वृद्धावस्था में धर्म और परिवार में कैसे सामंजस्य बनायें?

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शंका

घर में रहते हुए बड़े बुजुर्गों को किस प्रकार धर्म साधना करनी चाहिए और किस तरह से धीरे-धीरे धर्म के मार्ग में आगे बढ़ना चाहिए?

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समाधान

यह बहुत अच्छा प्रश्न है। आप अपने घर में रहकर के अपनी दुर्गति से बचना चाहते हो? यहां ज्यादातर SENIOR CITIZEN (वरिष्ठ नागरिक) हैं। एक बार मुझसे किसी ने पूछा कि “महाराज! पहले ऐसे प्रसंग नहीं होते थे, आजकल मां-बाप की अवहेलना इतनी अधिक क्यों होती है?” मैंने कहा- “भैया! पहले बुजुर्ग अवस्था आने के पहले ही घर छोड़कर निकल जाते थे और बच्चों को CHARGE (प्रभार) सौंप देते थे, तो दुर्गति बच जाती थी। अब आखिरी तक चाबी नहीं छोड़ते, तो चाबी छीन ली जाती है।” 

यह तथ्य है, इसे समझना चाहिए। आप अपने जीवन को अच्छा जीना चाहते हैं और घर में रहकर सुख शांति से रहना चाहते हैं, कुछ उपाय बता रहा हूँ। एक आदमी नौकरी करता है, तो ६० साल की उम्र में रिटायर हो जाता है आप व्यापार धंधे में रहते हो TIRED (थक) हो जाते हो, पर RETIRE (सेवानिवृत्त) होने का नाम नहीं लेते। अपने आप को रिटायर कीजिए। किससे? व्यापार से और घर की जवाबदेही से। आप अपनी संतान को योग्य बनाइए; और एक उम्र के उपरांत देखें, यदि आपकी संतान आपके कार्यभार/ कारोबार संभालने में समर्थ हो जाए, तो कारोबारी ज़िम्मेदारी उनको सौंप दीजिए। आपकी बहू यदि घर का सारा काम व्यवस्थित रूप से कर रही है तो धीरे-धीरे घर की ज़िम्मेदारी उनको दे दीजिए। आप स्वयं घर के मालिक नहीं, मेहमान बन कर रहना प्रारंभ कर दीजिए। आपके स्वयं को मेहमान मानो पर संतान को आख़िरी दिन तक आपको ही मालिक मानना है। ऐसा नहीं हो कि संतान सोचे कि “4 दिन के मेहमान हैं, जल्दी जाएं तो अच्छा है।”

मालिक नहीं मेहमान बनें! मार्ग-दर्शक बनें मार्ग-निर्णायक नहीं! “मैं जो कहूँ वही हो” ऐसा नहीं; सलाह दो वह भी सुझाव की भाषा में – “मुझे ऐसा लगता है, यदि तुम्हें अच्छा लगे तो कर लो, बाकी जैसा तुम चाहो।”

