धार्मिक कार्य किस भावना से करें

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धार्मिक कार्य किस भावना से करें

धर्म का कार्य अगर करो तो मन वचन काय से करो और पाप का काम अगर करो तो जहाँ रुक सको वहाँ रुको। धर्माचार करो, पर मन में कुछ दूसरा हो, वचन में कुछ दूसरा हो और क्रिया में कुछ दूसरा हो तो हमें धर्म का सच्चा फल नहीं मिल सकता। जिसका ह्रदय शुद्ध है, सरल है, उसके ह्रदय में ही धर्म पलता है। यदि मन में कुटिलता रख कर के धर्माचरण करे तो उस धर्म का सच्चा फल नहीं मिलता।

लोक व्यवहार के क्षेत्र में भावना कैसी रखें

व्यवहार के क्षेत्र में मन, वचन, काय में अंतर भी करना पड़ता है। लोक व्यव्हार में जरुरी है क्योंकि मनुष्य एकाएक अपनी दुर्वृत्तियों को नियंत्रित करने में सफल नहीं हो पाता तो अगर हमारे मन में पाप आये तो उसे मन तक सीमित रखो, वचनो में न आने दो। वचन में पाप आया है तो उसे वचन तक रोक दो व्यव्हार में मत आने दो।

खोटी प्रवृति कैसे रोकें

“मन में हो सो मन में धरिये वचन होये नहीं तन सो करिये।”

मतलब अपनी खोटी प्रवृति को जिस स्तर में रोकने की स्थिति हो उसी स्तर पर रोकने की चेष्टा करनी चाहिए | जहाँ रोक सकें वहीँ रोकें तब ही हमारा जीवन आगे बढ़ेगा।

Edited by Shilpa Jain, Talera

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