उत्तम तप

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उत्तम तप 

पानी मिट्टी को गला देता हैं, बहा देता हैं लेकिन वही मिट्टी जब मंगल कलश के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं, आंच में पककर के घड़े का रूप ले लेती हैं तो उसी पानी को अपने में समाने में समर्थ हो जाती हैं। जो पानी कल तक बहा-गला कर ले गया, उसी पानी को उसने अपने में समा लिया। तपस्या मनुष्य की ऐसी शक्ति हैं, जिसके बल पर वह साधारण से असाधारण बन जाता हैं। जो बुराइयां हमें उद्वेलित करती हैं, मनुष्य उन बुराइयों को भस्म करने में समर्थ हो जाता हैं। अपने अंतःकरण की बुराइयों और विकृतियों को खपाने का नाम ही सच्चा ‘तप’ हैं।

जब भी हम तपस्या की बात करते हैं, तपस्वी की चर्चा करते हैं। हमारी आंखों के सामने एक ऐसे व्यक्ति की छवि झूलने लगती हैं, जो खूब उपवास करता हो, व्रत करता हो, कठोर शारीरिक तप करता हो, निराहार रहे, नीरस भोजन करें, उपवास करे, एक ही आसन पर खड़ा रहे, एकदम कृशकाय दिखे। निश्चयतः तपस्वी के जीवन में यह सब होता हैं पर तपस्वी का असली स्वरूप यह नहीं हैं। यह तो तन का तप हैं, असली तपस्वी वह नहीं जो केवल बाहर से तन को सुखाएं। सच्चा तपस्वी वह हैं, जिसका मन निर्मल हो जाए। जो अपने अंदर की मलिनता को धो ले, जो अपने भीतर की विकृतियों को दूर कर ले, तप की आंच में तप कर अपने भीतर की विशुद्धि को उद्घाटित करना ही सच्ची तपस्या हैं। जैसे सोने के ore को हम तपाते हैं, सोने के अयस्क को हम तपाते हैं तो ज्यों-ज्यों सोना तपता हैं, उसके अंदर की कालिमा गल-गल करके अलग हो जाती हैं और जब सारी कालिमा गल-गल कर पृथक हो जाती हैं तब शुद्ध सोना निखर उठता हैं। वैसे ही मनुष्य ज्यों-ज्यों तप करता हैं, उसके तप की आंच में उसके भीतर के कर्म-कलुष गल-गल करके निकल जाते हैं और जैसे ही कर्म-कलुष  पूरी तरह निकलते हैं, आत्मा कुंदन की तरह चमक उठता हैं।

आत्मा को कुंदन बनाने का तरीका हैं- तप। वो तपस्या हमारे विकृतियों के शोधन की एक प्रक्रिया हैं, जिसके बल पर हम अपने भीतर की सारी विकृतियों को, बुराइयों को दूर कर सके, साफ कर सके, धो सके, वह तप हैं। अभी तो  तपस्या के दिन चल रहे हैं, सब तपस्या कर रहे हैं। अपनी-अपनी शक्ति के अनुरूप सब तपस्या कर रहे हैं लेकिन भैया इस बात को कभी सोचते हो कि यह मैं किसके लिए कर रहा हूँ। तपस्या करना और तपस्या को घटित करना, इनमे बहुत अंतर हैं। तपस्या करना बहुत सहज हैं, हालांकि वह भी सबके लिए सहज नहीं फिर भी हम तपस्या, किसी से प्रेरणा पाकर, अपनी इच्छाशक्ति को थोड़ा जगा कर, बाहर की तपस्या को कर सकते हैं लेकिन तपस्या को घटित करना बहुत कठिन हैं। तपस्या हम घटित कैसे करें, तपस्या को घटित करने का मतलब हैं, अपने अंदर की बुराइयों को दूर करना, अपने भीतर की विकृतियों का शोधन करना, अपने अंतर्मन को निर्मल करना, अपनी आत्मा को उज्जवल करना, वह तपस्या हैं। अपने भीतर झांकिये, निहारिये, देखिए, मैं कहाँ हूँ? आज चार बाते आपसे करूंगा।

  • तपस्वी
  • मनस्वी
  • तेजस्वी और
  • यशस्वी

सबसे पहली बात तपस्वी की। आप तपस्वी हो, बोलो, महाराज! अभी तो थोड़ी बहुत तो कर रहे हैं, महाराज कुछ तो नंबर दो, आप तो एकदम जीरो कर देते हो। नहीं, मैं तो आपको सेंट परसेंट नंबर देना चाहता हूँ, जीरो नहीं, मैं तो चाहता हूँ, आप सब हीरो बनो पर मुश्किल ये हैं कि आप जीरो बनने के इतने आदी, अभ्यासी हो गए कि जीरो बनना ही नहीं चाहते तो मैं क्या करूं। तपस्या करने वाला तपस्वी हैं और कौन सी तपस्या, बाहरी या भीतरी।