जिद्दी नहीं जिंदादिल बनें! यह बड़े बुजुर्ग बड़े जिद्दी होते हैं। जो जिद्दी होते हैं, वो रद्दी हो जाते हैं। “जो कह दिया सो कह दिया” ऐसा नहीं। मां-बाप का सम्मान किस प्रकार खोता है मैं आपको बताता हूँ। मैं एक स्थान पर था, वहां पर मंदिर का शिलान्यास होना था। एक युवक उस पूरे कार्य में केंद्रीय भूमिका निभा रहा था। उसकी हार्दिक इच्छा थी कि “मैं इस शिलान्यास में मैं अग्रणी भूमिका रखूं”; समर्थ भी था। किंतु उनके पिताजी एकदम ‘ठाकुर साहब’ थे। “एक बार मुंह से निकल गया यानि निकल गया! ना तो ना! अब कोई भी तर्क-वितर्क आगे नहीं चलेगा!” बाबूजी ने ना कह दी, मन बहुत है, किंतु मन रो रहा है। शिलान्यास में 2 दिन की देरी थी; बेटा मेरे पास आया। “महाराज! आप बाबूजी को समझाइए उन्होंने ना कह दी है और मैं उनको कुछ कह नहीं सकता। किंतु मेरी हार्दिक इच्छा है और यदि मैं यह काम नहीं करूँगा तो मेरे मन में टीस बनी रह जाएगी। बाबूजी की आदत ऐसी बनी हुई है मैं परेशान हूँ।” मैंने कहा- “ठीक है, अभी २ दिन बाकी हैं।” एक दिन के प्रवचन का विषय वही बना लिया। बातों को प्रतीकात्मक तरीके से रखा और मेरा तीर निशाने पर लग गया। वे प्रवचन के बाद पीछे-पीछे मेरे कमरे में आ गए। उन्होंने कहा “महाराज! आपका प्रवचन सुनकर के मुझे ऐसा लगा कि मुझे अपने बच्चों की बात का ध्यान रखना चाहिए।” हम बोले,”बहुत देर से लगा, पहले लगना चाहिए था”। ध्यान तो रखना चाहिए। मैंने उससे पूछा “बच्चे तुम्हारा ख्याल रखते हैं?” “बहुत ख्याल रखते हैं”। फिर मैंने कहा- “जब बच्चे तुम्हारे ख्याल रखते हैं तो तुम्हें भी तो बच्चों का ख्याल रखना चाहिए।” “परस्परोपग्रहो जीवानाम“! उसे समझाया और उस व्यक्ति ने फिर आगे होकर के अपने बच्चों से कहा- “जो करना है, कर लो, मेरी उसमें सहमति है।” उन बच्चों को अपार खुशी की अनुभूति हुई। वे दो भाई थे और उस जगह के मंदिर की ५ शिलाओं में से एक शिला उस परिवार ने रखी। आज वह मंदिर बन गया, प्रतिष्ठा हो गई, और वे बड़े आनंद में हैं।

अगर जिद्द की होती तो कब तक चलती? एक बार, दो बार, फिर? इसीलिए बोल रहा हूँ- “मालिक नहीं मेहमान बनें, मार्ग-दर्शक बनें मार्ग-निर्णायक नहीं; जिद्दी नहीं जिंदा-दिल बनें! और, ज्यादा नुक्ताचीनी ना करें! बार-बार छोटी-छोटी बातों में टोका-टाकी ना करें! एक सज्जन ने कहा- “महाराज जी अगर हम अपने बच्चों को नहीं टोकेंगे तो फिर बच्चे सुधरेंगे कैसे?” हमने कहा – “टोकोगे तो और नहीं सुधरेंगे। ठीक है थोड़ा-बहुत कहो लेकिन बहुत तो मत कहो!” एक गिलास दूध में कितना चीनी डालते हो? एक चम्मच? रोज एक गिलास दूध में एक चम्मच चीनी डालते हो, क्यों? क्योंकि दूध मीठा हो जाए। १० चम्मच चीनी डालोगे तो क्या होगा? एक चम्मच चीनी डालने से दूध मीठा होता है तो 10 चम्मच डाल दो! ऐसा करते हो क्या? “नहीं महाराज जी! आप हमें ना-समझ समझते हैं क्या? ऐसी गलती हम लोग कभी नहीं करते” तो आपसे मैं केवल इतना ही कहता हूँ -“जरूरत पड़ने पर जितनी जरूरत हो उतना ही कहो, ज्यादा टीका टिप्पणी मत करो! एक गिलास दूध में एक चम्मच से ज्यादा चीनी नहीं होनी चाहिए।” आप बच के रहोगे, घर में सुखी रहोगे। अभी एक ही पार्ट की बात है, दूसरी पार्ट की बात आगे करूँगा। ज्यादा टोका-टाकी मत करो! जरूरत से ज्यादा हिदायतें मत दो, जरूरत से ज्यादा टोका-टाकी मत करो! आप चाहते हो कि- “मेरी घर में मान्यता बनी रहे”, तो कम बोलो। कम बोलोगे तो आपको माल मिलेगा और ज्यादा बोलोगे तो कहेंगे “यह तो बकबक करते ही रहते हैं”। 

