नकार का आशय ये है कि क्या हमारे पूजा-पाठ आदि धार्मिक क्रियाओं का कोई विशेष महत्त्व नहीं है। बात समझने की है और थोड़े अच्छे से समझने की है। धार्मिक पूजा-पाठ अपनी सम्पन्नता के लिए नहीं की जाती है। धार्मिक पूजा पाठ की जितनी भी क्रियाएँ हैं स्वयं को समर्थ बनाने के लिए किया जाता है। सम्पन्न होना और समर्थ होना इन दोनों में बहुत अन्तर है। हम मानते हैं कि दुनिया के दूसरे लोग सम्पन्न है पर उनके भीतर जाकर के देखें कि वो अपने जीवन में आगत समस्याओं से जूझने में कितने समर्थ हैं। आज आत्महत्याएँ कहाँ होती है? अधिकतर विकसित और विकासशील देशों में ज़्यादा आत्महत्यायें होती हैं। डिप्रेशन के मरीज कहाँ होते हैं? ऐसे ही देशों में होते हैं। भारत में भी ये जितने भी आत्महत्या और डिप्रेशन जैसे कृत्य हो रहे हैं, आज अपेक्षाकृत सम्पन्न लोगों में ज़्यादा हो रहे हैं। गरीब और छोटे लोगों में ये कम होते हैं। इन सब चीजों के मूल को हम अगर समझ करके चलेंगे तो हमारे सामने यह प्रश्न कभी नहीं आएगा। धर्म हमें भीतर से स्ट्रांग (मजबूत) बनाता है, जीवन में आने वाली सब प्रकार की प्रतिकूलताओं को सहने में समर्थ बनाता है, हमारी सोच को सकारात्मक बनाता है। इसके बल से संपन्नता मिले या न मिले प्रसन्नता जरूर मिल जाती है। सम्पन्नता पाने के लिए मनुष्य को अनेक प्रकार के कर्म करने पड़ते हैं, जिनमें से कुछ कर्म तो ऐसे हैं जो धर्म विरुद्ध भी हैं तो धर्म हमें नीति न्याय के रास्ते पर चल कर के आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। धर्म की अपनी मर्यादा है और सीमा है, उसके अनुरूप जब हम जीवन जीते हैं तो अपने जीवन को आगे बढ़ाते हैं। रहा सवाल धर्म के साथ संपन्नता और विपन्नता का तो कई बार इस प्रश्न को लोग दूसरे तरीके से भी रखते हैं कि भारत में कितने देवी देवताओं की पूजा होती है दुनिया में लोग देवी देवताओं की पूजा नहीं करते फिर भी उन मुल्कों में अधिक संपन्नता क्यों? फिर हम देवी देवताओं की पूजा क्यों करें? आपके प्रश्न से मिलता-जुलता प्रश्न है, इसलिए मैं इन दोनों को एक दूसरे के साथ जोड़कर कहना चाहूँगा कि हमारे पूजा-पाठ का उद्देश्य संपन्नता नहीं है। पहली बात मन की प्रसन्नता है जो हम पा रहे हैं। भारत के लोग सीमित संसाधनों में जितने प्रसन्न-सन्तुष्ट हो करके रहते हैं उतने दूसरे जगह के लोग नहीं। ये एक बहुत बड़ा अनुभूत सत्य है इसे कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। रहा सवाल संपन्नता का तो संपन्नता में केवल पुण्य-पाप, संपन्नता-विपन्नता का कारण नहीं है इसके पीछे एक कारण है माहौल, एक जमाने में भारत बहुत सम्पन्न था। भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था क्योंकि उस समय भारत में ऐसा माहौल था। पूरे भारत के लोगों में एक सामूहिक चिन्तन चलता था, हर कोई मेहनती था, हर व्यक्ति कला और गुणों से सम्पन्न थे और उन सब चीजों का उसी तरीके से विनिमय और व्यापार होता था, भारत सम्पन्न था। हमारे यहाँ विदेशी आक्रांताओं ने हमारी संस्कृति को नष्ट किया, हमें गुलामी झेलनी पड़ी। अंग्रेजो ने हमारे यहाँ के कौशल को भी नष्ट किया, स्किल को नष्ट किया और पूरा माहौल ख़राब कर दिया। जब माहौल खराब हो गया तो हम पिछड़ गए और आज हम उतने सम्पन्न नहीं हैं। उदाहरण के लिए मैं आपसे कहता हूँ, एक आदमी ने अपना एक प्रतिष्ठान आउट एरिया में खोला और उसी आदमी का दूसरा शोरूम मेन मार्केट में है, कौन सा ज़्यादा चलेगा? मेन मार्केट वाला या आउट एरिया वाला? पुण्य तो दोनों जगह उसका एक सामान है पर मेन मार्केट की दुकान ज़्यादा चल रही है और आउट साइड की दुकान कम चल रही है क्योंकि यहाँ माहौल है वहाँ नहीं है। इसलिए आप दुकान खोलना चाहते हैं तो क्या चाहते हैं, अच्छे मौके की जगह पर हो और माहौल मिले, आज अमेरिका, जापान या अन्य देशों में जो अधिक सम्पन्न देश है वहाँ इतनी तेजी से अर्निंग कर लेता है उसकी वजह ये है कि वहाँ वो माहौल है, वैसा वातावरण है, तो उस वातावरण का उनको लाभ मिलता है। इसमें केवल पुण्य-पाप को मत जोड़िए, न हीं ये सोचना कि वे हमसे ज़्यादा पुण्यशाली हैं क्योंकि उनके पास पैसा ज़्यादा है। पैसा तो एक वैश्या के पास भी होता है उसको पुण्यशाली मानने का भ्रम मत कर लेना। ये क्या है वहाँ एक माहौल है हमारे यहाँ माहौल बिगड़ा था अब तेजी से माहौल बन रहा है, भारत के अच्छे दिन आ रहे हैं, ऐसा कह रहे हैं। हम अनुभव करें, आशावादी बने तो अच्छे दिन आएँगे, माहौल बनेगा, हम फिर अच्छे हो जाएँगे, हमारे साथ अभी प्रसन्नता है, संपन्नता अपेक्षाकृत कम है लेकिन वो दिन जल्दी आएगा जब हम अपने भारत के पुराने गौरव को पुनः प्रतिष्ठापित करेंगे और संपन्नता के साथ जो हमारा मूल साध्य प्रसन्नता है उसे भी प्राप्त करेंगे।
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