मनुष्य का बाहरी तपस्या के प्रति जितना अधिक रुझान दिखता हैं, भीतरी तपस्या के प्रति वैसा रुझान प्रायः कम दिखता हैं। बाहरी तपस्या हम खूब करते हैं, सब लोग, महाराज! 10 उपवास कर रहे हैं, कुछ 16 उपवास कर रहे हैं, कुछ 32 उपवास कर रहे हैं। निश्चयतया, यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं हैं, कुछ लोग कहते हैं बाहर का तप करने से क्या? महाराज भी कहते हैं, बाहर की तपस्या तपस्या नहीं, करके बता दो तुम घंटे भर प्यासे नहीं रह सकते, पूरे दिन उपवास करना कोई छोटी मोटी बात नहीं हैं, यह बड़ा पुरुषार्थ हैं, प्रशंसनीय हैं, पर्याप्त नहीं हैं, बाहरी तप प्रशंसनीय हैं, पर्याप्त नहीं। कोई दूसरा बाहरी तप करता दिखे तो तुम उसकी प्रशंसा करो, तुम उसकी पूजा करो, तुम उसका सत्कार करो, तुम उसका अभिनंदन करो क्योंकि वह तपस्वी हैं, सामान्य व्यक्ति के लिए असाधारण काम वह कर रहा हैं। कितनी बड़ी तपस्या, हे भगवन! आप जैसी शक्ति सबको मिले। तप की और तपस्वी की प्रशंसा करो लेकिन खुद जब कोई तप करो तो उसे पर्याप्त मत समझो। मैं तपस्या तो कर रहा हूँ, उपवास तो कर रहा हूँ लेकिन मेरे भीतर उपवास घट रहा हैं कि नहीं। मैं व्रत तो कर रहा हूँ, मेरे भीतर व्रत घट रहा हैं कि नहीं। मेरा तप केवल ऊपर का तप हैं या भीतर भी तप हैं। यह मुझे देखना हैं, अपने अंतर्मन में झांक-झांक कर बार-बार देखना हैं और मैं ऐसा देखूंगा, तभी अपना कुछ सुधार कर पाऊंगा। जितने सब यहां तपस्वी हैं, आप एक टाइम का भोजन ले रहे हो, एकासन कर रहे हो, यह भी तपस्या हैं। एक टाइम का उपवास तो आपका हो रहा हैं, अभी तो जितने हैं 12 घंटे का उपवास सबका हो रहा हैं। रात्रि में चतुर्विध आहार का त्याग हैं और दिन में भी दो ही बार हैं – शाम को पानी और सुबह भोजन तो ये तपस्या तुम्हारी चल रही हैं पर अपने मन से पूछो, बाहर की तपस्या हैं या भीतर की तपस्या हैं, जिसके लिए यह सब मैं कर रहा हूँ, वह मेरे भीतर घट रहा हैं या नहीं। एक बार उसे मुझे घटित करना हैं और दूसरों की तपस्या को देखकर स्वयं तपस्या करने के लिए उत्साहित होना हैं। मैं तप के लिए उत्साहित होऊं, जितना बन सके मैं तप करूं और कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकता। आप तपस्वी बनना चाहते हैं? महाराज! अभी तो बने हैं, 12 महीना आपको हम तपस्वी बनाना चाहते हैं। बोलो, बनना चाहोगे? सब तपस्वी बनना चाहते हैं। चलिए, बहुत सरल तपस्या बता रहा हूँ, कुछ मत करो, दिन भर खाओ बस रात में चारों प्रकार के आहार का त्याग कर दो। दिन भर तुम्हें जो खाना हैं खाओ, कम से कम रात में चारों प्रकार के आहार का त्याग कर दो तो रात में चारों प्रकार के आहार का त्याग इंक्लूडिंग पानी तो क्या होगा। महीने में 15 दिन के उपवास का फल होगा, साल में 6 महीने का उपवास हो जाएगा। कौन-कौन तपस्वी बनना चाहता हैं जो रात्रि में चारों प्रकार के आहार का त्याग करेगा। बहुत प्रसन्नता हैं मुझे, बहुत सारे हाथ उठ रहे हैं, लग रहा हैं शिविर की सार्थकता।

देखिये, छोटी-छोटी बातें हैं और छोटी-छोटी बातों को भी यदि हमने थोड़ी गंभीरता से समझना शुरू किया तो हमारे जीवन में आमूलचूल परिवर्तन करता हैं। रात्रि भोजन का त्याग किया आपने, साल में छह महीने के उपवास का तप हुआ आपको और अनेक प्रकार के पाप से बच गए क्योंकि रात्रि भोजन में हिंसा हैं कि नहीं हैं तो वो छूटा तो उससे बचे कि नहीं। रात्रि भोजन अत्याधिक आसक्ति का कारण हैं कि नहीं, वह छूटा तो उससे बचे की नहीं तो कितना पाप बच गया। बोलो, तो भूखे रहकर तपस्या करो अति उत्तम, खा-पीकर तो तप लो। यह रात्रि भोजन का त्याग, आज बहुत लोगों ने किया। देखिये, तन से तपस्वी बनो, वचनों से तपस्वी बनो और मन से तपस्वी बनो। बहन जी, पूछ रही हैं, टाइम क्या, हमको तो नंबर पूरे चाहिए, सूर्यास्त के पहले पानी पिए और सुबह सूर्योदय के बाद पानी पिएंगे, कुल्ला करके मंदिर जाएं और कुछ नहीं करो। शाम को भोजन करने के बाद कुल्ला कर लो तो मुख शुद्धि हो गई। अब मुख अशुद्ध ही नहीं हुआ तो मुख शुद्धि का विकल्प ही नहीं। सुबह उजाला होगा, पौ फटेगी  तभी मुख शुद्धि करेंगे, मंदिर जाना हैं तो जा सकते हो। कई लोग सुबह 5:00 बजे से मंजन कर लेते हैं तो हैं तो अंधेरा ही वो, नंबर लो तो पूरे लो। हारी-बीमारी महाराज को लग जाए तो महाराज क्या करेंगे? पहले ही दिन अभी नियम लिया नहीं और कहो बीमारी की छूट।

एक आदमी ने अपना मकान का नक्शा बनवाया तो इंजीनियर के पास जब नक्शा देख रहा था। पूरा नक्शा देखने के बाद उसने इंजीनियर से पूछा- यह बात बताओ भैया, यह मकान कहाँ-कहाँ से चुयेगा। वो बोला, भैया अभी मकान बना नहीं, अभी नक्शा ही बना हैं और तुम पूछ रहे हो, कहाँ-कहाँ से चुयेगा? वो बोला, हमने सुना हैं, आजकल मकान बनते हैं तो पहले से ही चूने लगते हैं तो पहले से बता दो कहां-कहां से चुयेगा। नियम लिया नहीं और टूट जाए तो क्या? अरे पहले लेओ तो अभी से तोड़ने की छूट। जब जीवन-मरण का सवाल आएगा तब देखा जायेगा, ज्यादा से ज्यादा क्या होगा एक ही बार तो मरोगे और 60 पार कर जाने के बाद जिंदगी की इतनी लिप्सा, ठीक हैं मरेंगे एक ही बार मरेंगे और अच्छे से मरेंगे। अब कुछ नहीं होना जो हो, कोई आपात स्थिति होती हैं तो उसका पहले से तय नहीं करो, उस स्थिति को देखते हुए प्रसंग और परिस्थिति के अनुरूप निर्णय होता हैं और हर कार्य का प्रायश्चित होता हैं बाद में तो यह एक आपकी तपस्या हो गई।

