इश्वर कौन है और क्या वह हमारे सुख-दुःख का निर्धारण करता है?

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शंका

जैन धर्म में ईश्वर की परिकल्पना क्या है? क्या ईश्वर ने इस सृष्टि को बनाया है? क्या ईश्वर हमारे सुख- दुःख का निर्धारण करता है?

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समाधान

जैन धर्म में ईश्वर की मान्यता तो है लेकिन जगत कर्ता, जगत पालक के रूप में नहीं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जैन धर्म ईश्वर को मानता है, ईश्वर के कर्तृत्त्व को नहीं मानता। जैन धर्म के अनुसार ईश्वर है पर किसी अनादि-सिद्ध ईश्वर की मान्यता नहीं है। कोई अनादि-सिद्ध, सर्वशक्तिमान ईश्वर जैन धर्म में नहीं है जो हमें पुरूस्कृत या दंडित करता हो। जिसके सहारे हमारा संपोषण और संहार होता हो या फिर जो हमारे उत्थान और पतन का जिम्मेदार हो। जैन धर्म के अनुसार “अप्पा सो परमप्पा” माना गया है अर्थात आत्मा ही परमात्मा है। प्राणी अपने आप में ही परमेश्वर है। अन्तर बस इतना है कि जब तक हमारे आत्मा के गुण ढके हुए हैं, हमारे भीतर विकार हैं। जब हमारे अन्दर के विकार समाप्त होंगे, हम शुद्ध हो जायेंगे, तो हम ही परमात्मा बन जायेंगे। 

ईश्वर हम से पृथक नहीं है। आत्मा की शुद्ध और परिष्कृत अवस्था का नाम ही ईश्वर है। ईश्वरत्व को प्राप्त कर लेने के बाद हम हमेशा हमेशा के लिए जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। फिर संसार में आवागमन हमेशा के लिए छूट जाता है। वही परमात्मा है। एक बार आचार्य श्री ने आत्मा और परमात्मा के भेद को सरल उदाहरण से बताया- ‘एक धान है, दूसरा चावल। धान पर आवरण है उसे बोने से अंकुरित होता है, लेकिन चावल निरावरण है। उसे बोने पर वह अंकुरित नहीं होता। आत्मा भी आवरण सहित है आत्मा के साथ कर्म का आवरण है इसलिए संसार में बार-बार जन्म-मरण के अंकुर उसके भीतर फूटते हैं। परमात्मा चावल की भांति निरावरण है, जो संसार के आवागमन से हमेशा हमेशा के लिए मुक्त है। जैन धर्म के अनुसार हर प्राणी खुद में परमेश्वर है। आत्मा ही परमात्मा है। ईश्वर जगत के हर प्राणी में है और हर प्राणी की अपनी स्वतंत्र-सत्ता है। वह अपने ईश्वर को प्रकट करने में समर्थ भी है, वह अपनी योग्यता अनुसार वैसी साधना करे और अपने अन्दर जमे हुए कर्मकालुष को नष्ट करे। 

जैसे सोने को तपा देने पर उसमें लगी रहने वाली कालिमा नष्ट होती है, शुद्ध स्वर्ण निखर उठता है, इसी तरह आत्मा में रहने वाले कर्मकालुष को तप साधना के बल पर जब हम गलाते हैं, तब हमारे भीतर का परमात्मा शुद्ध निखर उठता है, प्रकट होता है। वही हमारा वास्तविक स्वरूप है। ईश्वर की मान्यता जैन धर्म में है लेकिन ईश्वर के कर्तृत्त्व की नहीं। 

दूसरी बात बाहरी ईश्वर हमारे सुख-दुःख का निर्धारण नहीं करता। हम खुद अपने सुख-दुःख के निर्धारण करते हैं। हमारे अच्छे-बुरे परिणाम ही हमारे उत्थान-पतन का कारण हैं। हमारी जैसी प्रवृत्ति होती है वैसा हमारा जीवन होता है इसलिए हम खुद के स्वरुप को पहचानें और अपने जीवन को ऊँचा उठाने की कोशिश करें। एक बात बिल्कुल स्पष्ट है हर प्राणी अपना स्वयं का कर्ता है। न ही हमारा कोई और कर्ता है, न ही हम किसी और के भोक्ता हैं। दूसरे के लिए हम निमित्त बन सकते हैं, लेकिन किसी के कर्ता नहीं!

Edited by: Pramanik Samooh

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