क्या ऋद्धि-सिद्धि होती है?

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शंका

जो अणिमा और ऋगिमा ऋद्धियाँ हैं, क्या वे आज के युग में प्राप्त होना संभव है? मुनि महाराज जी इतनी तपस्या करते हैं, उनको जो ऋद्धियाँ प्राप्त होती हैं वे उनका प्रयोग क्यों नहीं करते? यदि वे उन ऋद्धियों का प्रयोग करें तो श्रावक दूसरे देवी-देवताओं के पास में नहीं जायेंगे और जैन धर्म की भी प्रभावना होगी!

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समाधान

शास्त्र के विधान अनुसार पंचम काल में कोई ऋद्धि नहीं होती! ऋद्धि का मतलब है तपोविशेष से प्रकट चमत्कारिक शक्ति! यह सारी शक्तियाँ स्वतः ही प्रकट हो जाती हैं। यह चतुर्थ काल में होती हैं, पञ्चम काल में नहीं! वर्तमान में ऐसी कोई ऋद्धियाँ नहीं होतीं, सिद्धियाँ ज़रूर हो सकती हैं। ऋद्धियाँ प्राप्त होती हैं, सिद्धियाँ की जाती हैं। लेकिन मुनि-जन अपनी सिद्धियों का प्रयोग नहीं करते, प्रयोग करने में भी उन्हें दोष लगता है। किन्तु, उनके पुण्य का प्रताप कुछ ऐसा होता है कि बिना किसी प्रयोग के ही लोग का सारा काम हो जाता है।

मैं आपको एक घटना सुनाता हूँ, सन १९८७ में गुरुदेव के सानिध्य में नैनागिरि में पंचकल्याणक गजरथ प्रतिष्ठा महोत्सव होना था। नैनागिरी एक सूखा क्षेत्र है, प्रशासन लगा हुआ था, चार-चार सौ फुट तक बोरिंग कर ली, एक बूंद पानी नहीं! पूरी कमेटी हैरान-परेशान! पानी के बिना इतना बड़ा महोत्सव कैसा होगा? ५ लाख लोगों के आयोजन में सम्मिलित होने की संभावना थी। ‘इतने बड़े आयोजन में पानी के अभाव में आखिर क्या होगा?’ लोग परेशान थे और कमेटी के लोग गुरुदेव के चरणों में आए। आयोजन में २ दिन की देर थी, मैं गुरु चरणों में ही बैठा था; उन दिनों में क्षुल्लक अवस्था में था। जब गुरु चरणों में उन्होंने कहा कि “महाराज जी! पानी के बिना क्या होगा? ये बड़ी चिंता है।” गुरुदेव ने बहुत सहजता से कहा- “चिंता मत करो! प्राणी अपने साथ खुद पानी लेकर आएगा।” 

गुरुदेव से आशीर्वाद लेकर वह लोग लौटे। रास्ते में उनके मन में आया कि-“जहाँ एक नाले के किनारे बोरिंग कर रहे थे जो ३५ फीट के बाद दलदल आ जाने के कारण रोक दिया गया था, चलो! उसमें पंप चला कर देखते हैं।”उस ३५ फीट के बोर में उन्होंने पंप चलाया और प्रति घंटा ५००० गैलन पानी उस छोटे से बोर ने दिया। एक छोटे से बोर ने उस पूरे महोत्सव को पानी पिला दिया। ५ लाख से ज्यादा लोग उस महोत्सव में सम्मिलित हुए, गुरुदेव के द्वारा उसी महोत्सव में पहली आर्यिका दीक्षा दी गई थी। १० फरवरी १९८७ को, आर्यिका गुरुमति, दृढ़मति आदि ११ आर्यिकायें थीं। बहुत बड़ा महोत्सव था, उस छोटे से बोर ने सब को पानी पिला दिया। महोत्सव के समापन के बाद १०- २० हज़ार लोग रुके थे। दूसरे दिन तक पानी मिला और तीसरे दिन जब मोटर चलाया वहाँ कोई पानी नहीं निकला। लोगों ने पूछा- “पानी का क्या हुआ?” तो उन्होंने उत्तर दिया- “जो पानी लाया था, जिसके लिए पानी आया था, उसका पानी हो गया।” यह गुरु जी ने कोई मंत्र तंत्र से किया, ऐसा नहीं! महान आत्माओं के पुण्य के प्रताप से स्वतः सारी अनुकूलताएँ प्रकट हो जाती हैं।