इच्छा के निरोध को तप कहते हैं, हमारी इच्छा खत्म हो गई, रात में हमने पानी भी छोड़ दिया अब रात्रि भोजन की इच्छा समाप्त। आप निराकुल हो गए कि नहीं हो गए। आप की आसक्ति घटी कि नहीं घटी। आप पाप से भी बच गए, यह एक तपस्या हो गई। फिर आप दूसरे-तीसरे-चौथे चरण में दिन में अपने आप को जितना कस सको, कसो लेकिन सदैव एक बात को ध्यान में रखना-

उसी व्रत का आचरण करना चाहिए, जिससे शरीर और मन डोलायमान ना हो। खींचना मत और शक्ति को छुपाना भी मत। ‘शक्तितस त्याग’।  शक्ति के अनुरूप त्याग करो और शक्ति के अनुरूप तपस्या करो। हां, कई लोग बोलते हैं की हममें शक्ति नहीं। शक्ति हैं, पर अभी तुम्हारे मोह से ढकी हुई हैं। मन बन जाए तो सब शक्ति जग जाए। यहां बैठे हो, शक्ति का पता तो उनसे लगाओ जो एक दिन पहले तक 24 घंटे खाते-पीते थे और अभी 24 घंटे निराहार हैं। कहां से आ गई शक्ति? 10 उपवास के लिए कहां से आ गई शक्ति? मन जगने से शक्ति जगती हैं तो तपस्वी बनिये, जीवन में तपस्यता को धारण कीजिए और यदि कदाचित आप तपस्वी नहीं बन सको, किसी का शरीर अत्यंत शिथिल हैं, बीमारियां घिरी हुई हैं, कुछ नहीं कर सकते हैं तो क्या करें? मनस्वी बनिए।

मनस्वी का मतलब क्या हैं? ऊंची सोच वाले बनिए, ऊंचे विचार वाले बनिए, बड़े मन वाला बनिए। सच्चे अर्थों में तपस्वी भी वही होता हैं जो मनस्वी होता हैं, जिसका मन कमजोर होता हैं, वह कोई तपस्या नहीं कर सकेगा उसको तपस्या के नाम पर हाथ-पांव ढीले हो जाते हैं लेकिन जो मन का धनी होता हैं, ठान लेता हैं मुझे करना हैं तो करना हैं। मनस्वी ही तपस्वी बनते हैं, हर किसी के बस की बात थोड़ी हैं और तापसी का रूप धरना, तपस्या के मार्ग को अंगीकार करना, संन्यास के पद पर चलना तो और दुर्लभ हैं। हर कोई नहीं कर पाते, अरे क्या रखा हैं, कुछ लोग बोल देते हैं, तपस्या करने में क्या हैं, यह तो ऊपर-ऊपर का तप हैं। मुनि बनने में क्या रखा हैं? तो भैया बन के बता दो, क्या रखा हैं तो। इतना सरल होता तो अभी तो नैया पार लग गई होती, बहुत ऊंचा मनोबल चाहिए, दृढ इच्छाशक्ति चाहिए, तब कोई तपस्वी बनता हैं। नहीं तो लोग सोचते रहते हैं, सोचते रहते हैं, हाँ करेंगे, करेंगे, करेंगे। तपस्या और सन्यास के मार्ग को हर कोई अंगीकार नहीं कर पाते।

