होली है…!!!

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होली है…!!!

होली क्या, क्यों और कैसे?
वैदिक मान्यता के अनुसार होली का महत्त्व है कि राजा हिरण्यकश्यप को ब्रम्हा से वरदान प्राप्त था कि कोई भी उसे नहीं मार सकता। वरदान पाने से वह स्वयं को भगवान समझने लगा और प्रजा को डरा धमकाकर विष्णु की बजाय खुद की पूजा करवाने लगा। लेकिन हिरण्यकश्यप का बेटा प्रहलाद परम विष्णु भक्त था। पिता ने प्रहलाद को मारने का निर्णय लिया। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के पास एक चादर थी, जिसको आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। हिरण्यकश्यप के आदेशानुसार होलिका प्रहलाद को लेकर आग में बैठ गयी। लेकिन हवा चलने से वह चादर होलिका से हटकर प्रहलाद पे आ गिरी, प्रहलाद बच गया और होलिका जलकर राख हो गयी। तब से होली का त्यौहार अत्याचार पर सदाचार की जीत के लिए धूम-धाम से मनाया जाता है। हालाँकि जैन समाज में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है और जैन धर्म के अनुसार किसी का दहन करना संकल्पी हिंसा में आता है।
होली-एक लोक पर्व-
होली पर्व में प्रेम और एकता की भावनाएँ प्रबल हैं लेकिन आजकल हर जगह केमिकल मिश्रित रंगों का प्रयोग किया जा रहा है जिससे चर्म रोग हो रहा है और सबसे बड़ी बात पानी की कमी हो रही है। सबसे अच्छा तरीका हाथ में गुलाल लेके माथे पर तिलक लगायें और सूखी होली खेलें। होली पुरानी दुश्मनी को दोस्ती में बदलने का,खुशियाँ बाँटने का त्यौहार है। आजकल हर गली, हर मोहल्ले में लोग होलिका दहन करते हैं, जिससे प्रकृति प्रभावित होती है, प्रदूषण बढ़ता है, लकड़ी और ईंधन की कमी हो रही है, हमारे वन नष्ट हो रहे हैं। इसलिए होली तो मनायें पर एक साथ त्यौहार मनाना शुरू कर दें, जिसमे आनन्द भी ज्यादा आयेगा, पैसे की भी बचत होगी और प्रकर्ति का ध्यान रखते हुए प्रदूषण भी कम होगा।
जैन धर्म के अनुसार होलिका दहन-
जब हम अपने अन्दर की होलिका जैसे कुमति, मोह, मिथ्यात्व, अभिमान इनका दहन करेंगे तभी सच्ची होली होगी। किसी ईंधन की जरूरत नहीं है केवल अंतर्निरीक्षण की जरूरत है। एक ऐसी ज्ञान की आग प्रकट होगी जो एक पल में उस होलिका को बिना धुँए के खाक कर देगी।
Edited by: Pramanik Samooh
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