मैं दूसरी घटना सुनाता हूँ, १९९४ में संघ अमरकंटक में था। अमरकंटक में सर्वोदय क्षेत्र भूतल से १२० फीट की ऊंचाई पर है और समुद्र तल से इसकी ऊंचाई ३६०० फीट है। उस पूरे क्षेत्र में बॉक्साइट की खानें हैं। वहाँ जिस कुएँ का पानी आता था, उसमें पानी निकालने के लिए ८० हाथ रस्सी प्रयोग होती थी। परंतु कुएँ के बिना क्षेत्र कैसे होगा! समिति कुआं खुदवा रही थी, ४८ फीट कुआँ खुद चुका था, किन्तु पानी तो क्या, मिट्टी में नमी तक नहीं आई। मैं उन दिनों गुरु चरणों में ही था। वहाँ के संस्थापक अध्यक्ष थे उदय चंद जैन। वे बोले- “महाराज! क्षेत्र का क्या होगा। आज १७ मई हो गई है, बरसात आने वाली है। प्रतिदिन बमुश्किल १ फुट खुदाई होती है और पानी के कोई लक्षण नहीं है। अब क्या होगा?” सन्योगतः उस दिन गुरुदेव के आहार उन्हीं के चौके में हुए। मैंने उनसे पूछा, “आहार तो तुम्हारे यहाँ हुए?”, वे बोले – “जी महाराज! हमारे यहाँ हुए”। मैंने पूछा -“गंधोदक का क्या किया?”, बोले “समझ गया महाराज”। उन्होंने गुरुदेव का गंधोदक उस गढ्ढे में डाला, दो फीट और खोदने पर पानी निकल गया। ऐसा पानी निकला कि पूछो मत! तय था कि कम से कम ८० फीट खोदना है; ६३ फीट पर ब्रेक लगाना पड़ा, आगे खोद ही नहीं पाए। यह इतना अच्छा कुआँ निकला की वह ठेकेदार, जिसने कुआँ खोदा, बोला- “मैंने इस पूरे इलाके में २०० कुँए खोद दिए, किन्तु ऐसा स्रोत कहीं नहीं मिला।” यह क्या है? महान आत्माओं की उर्जा का प्रताप है। जिनके भीतर साधना होती है, तप का तेज होता है, उनके साथ शक्तियाँ अपने आप जुड़ जाती हैं।

गुरुजी की बात आ रही है, तो एक और बात बताता हूँ। १९९३ में रामटेक का चातुर्मास था, मैं गुरु चरणों में था। एक व्यक्ति, जो एक साधु के रूप में था, HIGH PROFILE (उच्च सामाजिक स्तर) लोग उसके साथ थे। चेहरा बड़ा तेजस्वी, बड़े बाल, माथे पर तिलक, रेशमी कुर्ता और पजामा,गले में माला, हाथ में चमेली का फूल और पूरे शरीर में इत्र लगा हुआ। समझ में आ गया कि यह तांत्रिक किस्म का व्यक्ति है। वह गुरुदेव के चरणों में आधा घंटा बैठा, महाराज ने बस आशीर्वाद दिया, न इन्होंने कुछ कहा, न उन्होंने कुछ बोला। महाराज की तो आदत है, जब तक पूछो नहीं तब तक बोलते नहीं। वहाँ से आधे घंटे बाद वह व्यक्ति मेरे पास आया, मैं बगल में ही था। उसने मुझसे आकर के जो बात कही, वह मैं आपसे कहना चाहता हूँ, बोला  – “बाबा! आपके बड़े बाबा में तो दिव्य शक्तियाँ हैं। हम जिन के पीछे भागते हैं, वे सब इनके इर्द-गिर्द घूमती हैं, पर वे उन्हें नजर उठा कर के भी नहीं देखते।” यह अद्भुत शक्ति है। अगर हम ठीक साधना करेंगे, तो स्वतः ही सब आएँगे। भगवान महावीर का वचन है-

धम्मो मंगल मुक्खिटं, अहिँसा संयमो तबो, देवाविजस्य नमनशंतिः तस्य धम्मे श्यामनो ।

यदि हमारे ह्रदय में धर्म प्रतिष्ठापित होगा, देवता स्वयं नीचे आकर अवतरित होंगें,  हमें देवताओं को बुलाने की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

Edited by: Pramanik Samooh

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