एक जगह एक महाराज आये हुए थे। बहुत सारे लोग प्रवचन में गए, वहां चार युवक भी थे। वे सब के सब प्रवचन से प्रभावित हो गए, सबके भीतर वैराग्य का अंकुर जाग गया, फूट गया और चारों ने तपस्या लेने का मन बना लिया। मुझे दीक्षा लेना हैं, मुझे तपस्वी का जीवन जीना हैं, चारो ने ठान लिया। हमारे शास्त्रों में 4 तरह के व्यक्ति को चार प्रकार से पहचानने की बात की गई हैं, अलग-अलग गोले की तरह। एक मोम का गोला होता हैं, एक लाख का गोला होता हैं, एक काठ का गोला और एक मिट्टी का गोला। आकर्षक दिखता हैं मोम का गोला लेकिन मोम का क्या होता हैं। थोड़ी सी आंच दिखाओ, पिघल जायेगा। लाख को आंच पर रखो, पिघल जाती हैं, थोड़ा ज्यादा समय लगता हैं। लकड़ी को आग पर रखना पड़ता हैं आंच पर नहीं, तब लकड़ी जलती हैं। और मिट्टी को जितना आग पर चढ़ाओ, मिट्टी पककर उतनी मजबूत होती हैं। वही मनस्वी होता हैं, जो जितना पकाया जाए उतना मजबूत हो। चारों युवक प्रभावित हो गए, चारो ने ठान ली की उन्हें अब दीक्षा लेनी हैं। बात बाहर आ गई, प्रवचन सुनकर सभा मंडप से बाहर को निकला, सभा मंडप से बाहर को निकला कि तभी किसी ने कहा देखो, यह दीक्षा लेंगे। 70 चूहे खा कर बिल्ली चली हज को, यह क्या करेंगे, यह दीक्षा लेंगे? हंसी और कराएगा। पहले थोड़ा अभ्यास तो कर ले। चारों ने सुना, तीन ने अनसुना कर दिया और एक ने कहा, हाँ भाई, बात ठीक हैं, दीक्षा लेना हैं, तपस्या करना हैं। थोड़ी प्रैक्टिस कर लूँ और प्रैक्टिस कर लूँ  फिर लूंगा दीक्षा और उसने अपना विचार त्याग दिया, वह मोम का गोला था जो आंच देखते ही पिघल गया। दूसरा वहां तक तो सम्भला रहा, घर पहुंचा, उसके पहुंचने के पहले खबर पहुंच गई थी। वह घर पहुंचा और उसके पहुंचने के पहले ही खबर पहुंच गई थी और जैसे ही घर पहुंचा तो घर के लोगों ने कहा- कहाँ, भ्रमित हुए हो? क्या दीक्षा का प्लान कर रखा हैं तुमने? ये फोकट की बातें कहाँ से सीख ली। हमने तुमको महाराज के पास इसलिए थोड़ी भेजा था कि तुम साधु बन जाओ। ख़बरदार जो दीक्षा का नाम लिया तो और भूलकर भी अब महाराज के पास नहीं जाना, नहीं तो ये सब तुम्हे अपने गिरोह में शामिल कर लेंगे। मैं तो कहता हूँ एक बार हमारे गिरोह में आ तो जाओ, फिर देखो क्या होता हैं। खबरदार जो ऐसी बात की तो पहले अभ्यास करो और घर में रहकर साधना करो। ठीक हैं, आप लोग बोलते हो तो मैं अभी अपने विचार को स्थगित रखता हूँ, यह लाख का गोला। तीसरा इस बैरियर को पार कर गया पर जब गया अपनी घरवाली के सामने तो देखा वो तो एकदम बिलखी हुई हैं, क्या सोचकर आपने ये निर्णय ले लिया, मेरा तो सोचा होता। आप दीक्षा ले लोगे तो मेरा क्या होगा। अब वो एकदम से बिफर पड़ी और वो कह रहा हैं, अभी मैंने दीक्षा लेने का मन बनाया हैं, यह तो सौभाग्य की बात हैं। मनुष्य जीवन तो बहुत दुर्लभता से मिलता हैं। नहीं, मैं यह सब नहीं सोच सकती, अगर आपको दीक्षा लेना ही हैं तो मेरी लाश पर पांव रखकर दीक्षा लेना होगा। अब क्या करें? सामने वाले को हथियार डालना पड़ा कि वो लेट गई, बिफरी हुई हैं, अचेत हो गई, अब क्या, यह काठ का गोला था जो आग पर रखा और जल गया लेकिन चौथा आदमी जो था, उसने पत्नी से भी कहा, ठीक हैं, तुम कह रही हो पर मेरा निर्णय पक्का हैं। मेरी आयु का क्या भरोसा कल क्या हो जाए, मैं  कुछ नहीं जानता। अगर मैं इस दुनिया से चला जाऊंगा तो तुम्हारा क्या होगा। मोह भाव छोड़ो, आत्मा को पहचानो, ये तो जड़-संयोग हैं। मैं दीक्षा ले रहा हूँ, तुम्हारे पीछे सारी व्यवस्थाएं हैं, तुम्हारे निर्वाह के लिए पर्याप्त हैं। मुझे देख कर मोह और विलाप करने की जगह मुझसे प्रेरणा लो और तुम भी मेरे पथ कि अनुयायी बनो। यह रास्ता हैं, आगे बढ़ो और वो आगे बढ़ गया, गुरु चरणों में चला गया और दीक्षा ले लिया, वह मिट्टी का गोला था। जो जितना तपाया जाए, पकाया जाए, उतना पक्का बने। तो जो मिट्टी के गोले की तरह होते हैं, वह तपस्वी होते हैं, बाकी तो सब मोम के गोले हैं। मोम के गोले मजबूत बनाइए, दृढ इच्छाशक्ति और उच्च मनोबल होगा, तब तुम्हारे भीतर तपस्या का मनोभाव जागेगा तो अपने भीतर वह मनोभाव जागृत करो, अपनी इच्छा शक्ति को प्रबल बनाइए, जीवन में आमूलचूल बदलाव आएगा।

हमारी इच्छा-शक्ति विकसित होगी, वृद्धिगत होगी। कुछ तो आगे बढ़ो, कहीं ना कहीं हमारे मनोबल की कमजोरी हैं। अपने भीतर वह भाव जगाने की आवश्यकता हैं, ऐसा भाव जग जाए तो जीवन का कायापलट हो जाए, आमूलचूल परिवर्तन, ऐसा परिवर्तन जिसकी हम कभी कल्पना भी नहीं कर सकते। तो जो मनस्वी होता हैं वह तपस्वी भी होता हैं। तपस्वी मनस्वी होता हैं, हर कोई नहीं बन सकता। मैंने आपसे कहा कि तपस्वी बनिए और तपस्वी नहीं बन सके तो मनस्वी बनिए।

महाराज! यह क्या, यह कंसेप्ट समझ में नहीं आया। अभी बताता हूँ, मनस्वी होने का मतलब हैं, ऊंचे मन वाला बनिए, ऊंचे विचार वाला बनिए, बड़ी सोच वाले बनो, सकारात्मक बनिए, वैचारिक रूप से सहिष्णु बनिए, यह भी तपस्या हैं। अब आप से दूसरे तरह की तपस्या कराऊँ, मन की तपस्या, वचन की तपस्या और शरीर की तपस्या। अभी तक में शरीर की तपस्या की बात कर रहा था, अब मन और वचन की तपस्या के लिए कुछ नहीं करना, मनस्वी बनना हैं।

