षट्खण्डागम और धवला के अनुसार सल्लेखना का क्या स्वरूप है?

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शंका

जब से सल्लेखना-संथारा के विषय में उपसर्ग आया है, पूरे देश में आपकी आज्ञानुसार ब्रह्यचारी बहनें व भाई और श्वेताम्बर परम्परा में दीक्षा के पूर्व जो साधना करते हैं, वे मुमुक्ष भाई और बहन, ये सारे लोग जप, तप, अनुष्ठान और त्याग करने लगे हैं। क्योंकि ये लोग गृहस्थ, श्रावक और आप जैसे श्रमण इन दोनों के बीच की कड़ी हैं। तो उन्हें इस विषय में आगे क्या करना चाहिए? मार्गदर्शन दें। इसके साथ ही एक जिज्ञासा मेरी यह है कि दिगम्बर जैन परम्परा का सबसे प्राचीन ग्रन्थ षट्खण्डागम, धवला, जय धवला और महा धवला है, इन ग्रन्थों में सल्लेखना का क्या स्वरूप है बताने की अनुकम्पा करें।

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समाधान

जितने भी जैन धर्म से जुड़े हैं, साधु-सन्त तो अपना काम कर रहे हैं, श्रावक भी अपना काम कर रहे हैं, त्यागी व्रतियों को और काम करना है। त्यागी व्रतियों के लिए सबसे बड़ा काम अपना धर्मानुष्ठान करते हुए श्रावकों को जगाने का है, खासकर ऐसे स्थानों पर जहाँ साधु सन्तों का समागम नहीं है। 

लोगों को जगाएं, उन्हें सल्लेखना का स्वरूप बताएँ, सल्लेखना की महिमा बताएँ। मैंने जैसा कल भी कहा था; आज भी कह रहा हूँ कि अब इस मौके का फायदा उठाकर हमें सल्लेखना के स्वरूप को इस तरीके से व्याख्यायित और विवेचित करना चाहिए कि इस देश का हर व्यक्ति अपनी यह साध्य बना लें कि “मेरा अन्त सल्लेखना पूर्वक हो, मेरा अन्त समाधि पूर्वक हो।” यही हमारी सबसे बड़ी विजय होगी। ऐसा प्रयास हर त्यागी-व्रती को करना चाहिए। 

आपने पूछा है षट्खण्डागम, जय धवला में समाधि का क्या वर्णन है? हमारे यहाँ षट्खण्डागम में, धवला टीका में अनेक स्थानों पर समाधि का उल्लेख है। जहाँ उन्होंने निक्षेपों के प्रकरण में चित, चारित्त और तत्त्व शरीर की चर्चा की। उस तत्त्व शरीर के प्रसंग में भक्त प्रत्याखान, इंगनी मरण और प्रयोग गमन नाम के संन्यास की तीन विधियों का बहुत उत्तम विवेचन किया है। यह तो हमारी साधना का प्राण है। समाधि के बिना किसी भी ग्रन्थ की परिपूर्णता नहीं मानी जा सकती। इसलिए हर ग्रन्थ में किसी न किसी रूप में इस सल्लेखना, सन्थारा या समाधि का उल्लेख मिल जाता है।

Edited by: Pramanik Samooh

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