भय सल्लेखना को एक अतिचार क्यों है?

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शंका

सल्लेखना के पाँच अतिचारों में भय को भी लिया गया है। भय तो स्वतः ही उत्पन्न हो जाता है फिर यह सल्लेखना का अतिचार क्यों है?

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समाधान

सल्लेखना के भय का तात्पर्य यह है- जीने की इच्छा, मरने की इच्छा, मित्रानुराग, भय और निदान! ऐसा बताया गया है, कहीं-कहीं सुखानुबन्ध भी लिखा है। 

“मैंने सल्लेखना तो ले ली, पर कहीं मेरी आयु लम्बी टिक गई तो? मेरे अन्दर कोई वेदना ना आ जाए! मेरे शरीर में दाह ना होने लगे! मुझ पर किसी बीमारी का आक्रमण ना हो जाए! अन्य प्रकार की अन्य कोई परेशानी मेरे मन में ना आ जाए!” इस प्रकार के नकारात्मक भावों का नाम है-भय! जिसने सल्लेखना ले ली उसको इस प्रकार के भय से मुक्त होना चाहिए। “मैंने इस सल्लेखना को धारण किया हुआ है, मुझे मालूम है मेरी आत्मा का स्वरूप क्या है और शरीर का स्वरूप क्या है? अब सल्लेखना की जो शास्त्रीय पद्धति है उस तरीके से मैं अपना जीवन यापन कर रहा हूँ। अपने आने-जाने वाली सांसों का द्रष्टा बना हूँ। अब डरने की क्या बात है? आत्मा का तो कुछ बाल बाँका तो होना नहीं। “न मे मृत्यु कुतो भीतिः“? जब मैं मृत्यु स्वरूप हूँ ही नहीं तो मुझे उसका भय कैसे?” यह भाव व्यक्ति के मन में होता है। यदि किसी के मन में यह भय आ गया तो यह सल्लेखना का दोष है, इसका निवारण करना चाहिए।

Edited by: Pramanik Samooh

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