मनस्वी बनने का मतलब, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में स्थिरता बनाए रखना तप हैं। अपनी स्थिरता को बनाए रखें, सुख हो तो, दु:ख हो तो, अनुकूल हो तो, प्रतिकूल हो तो, लाभ हो तो, नुकसान हो तो, अच्छा हो तो, बुरा हो तो स्थिरता बनाए रखो। हमने सुना हैं, तपस्या से निर्जरा होती हैं और जब हम अपने आप को प्रतिकूल स्थितियों में स्थिर बनाते हैं तो निर्जरा करते हैं कि नहीं करते तो यह निर्जरा अपने आप हुई की तपस्या से हुई? मेरे सामने कोई  प्रतिकूल संयोग आया और मैंने अपने आप को स्थिर बनाए रखा, मन को विचलित नहीं रखा, ठीक हैं, कर्म का उदय हैं, चलता हैं। बुरी स्थिति हैं, ठीक हैं, समय टल जाएगा, कर्म निकल जाएगा, आपने मन में समता रखी और आपने अपने भीतर के कर्मों को काटने का सामर्थ्य विकसित कर लिया, यह तपस्या हैं।

जब भी कोई समस्या आए, उसे समता से स्वीकार कर लो, तपस्या बन जाएगी। हैं यह आर्ट तुम्हारे पास समस्या को तपस्या बनाने की? महाराज! अभी तो हमें तपस्या ही समस्या दिखती हैं, समस्या को तपस्या क्या बनाएं। तपस्या समस्या दिख रही हैं, तपस्या की बात आते ही समस्या खड़ी हो जाती हैं। समस्या को तपस्या में बदलो, दृष्टि आनी चाहिए, मन में समता भाव बढ़ाओ और एक बात बोलूं, समता हैं तभी तपस्या, तपस्या हैं। समता के अभाव में की जाने वाली तपस्या, तपस्या नहीं कहलाती। मन में समता भाव बढ़ाइए, मेरे मन की समता का भाव निरंतर बढे ताकि मैं अपने जीवन को आगे बढ़ा सकूं। मेरी समस्या हल हो सके, जब कोई तुम्हारे सामने समस्या हो तो तुम्हारे पास रास्ता क्या हैं? चारो तरफ समस्याएं खड़ी हो, उलझने हो तो तुम्हारे पास क्या रास्ता हैं? ईधर-उधर सिर मारना या उस समस्या को एक चुनौती के रूप में स्वीकारना और अपने आप को सहज भाव से उससे निपटने के लिए उद्धत करना। कौन सा रास्ता अच्छा हैं, बाद वाला ना तो यही तपस्या हैं, उसे चुनौती मानो और उपलब्धि में परिवर्तित करो। ठीक हैं, यही मेरी तपस्या हैं, यही मेरी तपस्या हैं। कोई दू:प्रसंग आये, कर्म का उदय मानकर स्वीकार लो, मन में समता धार लो, तपस्या हो गई। कोई दुर्वचन बोले, ठीक हैं यह नजरअंदाज कर दो, चलो कर्म का उदय हैं, सुन करके अनसुना कर दो, निर्जरा कर ली, तपस्या हो गई। व्यक्ति की बड़ी कमजोरी हैं, वह उपवास कर सकता हैं पर किसी की दो बात नहीं सुन सकता। कई बार तो ऐसा होता हैं कि भूखा बैठा हैं थाली पर और किसी ने दो बात सुनाई, थाली छोड़ कर भाग जाता हैं। रोटी छोड़ना आसान हैं, गुस्सा मुलक प्रतिक्रिया छोड़ना कठिन, यह हमारी दुर्बलता हैं।

तुम लोगों की ही नहीं, एक दिन  गुरुदेव ने हम लोगों से कहा था कि तुम लोग केश-लौंच की पीड़ा हंसते-हंसते सह लेते हो। साधर्मी की दो बात नहीं सुहाती, साधर्मी की बात सहो, जीवन को आगे बढ़ाओ तो दो बात सहने की ताकत हर किसी के पास नहीं होती। जो मनस्वी होता हैं वही रखता हैं, हंस कर टाल दो। कोई कुछ बोला, हाँ, ठीक हैं चलता हैं। अरे इसका नेचर हैं, कोई बात नहीं, हंसकर टाल दो, सुनकर अनसुना कर दो, ठीक हैं, उसकी आदत हैं तो बोल गया। अरे वो मेरे कर्म का निमित बनकर के आया हैं, उसके निमित्त से मेरे कर्म कट रहे हैं, ऐसा सोच लो, तपस्या होगी कि नहीं। हो सकती हैं, अगर आप सोच बना लोगे।

एक सज्जन आये, मेरे पास बहुत व्यथित मन से, उनकी धर्मपत्नी का स्वभाव बड़ा खोटा, बड़ी कर्कशा और औरों से तो फिर भी अच्छे से बोले पर अपनी पति पर तो एकदम चढ़े ही रहे, उसे कुछ गिने ही नहीं। एक-दो बार तो जब  मेरे सामने प्रसंग आया तो मुझे भी तरस आ गई कि, हे भगवान! इसको कितना भोगना पड़ रहा हैं पर एक दिन जब ऐसी बात आई तो उनके एक मित्र ने उनके सामने मुझसे कहा- महाराज! यह बहुत दु:खी हैं, इनकी धर्मपत्नी ऐसी हैं।  उन्होंने तुरंत जवाब दिया, भैया, बात रोको, मैं दु:खी नहीं हूँ, महाराज में दु:खी नहीं हूँ। ये गलत बोल रहे हैं, महाराज! मैं तो यह सोचता हूँ, यह मेरी तपस्या हैं, मैं दु:खी नहीं हूँ, यह मेरी तपस्या हैं। महाराज! वह बोलती हैं, मैं सुनता हूँ, उसको अनसुना करता हूँ, उसकी बात का बुरा नहीं मानता। मैं यह सोचता हूँ, मेरे कर्मों की निर्जरा हो रही हैं, मैं और कोई तप नहीं करता, यही सोचता हूँ मेरे घर में मेरी पत्नी मेरे तप का निमित्त बन कर के आई हैं, यह मेरी तपस्या हैं। सोच सकते हो उस व्यक्ति की सोच किस हाइट की हैं, यह मनस्वीपन हैं। तुम लोग घुटते रहते हो, क्यों? अरे ठीक हैं, जिंदगी तो जिंदादिली का नाम हैं। क्यों घुटते हो? मैंने कहा, समस्या को तपस्या बनाओ, जीवन बदल जाएगा। कोई कैसा दुर्वचन कह दे, ignore it, ओवरलूक करिए, बायपास कीजिए।