आपको एक बात बताता हूँ, आपके हाथ में घड़ी है, आपकी घड़ी हर सेकंड में टिक-टिक-टिक-टिक-टिक-टिक करती है। कभी आपका ध्यान जाता उस पर? हर सेकंड में घड़ी टिकटिकाती है और आपका ध्यान उस तरफ नहीं जाता, कभी नहीं जाता और आपके घर में अलार्म वाली घड़ी और पेंडुलम वाली घड़ी से १ घंटे में टन्न की आवाज़ आती तो क्या होता है? सबका ध्यान उधर चला जाता है। इतना ही कहता हूँ बार-बार टोका-टाकी करके टिकटिकाइए मत, १० गलती होने पर एक बार सीधी टंकार कीजिए तो आप का असर पड़ेगा; टिकटिकाने वाले को लोग कोई मान नहीं देते। यदि आप ऐसे चलेंगे तो घर परिवार में आपकी मान्यता बनेगी, आप आर्त्ररौद्र ध्यान से मुक्त होंगे। 

ये हुई व्यवहारिक बातें; अब आध्यात्मिक साधना की बात है। 5 मिनट में वह भी कर लूं ताकि यह अध्याय पूरा हो जाए। अपने आप को निवृत्त कीजिए, साधना में लगिए। बार-बार खाने पीने की आदत पर नियंत्रण रखें, रात्रि में चारों प्रकार के आहार का त्याग कीजिए। यदि आप सल्लेखना पूर्वक अपना अंत करना चाहते हैं तो मैं आपको कोर्स बता रहा हूँ। सबसे पहले रात्रि में चारों प्रकार के आहार का त्याग कीजिए; फिर धीरे-धीरे दिन में बार-बार खाने की आदत को नियंत्रित कीजिए; फिर उसके बाद आगे चलकर आप दिन में दो ही बार खाने-पीने का अभ्यास बनाइए; फिर आगे चलें तो आप एक वक्त भोजन-एक वक्त फल-दूध लेने का अभ्यास कीजिए और उसके बाद धीरे-धीरे एक बार पानी-एक बार भोजन और हो सके तो केवल एक बार भोजन! अभी दसलक्षण में कर रहे हो ना! ज्यादा exertion (परिश्रम) है फिर भी ज्यादा अच्छे दिख रहे हो। अभ्यास कीजिए! 

स्वाध्याय कीजिए, भगवान की पूजा कीजिए, गुरु के सानिध्य में रहना शुरू कीजिए, घर में रहते हुए भी ना रहने जैसा बनिए। अपनी संतान को, जितना आवश्यक हो, उतना सौंप दीजिए। सब मत सौंपना, कलयुग है। बचा के रखना, जितना जरूरत है। हमें कभी किसी के आगे मोहताज ना होना पड़े। उनको सौंप दीजिए, हमने अपना दायित्व पूरा कर दिया, उनको शिकायत का अवसर मत दीजिए। आप अपना अधिकतम समय साधु-संतो के चरणों में, तीर्थ क्षेत्रों में दीजिए; आनंद से रहिए। एक सज्जन से बहुत परेशान थे, “महाराज! मैं आज मैं घर छोड़ना चाहता हूँ, छूट नहीं पाता। क्या करूँ? कैसे आगे बढ़ूं?” स्वाध्यायी थे। हमने कहा “आ जाओ मेरे पास!” उनके तीन बेटे, एक मुंबई में, एक गुड़गाँव में, एक अमेरिका में! मैंने पूछा -“तुम्हारे पास कौन है?” बोला “कोई नहीं”; हमने कहा -“क्या कर रहे हो?” बोला – “घर है संभाल रहा हूँ”; हमने कहा-“चौकीदार बने रहो, वहां यदि तुम्हें कुछ होगा तो तुम्हें सहारा देने वाला कौन है?” बोला – “एक नौकर है” हमने पूछा -“मरोगे तो वसीयत किसको दोगे? अपने बच्चों को या नौकर को? तुम्हारे मरने के बाद अंतिम संस्कार के लिए आने के लिए भी तुम्हारे बच्चों को 2 दिन लग जाएंगे। हमारे पास आ जाओ, अगर रात में भी कुछ हुआ तो पूरा समाज सामने खड़ा होगा। पूरा समाज संभालेगा तुमको, कहां दुर्गति कराते हो? अपने आप को संभालिए; इधर अपना नाता जोड़िए। स्वाध्याय से जुड़िए, आध्यात्मिक साधना में लीन होइए।

Edited by: Pramanik Samooh

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