सल्लेखना का भेद विज्ञान क्या है?

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शंका

हमारे जैन आगम में सबसे प्राचीन ग्रन्थ शिव आर्य मुनि महाराज का ‘भगवती आराधना’, जिसमें समाधि मरण सल्लेखना पर ही २१६४ गाथाएँ हैं। उसमें १७ तरह के मरण बताए हैं जिसमें विशेष पाँच तरीके के बताएँ हैं। इसमें एक छोटा समाधि मरण भाषा दौलत राय जी का भी है:
"आग लगे अरु नाव जब डूबे, धर्म विघ्न जब आवे,
चार प्रकार के आहार-त्याग के मंत्र सुमन में ध्यावे।
रोग असाध्य जरा बहु देखे कारण और न्यारे,
बात बड़ी है जो बनियावे भार भवन को ठारे।।”
इन पंक्तियों में जैन आगम के अनुसार सल्लेखना के प्रति किस परिपेक्ष में इनका अर्थ है और सती प्रथा से यह कैसे भिन्न है?

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समाधान

सल्लेखना का जो स्वरूप हमारे यहाँ बताया गया है उसकी अपनी एक प्रक्रिया है। यह बात सुनिश्चित है कि जन्म लेने वाले को एक दिन शरीर छोड़ना है। शरीर छोड़ना है, तो शरीर छूटेगा पर छोड़ने वाले दो तरीके के होते हैं, एक रोते रोते छोड़ते हैं और एक शरीर के द्रष्टा बनकर शरीर को छोड़ते हैं। शरीर को छूटता हुआ देखना और शरीर से आसक्त होकर के शरीर को छोड़ना, इसमें बहुत अन्तर है।

हमारा धर्म अध्यात्मिकता से ओत प्रोत है। जैन साधना का मूल भेद विज्ञान है। शरीर और आत्मा की भिन्नता के एहसास को ही भेद विज्ञान कहा जाता है। एक भेद विज्ञान साधक से यह कहा जाता है कि ‘जब तुम्हारे शरीर की स्थिति जर्जर हो जाए या ऐसी कोई परिस्थिति निर्मित हो जाए जिसमें अब शरीर के बचने की कोई सम्भावना शेष ना हो, उस घड़ी में शरीर रक्षण की आसक्ति से शरीर में उलझने की जगह शरीर के शोधन की प्रक्रिया में लगो और आत्मा की शुद्धि करो, आत्मा की सिद्धि करो, यही सल्लेखना का लक्ष्य है।’ इसमें आहार पानी आदि के त्याग का अपना एक क्रम है। चारों प्रकार के आहार का एक साथ त्याग करने का सीधा कोई विधान नहीं है।

Edited by: Pramanik Samooh

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