महाराज! बड़ा कठिन हैं, जब आप बोलते हैं तब तो अच्छा लगता हैं, बाद में बात लग जाती हैं, उसी को तो जीतना हैं। जो सच्चे अर्थों में बड़े लोग होते हैं, वो छोटी-छोटी बातों से कभी प्रभावित नहीं होते, वस्तुतः हमें उद्वेलित कौन करता हैं, हमारे भीतर का अहंकार, हमारा ईगो, जो बातों को स्वीकारने नहीं देता, अच्छा, उसने मुझे ऐसा कह दिया, मैं ऐसा थोड़ी हूँ, क्या समझ रखा हैं उसने। मेरे लिए ऐसी टिप्पणी कर दी, 4 लोगों के सामने मुझे ऐसे बता दिया, मेरी insult कर दी। यह सब कौन कह रहा हैं, यह कौन कह रहा हैं, इगो। वो अहं, जब तक अहं भाव रहेगा, तब तक अहोभाव प्रकट नहीं हो सकता। अहंभाव के रहते अहोभाव प्रकट नहीं हो सकता। अहं भाव समस्या हैं और अहोभाव तपस्या हैं। इस अहं भाव को अहोभाव में बदलने का पुरुषार्थ कीजिए। नहीं, कोई कुछ बोल दे, ठीक हैं, हम उसको झेलेंगे, उसे नजरअंदाज करेंगे, उसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न कभी नहीं बनाएंगे, कोई बात नहीं, इसमें ही मेरी निर्जरा हैं, इससे मेरे कर्म कट रहे हैं, अगर इतनी सी समझ मनुष्य के मन में आ जाए तो फिर तो कहने की बात ही क्या हैं, मजा ही कुछ और हैं, इतनी सी बात मन में आनी चाहिए कि नहीं, ठीक हैं, कोई दुर्वचन बोले, कोई दुःप्रसंग हो, कोई दुर्व्यवहार करे, समता, यह मेरी तपस्या हैं, मुझे इसे सहना हैं, मुझे इसे पीना हैं, मुझे इसे पार करना हैं, तपस्या हो गई। कौन करेगा? जो मनस्वी होगा।

एक बार एक सज्जन ने कहा, महाराज जी! हमारा तो अब शरीर किसी लायक नहीं बचा, डायबिटीज हैं, ब्लड-प्रेशर हैं, कार्डियक प्रॉब्लम हैं, चाहता हूँ सब कुछ करूं पर कर नहीं पाता। क्या करूं? हमने कहा भैया जो नहीं कर पाते उसके बारे में मत सोचो, जो कर सकते हो उसके बारे में विचार करो। क्या नहीं कर सकते? मैं व्रत-उपवास नहीं कर सकता, मैं त्याग-तपस्या नहीं कर सकता, कोई बात नहीं भाव शुद्धि तो कर सकता हूँ, मानसिक तप तो कर सकता हूँ। हमारे यहां मानसिक तप के विषय में कहा हैं-

मन की प्रसन्नता, मन में प्रसन्नता बनाए रखना, प्रसाद, हर पल खुश रहना, स्थिरता बनाए रखना, समता बनाए रखना, ठहराव बनाए रखना, यह एक बड़ी तपस्या हैं। मानसिक तपस्या, सब मे खुश। क्या होता हैं, पल में खुश होते हैं, पल में खिन्न। थोड़ी बात में खिलते हैं, थोड़ी बात में खोलते हैं तो यह जो हमारा हाल हैं, यह हाल हमें भीतर से तोड़ता हैं, कमजोर बनाता हैं। जो मनुष्य मनस्वी होते हैं, वे जीवन में आने वाले बड़े-बड़े उतार-चढ़ाव में भी ठहराव रखते हैं।

मैं एक ऐसे मनस्वी को जानता हूँ, एक शासकीय सेवा में नियुक्त व्यक्ति हैं। उसका एक भाई मानसिक रूप से विकलांग, थोड़ा अर्ध-विक्षिप्त, पिताजी को कैंसर और मां की दोनों किडनी खराब, एक बहन 34 साल की उसका विवाह नहीं हुआ। पूरे घर को संभालने की जिम्मेदारी उसकी लेकिन मैं उसे मनस्वी इसलिए कह रहा हूँ कि लंबे समय तक जुड़ने के बाद भी उसने कभी अपनी व्यथा मेरे सामने प्रकट नहीं की। एक बार उसके मित्र ने उसके घर की कहानी बताई, महाराज! इनके घर में यह तीन बड़े प्रॉब्लम हैं। मैंने कहा, तेरे घर में इतना प्रॉब्लम फिर भी तू इतना सहज रहता हैं और बकायदा तुम टाइम भी निकाल लेते हो, कैसे कर लेते हो। उसने कहा, महाराज! मै इसे ही अपनी तपस्या मानता हूँ, जो सेवा मुझे करना हैं, वह मैं कर रहा हूँ। मैं इसे तपस्या मानता हूँ, वो मेरे से जितनी सेवा लिखा कर लाए हैं, उतनी सेवा मैं कर रहा हूँ। महाराज! अपना कर्म का उदय हैं, भोगना तो हमें पड़ेगा ही। मुझे इस बात की पीड़ा नहीं कि मेरे साथ इतनी सारी विषमता हैं, मुझे इस बात का सुकून हैं कि कम से कम उससे लड़ने की ताकत तो हैं। आज मेरे पास इतना पैसा हैं, साधन हैं कि मैं उनका इलाज करा पा रहा हूँ। काश यह नहीं होता तो मेरी दशा क्या होती। बोलो, ऐसा व्यक्ति मनस्वी हैं कि नहीं? तुम्हारे भीतर भी वो मनस्वी बैठा हैं, उसे जगाओ, उसे उद्घाटित करो, उसे बाहर निकालो, उसका अभिनंदन करो, उसका सत्कार करो। मनस्वी बनो, तपस्वी बनो।

