दूध पानी की दोस्ती

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दूध पानी की दोस्ती
(मुनि श्री प्रमाणसागर जी के प्रवचनांश)

एक बार पानी दूघ के पास गया और दूध से कहा – भाई! तुम्हारा बड़ा मूल्य है, महत्त्व है। अगर तुम मुझे अपने में शरण दे दो तो मेरी भी मदद हो जाएगी। दूध ने बड़े प्रेम से पानी को आमंत्रित किया और अपने में मिला लिया। थोड़ी देर के बाद हलवाई दूध को तपाने लगा तो पानी के मन में आया अरे! जिसने मुझे शरण दी है, मेरे कारण वह संकट में पड़े ऐसा तो मैं नहीं होने दूँगा। इसलिये पानी ने जलना शुरू कर दिया। यह जानकर दूध को बड़ा खराब लगा। वह आग बुझाने के लिये एकदम उबल पड़ा। जैसे ही दूध में उबाल आया और हलवाई ने एक चुल्लु भर पानी उसमें डाल दिया। दूध ने देखा- मेरा साथी आ गया और वह शान्त हो गया।

एक दिन पानी तेल के पास गया। उसने तेल से भी शरण माँगी। तेल ने बहुत रौब झाड़ते हुये कहा- तुम्हारी क्या औकात कि तुम मेरे साथ रहो। पानी की बहुत अनुनय-विनय करने पर तेल ने कहा – ठीक है, आना है तो आ जाओ। जब पानी तेल में आया तो तेल ऐँठकर उसके सिर पर बैठ गया। पानी को बुरा तो लगा पर वह चुप रहा, लेकिन जब दीपक जलाया गया तो तेल पहले जला पानी का कुछ भी नहीं बिगड़ा। जो व्यक्ति दूध और पानी की तरह एकमेक हो जाते हैं उनका अस्तित्व सदैव बरकरार रहता है। पर जो तेल की तरह ऐंठते हैं, उनका जीवन यूँ ही नष्ट-भ्रष्ट होता है।

सच्चा मित्र वही होता है जो अपने मित्र को अपने में समाकर उसे अपने समान कर लेता है और समय आने पर अपने मित्र की सहायता के लिए तैयार रहता है। जो मित्र मित्रता के नाम पर अपना फायदा करने की ही सोचता है एक दिन उसका ही हष्र बुरा होता है।

Edited by: Pramanik Samooh

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