दिगम्बर मुनि खड़े होकर आहार क्यों लेते हैं?

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शंका

दिगंबर साधु खड़े होकर आहार क्यों लेते हैं?

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समाधान

दिगंबर साधु की जो चर्या है वह एकदम अद्भुत और अलग चर्या है। सबसे पहले, यह दिगंबर मुनि का यह दिगंबर रूप क्यों है? दिगंबर रूप को धारण करने का मतलब है अपने प्राकृतिक रूप को प्राप्त करना। प्राकृतिक रूप का मतलब नेचर ने आप को जिस तरह से जन्म दिया वैसे रूप में। जब हमारा जन्म हुआ तब हमारे ऊपर कोई कपड़े-लत्ते थे क्या? तो प्रकृति ने हमे ऐसे जन्म दिया। जिस समय एक बच्चे का जन्म होता है उसके अंदर किसी प्रकार का विकार नहीं होता। तो बस उस तुरंत के जन्मे बच्चे की तरह का स्वरूप प्राप्त करना ही दिगंबरत्व का मूल लक्ष्य है, दिगम्बरत्व की साधना का मुख्य ध्येय है। तो जब कोई मुनि दिगंबर होते हैं तो वह दिगंबर हुए अपनी साधना के बल पर अपने प्राकृतिक रूप में आते हैं। और हमारी साधना में हमारे लिए कुछ ऐसा अभ्यास होता है कि हम अपनी सारी मेंटल और फिजिकल रिक्वायरमेंट(Physical Requirement) को reduce करते जाते हैं। और एक लेवल पर आकर उस पर एकदम नियंत्रण कर लेते हैं, तो भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी आदि की बाधाओं को सहना होता है। 

अब खड़े हो कर के भोजन क्यों लेना? खड़े हो कर भोजन इसलिए लेना कि जब हम बैठकर के भोजन करेंगे तो जरूरत से ज्यादा खा लेंगे। खड़े होकर आपने अनुभव किया होगा पूरे भरपेट नहीं खा सकते। आजकल तो आप लोग खड़े हो के ही खाते है बफे(buffet) में, क्यों कराया जाता है बफे (Buffet), ताकि कम में काम आ जाए, आपका पेट नहीं भरता, कैटरिंग वाले का पेट भर जाता है। 

पहली बात, खड़े-खड़े खाने में भरपेट भोजन नहीं हो सकता। दूसरी बात, जब तक मेरे पाँव में बल होगा तब तक मैं भोजन ग्रहण करूँगा। जब मेरे पाँव मुझे खड़े होने में असमर्थ लगने लगेंगे; बल खत्म हो जाएगा तो मैं इसे अपने जीवन का अंतिम पड़ाव मानकर अपनी आत्मा साधना में लगूँगा, सल्लेखना में लगूँगा। तीसरा उद्देश्य जो मुझे लगता है कि यह प्रकृति की यह प्रकृति की व्यवस्था है। आप देखो जितने भी प्रकृति पर आश्रित प्राणी है, उनकी चर्या में और मुनियों की चर्या में कोई अंतर नहीं है। प्रकृति के ऊपर निर्भर रहने वाले जितने भी प्राणी है सब निर्वस्त्र रहते हैं, जैन मुनि भी दिगंबर होता है। प्रकृति के ऊपर निर्भर रहने वाले कोई भी प्राणी स्नान नहीं करते, जैन मुनि भी स्नान नहीं करता। एक दो अपवादों को छोड़कर, हाथी तालाब में चले जाते हैं, वह मस्ती करते हैं स्नान नहीं क्योंकि बाहर निकलते ही इतनी धुल चढ़ा लेता है। तीसरी बात, प्रकृति पर निर्भर रहने वाले जितने भी प्राणी कोई ब्रश नहीं करते, दिगंबर मुनि ब्रश नहीं करते। प्रकृति पर निर्भर रहने वाले जितने ही प्राणी हैं वह बिस्तर पर नहीं सोते हैं। आजकल आपके जो घर में पलने वाले हैं उनकी बात नहीं है, वह तो फाइवस्टार हो गए हैं, वह प्रकृति में नहीं रह रहें हैं वह विकृति में रह रहें है। तो जैसे भू शयन है ऐसी ही जैन मुनि का भू शयन है। ऐसे ही पाटे पर, चटाई पर, धरती पर लेट जाओ। प्रकृति पर निर्भर रहने वाले जितनी भी प्राणी है, खड़े-खड़े खाते हैं। बैठकर खाते देखा आपने किसी को? दिगंबर मुनि भी खड़े होकर के खाता है। शायद यह भी उसके पीछे कोई भावना हो।

Edited by: Pramanik Samooh

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