‘मनः प्रसादम’।

मन में प्रसाद, सौम्य भाव रखो, politeness। लोग पल-पल में उखड़ जाते हैं, उखड़ना अच्छी बात नहीं हैं। सौम्य भाव, यह तपस्या हैं। तपस्या को व्यापकता से समझने की जरूरत हैं। सच्ची तपस्या वही हैं जो जीवन में मधुरता का रस घोले, माधुर्य का संचार करें। शरीर को तपाने से माधुर्य हो, इसमें संदेह हैं पर मन को तपाने वाले का चित्त हमेशा मधुर होता हैं, इसमें कोई संशय नहीं। मनस्वी बनो, मन में पवित्रता रखो, विचारों में पवित्रता रखो, भाव में विशुद्धि रखो और इंद्रियों को निग्रहीत रखो। यह मानस तप हैं, बहुत बड़ा तप हैं। एक अभ्यास कीजिए, प्रतिक्रिया विरति  का। बहुत बड़ी तपस्या हैं, किसी बात पर मैं प्रतिक्रिया नहीं करूंगा, अगर करूंगा भी तो नकारात्मक नहीं करूंगा। कुछ लोग होते हैं, बात-बात में भड़क जाते हैं और कुछ लोग ऐसे होते जो बड़ी-बड़ी बात को भी पचा लेते हैं। बोलो, कौन अच्छा हैं? भड़कने वाला? तुम्हारा स्थान कहां हैं? मैं मान लूँ, रतलाम के लोग और इस शिविर में आने वाले जितने भी शिविरार्थी हैं, सब बातें पचा लेते हैं। मेरे मानने से तुम मान जाओगे। हमें यह अभ्यास बनाना हैं, इसे तपस्या समझना हैं। हम जो बातें पारंपरिक रूप से सुनते हैं, वहीं तक सुनकर रह जाते हैं और जब भी कहते हैं तो हम तपस्या को एक आदर्श के रूप में देखते हैं और यह मानते हैं  साधु-संतों का और त्यागी-तपस्वियों का काम हैं, हमारा काम हैं ही नहीं। हमारा काम तो हैं ज्यादा से ज्यादा 10 दिन कर लो, काम खत्म। मोक्ष का लाइसेंस मिल गया, नहीं, हर पल तपस्वी बनो, हर पल तप का आनंद लो, मनस्वी बनो और मनस्वी होओगे, तपस्वी होओगे तो तेजस्वी अपने आप हो जाओगे। तुम्हारे व्यक्तित्व में तेज आएगा।

तेजस्वी होने का मतलब, प्रभावशाली बनना, प्रखरता से युक्त होना तो व्यक्ति का प्रभाव होता हैं या व्यक्तित्व का? व्यक्तित्व का। तो व्यक्तित्व कैसे बनेगा? पापों में रमने से, भोगों में डूबने से या तपस्वी और मनस्वी बनने से? एक धनी व्यक्ति तुम्हारे सामने हो और एक मनस्वी व्यक्ति तुम्हारे सामने हैं। तुम किस से प्रभावित होओगे? मनस्वी से। तो तुम बताओ, मनस्वी बनना पसंद करते हो कि धनी बनना पसंद करते हो। क्या? मनस्वी, बोल तो रहे हो प्रयास किसके लिए करते हो? मनस्वी बनने के लिए कभी कोई प्रयास करते हो?

धन कमाने के लिए तुम रोज कितने घंटे देते हो और अपने जीवन को मनस्वी बनाने के लिए तुम कितना समय देते हो। विचारों, मैं आपसे कहता हूँ, जो भावना योग की शुरुआत यहां पर हुई, 20 मिनट का समय आप रोज़ दीजिए अपने आप को। आप 3 महीने में मनस्वी बन जाओगे, आपको कुछ सोचने की जरुरत नहीं पड़ेगी। धनी बनने के लिए तो मनुष्य को पूरा जीवन खपाना पड़ता हैं तो भी वह मन वांछित धन पाए, इसकी कोई गारंटी नहीं हैं बल्कि आज तक कोई मन वांछित धन नहीं पा सका। इंसान मरते-मरते भी कहेगा, यह काम बाकी रह गया। तो धनी बनने के लिए सारे जीवन के प्रयास होने के बाद भी व्यक्ति मनोवांछित धन नहीं पाता पर मैं तुमसे कहता हूँ, केवल 20 मिनट रोज देना और उस भावना से अपने अवचेतन मन को जगा देना, जिससे तुम्हारे अंदर स्थिरता आये, समता आये, सरलता आये, सहजता आये, शांति आये और सदभाव आये, संयम आये और संतोष आये। ये एक व्यक्ति के आंतरिक व्यक्तित्व को निखारने के मौलिक तत्व हैं, उसे उद्घाटित करिए, आप तेजस्वी बन जाओगे। जहां जाओगे, अपने व्यक्तित्व की अमिट छाप छोड़कर आओगे। क्या आदमी हैं, अरे गजब। लोग तुम्हारी प्रशंसा करते नहीं रुकेंगे, तुम्हारे व्यक्तित्व में सहज आकर्षण प्रकट हो जाएगा, यह तुम्हारे तेजस्वी पन का आधार हैं।

