जैन धर्म में पाँच रंगों का सिद्धान्त

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जैन धर्म में पाँच रंगों का सिद्धान्त

ध्वज क्या और क्यों  

किसी भी देश, सेना, संस्था, समूह के अलावा किसी अवसर विशेष या सम्प्रदाय विशेष के प्रति निष्ठा प्रदर्शित करने के लिए चिन्ह या प्रतीक के रूप में ध्वज का प्रयोग किया जाता है। ध्वज पर चिन्ह या प्रतीक उस समुदाय विशेष की पहचान या विशेष गुणों से उसे एक सूत्र में बांधते है।

जैन ध्वजा

जैन धर्म के मान और गौरव का प्रतीक है-पंच वर्णी ध्वजा। ध्वज के पांच रंग(लाल, सफेद, पीला, नीला, काला) जैन धर्म के मूल परम् श्रद्धेय पञ्च परमेष्ठी की उपासना के प्रतीक हैं। यह पांच ही मूल रंग हैं क्योंकि सृष्टि के जितने भी परमाणु हैं वह इन्हीं पाँच रंगों में से किसी एक रंग के हैं। यह पांच रंग इस बात का प्रतीक है कि इस ध्वजा ने इस सृष्टि के सारे तत्वों को समाहित कर लिया है कुछ भी शेष नहीं बचा है

पंचवर्णी ध्वजा के पांच रंगो का महत्व

लाल रंग – जन्म-मरण के चक्र से मुक्त सिद्ध भगवान उगते हुए सूरज की तरह लाल रंग का प्रतीक हैं।

सफ़ेद रंग- मोक्ष मार्ग के उपदेशक अरिहन्त भगवान चन्द्रमा के समान श्वेत रंग का प्रतीक हैं।  

पीला रंग- धर्म प्रभावना के लिए संघ का दायित्व वहन करने वाले आचार्य पीला रंग का प्रतीक हैं।

नीला रंग – शास्त्रों का सम्पूर्ण ज्ञान होने से संघ में पठन-पाठन करवाने वाले उपाध्यय मरकत मणि के समान नीले रंग का प्रतीक हैं।

काला रंग – साधना में लीन, अपरिग्रही साधु काला रंग का प्रतीक हैं।

Edited by Ankita Jain, Michigan

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