बॉडी लैंग्वेज का व्यक्तित्व पर प्रभाव

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बॉडी लैंग्वेज vs भाषा

भाषा की अपनी भूमिका है लेकिन भाषा भी अपना अर्थ बदल देती है यदि बॉडी लैंग्वेज ठीक नहीं हो। जो हम मुँह से बोलते हैं, वह मुँह की भाषा होती है, पर जो हम शरीर से बोलते हैं वह हमारे हृदय की भाषा होती है। जब तक हमारी बॉडी लैंग्वेज किसी से नहीं जुड़ती तब तक उसका प्रभाव नहीं होता। कहा भी जाता है कि “Body Language speaks louder than words.”

बॉडी लैंग्वेज की उपयोगिता

शब्दों के साथ बॉडी लैंग्वेज बहुत महत्वपूर्ण होती है। मान लीजिये यदि किसी पुतले को कुछ बोलने को दिया जाए और वह बिना किसी हाव-भाव के बोले तथा उसके चेहरे पर कोई भावाभिव्यक्ति नहीं हो तो सामने वाले पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ेगा फिर चाहे उसके शब्दों में गहन अर्थ ही क्यूँ न छिपा हो। इसके विपरीत जब हम किसी व्यक्ति से बात करते हैं, तो भाषा के साथ उसमें आरोह-अवरोह होता है | उसकी भाव-भंगिमा शब्दों के साथ जुड़ती है एवं उसके हाव-भाव भी ताल-मेल बनाते हैं, तो इस अवस्था में सामने वाले पर ज़्यादा प्रभाव पड़ता है। बिना बॉडी लैंग्वेज के भाषा सिर्फ वचन है। यदि भाषा के साथ बॉडी लैंग्वेज को जोड़ दिया जाए तो वह कथोपकथन बन जाता है और आपस में संवाद का काम करती है तथा इसका असर बहुत ही प्रभावी होता है।

बॉडी लैंग्वेज और व्यक्तित्व

बॉडी लैंग्वेज हमारे व्यक्तित्व का दर्पण होती है। हमारी प्रत्येक भाव-भंगिमा के भिन्न-भिन्न अर्थ होते हैं। हम जाने-अनजाने, शरीर के माध्यम से अनेक प्रकार के संकेत भेजते और समझते हैं। यदि किसी व्यक्ति की शारीरिक भाषा उसकी भाषा से मेल नहीं खा रही तो समझ जाना चाहिए कि दाल में कुछ काला है। किसी की भाषा के अनुसार उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए, अपितु हमें उसकी बॉडी लैंग्वेज भी समझनी चाहिए। क्योंकि कई लोग लच्छेदार भाषा में बताशे में ज़हर मिला के दे देते हैं। मतलब, मीठा तो होता है पर जानलेवा है |

Edited by Vidhu Jain, Noida