आजकल लोग तेजस्वी बनना चाहते हैं, ब्यूटी पार्लर में फेशियल करा कर के। वो तेज बाहर का हैं, असली तेज तो आत्म-तेज हैं। जो आत्म गुणों की अभिव्यक्ति से होता हैं, व्यक्तित्व को निखारिये। अपने आप को भीतर से मजबूत कीजिए। अगर व्यक्तित्व उस तरह से निखर गया तो जीवन चमन होगा। एक अलग आनंद की अनुभूति, एक अलग मजा होगा। बनना चाहते हो, तेजस्वी? हाँ, महाराज! आप तो कोई आशीर्वाद दे दो कि मैं एकदम आज ही तेजस्वी बन जाऊं। कुछ मत करो, तुम तेजस्वी ही नहीं मनस्वी भी बनोगे और तपस्वी भी बनोगे, 20 मिनट रोज दो। रोज अपने मन को रिचार्ज करो, पावरफुल बना लो, देखो जीवन में कितना व्यापक बदलाव आता हैं और जीवन का कैसा मजा आता हैं, करना शुरू करो। उसकी तैयारी आपको करनी होगी, उसके लिए तत्परता आपको दिखानी होगी तो आप तपस्वी बने, मनस्वी बने, तेजस्वी बने। अपने व्यक्तित्व को निखरियेगा, तेजस्वी बनेंगे और जो व्यक्ति तपस्वी होगा, मनस्वी होगा, तेजस्वी होगा, वह यशस्वी तो अपने आप हो ही जाएगा।

आजकल लोग यशस्वी बनना चाहते हैं और करना कुछ नहीं चाहते। नेम और फेम सब चाहते हैं पर तुम्हें जो यश मिलता हैं, वह अस्थाई हैं और अपने चरित्र बल को बढ़ाकर के जो यश पाते हैं, वो स्थाई हैं। अपने आपको स्थाई रूप से ऊंचा उठाने का प्रयास कीजिए, मुझे सच्चा तपस्वी बनना हैं, मनस्वी बनना हैं, तेजस्वी बनना हैं, यशस्वी तो हम बन ही जाएंगे। यशस्वी बनने की इच्छा रखने से कोई फायदा नहीं हैं, एक बात पूछता हूँ आपसे, आप धनी हो, 24 घंटे अपने मनोनुकूल चीजों का उपभोग  करते हो, सब कुछ अपने तरीके से जीते हो, आपका यश ज्यादा या जो त्याग-तपस्या या साधना के मार्ग में लगता हैं, समता, सरलता से जीता हैं, उसका यश ज्यादा। तो यह सूत्र हैं, यशस्वी बनो और एक लाइन में आज के प्रवचन का पूरा सार जो आपको तपस्वी से लेकर यशस्वी बना देगा, उसका सूत्र हैं, सहिष्णु बनो पूरे प्रवचन का निचोड़ क्या हैं? सहिष्णु बनो मतलब सहनशील बनो। चीजों को सहने की ताकत विकसित करो। अगर यह बात आ गई तो तय मान करके चलना वो हमारे जीवन के व्यापक बदलाव का आधार बने। सबके भीतर वैसा बदलाव आए, सब अपने जीवन में आमूलचूल परिवर्तन करें, यह भाव लगाए। अपनी शक्ति के अनुरूप तपस्या जरूर करें। महाराज! आज आपने कह दिया, अब तो व्रत उपवास करना बंद कर देंगे, हम तो सीधे तेजस्वी, तपस्वी की जगह मनस्वी बनेंगे, यशस्वी तो हो ही जाएंगे।

भैया, स्वयं के प्रति ईमानदार बनोगे तो जीवन में कभी दुविधा नहीं होगी और जो व्यक्ति स्वयं के प्रति बेईमान होगा वह जीवन में कभी उन्नति नहीं करेगा। हम स्वयं के प्रति ईमानदार बनकर अपना कार्य करें और अपने जीवन के क्रम को आगे बढ़ाने का सत पुरुषार्थ करें। यदि ऐसा पुरुषार्थ हम करेंगे तो वह हमारे जीवन में जबरदस्त परिवर्तन घटित करेगा, वो परिवर्तन हमारे अंदर आना चाहिए, हमें मनुष्य जीवन मिला हैं, यह भोग और विलासिता में खपाने के लिए नहीं हैं, हमें मन वचन और तन से जितना बने। त्याग-तपस्या और संयम-साधना करने की आवश्यकता हैं, अपेक्षा हैं। हम उस मार्ग में लगाएं, शक्ति के अनुसार करें, हम शक्ति के अनुसार करें और जो हमारी शक्ति और सीमा से बाहर हैं, उसकी श्रद्धा करें और आलोचना नहीं करें। कुछ लोग होते हैं जो तपस्या करते नहीं और तपस्वियों की आलोचना करते हैं। यह महान पाप हैं, तुमसे ना करते बने, अच्छी बात हैं, जो कर रहा हैं, उसकी अनुमोदना करो, उसकी कमियां मत देखो। अरे ऐसा उपवास करने से क्या फायदा, देखो उपवास करते हैं, गुस्सा करते हैं। तुम उसके गुस्से को मत देखो, उसके उपवास को देखो और गुस्सा पर तुम्हारा ध्यान जाए तो तय कर लो मैं जब कभी उपवास करूंगा, यह गुस्सा अपने ऊपर हावी नहीं होने दूंगा। यह पॉजिटिव एप्रोच रखनी चाहिए, आप ऐसा करके दूसरों की तपस्या की आलोचना करते हैं और पाप के भागीदार बनते हैं। बड़ी  सोच रखने वाला मनुष्य जीवन में कभी विफल नहीं होता, उसके जीवन में एक नई ऊंचाई प्रकट होती हैं। गुरुदेव की ये दो पंक्तियां आज के दिन, तिथि में सब की प्रेरणा का आधार हैं-

तन मिला तुम तप करो, करो कर्म का नाश।

रवि शशि से भी अधिक हैं, तुम में दिव्य प्रकाश।

वह दिव्य प्रकाश तुम्हारे भीतर उद्घाटित करो और अपने जीवन को सार्थक बनाओ। हम इसी दिशा में आगे बढ़ते रहे और सबके जीवन में सम्बल हो और सभी अपने जीवन को आगे बढ़ा सके। इसी पवित्र भावना के साथ मैं यहीं पर विराम ले रहा हूँ, बोलिए परम पूज्य आचार्य गुरुवर श्री विद्यासागर जी महाराज की जय।

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